प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार (22 सितंबर 2025) को नवरात्रि के पहले दिन त्रिपुरा के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले त्रिपुरसुंदरी मंदिर में पूजा-अर्चना कर माता का आशीर्वाद प्राप्त किया। इसी अवसर पर उन्होंने 524 वर्ष प्राचीन इस शक्तिपीठ के पुनर्विकसित, नव्य-दिव्य और भव्य स्वरूप को राष्ट्र को समर्पित किया। गोमती जिले के उदयपुर शहर में स्थित यह मंदिर न केवल त्रिपुरा राज्य की पहचान है, बल्कि यह पूरे भारतवर्ष और पड़ोसी देशों से आने वाले श्रद्धालुओं की आस्था का भी प्रमुख केंद्र है।
#WATCH | Tripura: Prime Minister Narendra Modi offers prayers at Mata Tripura Sundari Temple
PM Modi inaugurated the development work of ‘Mata Tripura Sundari Temple Complex’ at Matabari under Pilgrimage Rejuvenation And Spiritual Heritage Augmentation Drive (PRASAD)… pic.twitter.com/zZyiOpxSG8
— ANI (@ANI) September 22, 2025
धार्मिक महत्व और मान्यता
त्रिपुरसुंदरी मंदिर को माता के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार, जब माता सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपमान सहन न कर अग्नि में आहुति दे दी थी, तब भगवान शिव ने उनके शरीर को उठाकर तांडव किया। उस समय भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के अंगों को विभाजित किया। इसी क्रम में माता सती का अध:पद (दक्षिण चरण अंगुली सहित) यहाँ गिरा था। इस कारण यह स्थान अत्यंत पवित्र और तांत्रिक साधना के लिए शुभ माना जाता है। इसे ‘कुर्भपीठ’ भी कहा जाता है क्योंकि यह मंदिर एक ऐसे टीले पर बना है जो कछुए की पीठ जैसा दिखाई देता है, और हिंदू परंपरा में कछुआ धरती और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है।
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ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इस मंदिर का निर्माण 1501 ई. में त्रिपुरा के राजा धन्या माणिक्य ने करवाया था। प्रारंभ में यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित था। किंतु लोककथाओं के अनुसार, राजा को स्वप्न में देवी ने दर्शन दिए और उनसे कहा कि इस स्थान पर उन्हें अपने ‘सुंदरतम रूप’ में प्रतिष्ठित किया जाए। इसके बाद यहाँ देवी त्रिपुरसुंदरी की प्रतिमा स्थापित की गई। यह मंदिर बंगाल की प्रसिद्ध ‘एक-रत्न’ शैली की वास्तुकला में बना हुआ है, जिसमें ऊपर एक मीनार जैसी संरचना होती है।
मंदिर परिसर में स्थित ‘कल्याण सागर’ नामक पवित्र झील विशेष महत्व रखती है। यहाँ के कछुए श्रद्धालुओं के लिए पूजनीय माने जाते हैं। मंदिर की विशेषता यह है कि यहाँ देवी शक्ति के साथ भगवान विष्णु की भी पूजा होती है। शालिग्राम शिला के रूप में भगवान विष्णु विराजमान हैं। ऐसा उदाहरण बहुत दुर्लभ है कि किसी शक्ति पीठ में देवी और विष्णु दोनों की आराधना एक साथ की जाती हो।
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मूर्तियाँ और धार्मिक परंपराएँ
मंदिर में दो प्रतिमाएँ स्थापित हैं – एक बड़ी प्रतिमा (लगभग 5 फीट ऊँची) और एक छोटी प्रतिमा ‘छोटो-मा’ (लगभग 2 फीट ऊँची)। प्राचीन परंपरा के अनुसार, ‘छोटो-मा’ की प्रतिमा को युद्ध, शिकार या विशेष उत्सवों के दौरान बाहर ले जाया जाता था। मूर्तियों के चरणों के नीचे श्री यंत्र अंकित है, जिसे दिव्य और पवित्र माना जाता है। इसे देखना अथवा पूजा करना विशेष पुण्यदायी माना जाता है।
यहाँ माता को विशेष रूप से लाल गुड़हल का फूल चढ़ाया जाता है और ‘माताबाड़ी का पेडा’ प्रसाद स्वरूप वितरित किया जाता है। इस पेडे को हाल ही में GI टैग भी प्राप्त हुआ है, जिससे इसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। हर वर्ष दिवाली पर यहाँ भव्य दो दिवसीय मेला आयोजित होता है, जिसमें भारत और बांग्लादेश सहित लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं। यह मेला त्रिपुरा की सांस्कृतिक विविधता और धार्मिक एकता का प्रतीक बन गया है।
पुनर्विकास और प्रधानमंत्री का विजन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर पर कहा कि भारत के तीर्थस्थल हमारी विरासत और विकास का संगम हैं। उनकी सोच है कि धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देकर स्थानीय अर्थव्यवस्था और संस्कृति को सशक्त किया जा सकता है। इसी दृष्टिकोण से केंद्र सरकार ने PRASHAD योजना (Pilgrimage Rejuvenation and Spiritual Heritage Augmentation Drive) शुरू की है, जिसके तहत प्रमुख तीर्थस्थलों का आधुनिकीकरण और सौंदर्यीकरण किया जा रहा है।
त्रिपुरसुंदरी मंदिर का पुनर्विकास भी इसी योजना के तहत हुआ है। 2021 में स्वीकृत इस परियोजना पर कुल 54.04 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जिसमें से 34.43 करोड़ केंद्र सरकार और 17.61 करोड़ रुपये राज्य सरकार द्वारा प्रदान किए गए। परियोजना के अंतर्गत मंदिर परिसर का सौंदर्यीकरण, संगमरमर फ्लोरिंग, भव्य प्रवेश द्वार, प्रसाद स्टॉल्स और दुकानों के लिए नया भवन, ध्यान कक्ष, अतिथि गृह, पुजारियों और कर्मचारियों के लिए आवासीय सुविधाएँ, टॉयलेट ब्लॉक, जल व्यवस्था, बैठने की व्यवस्था, VIP लाउंज और ‘माताबाड़ी गैलरी’ जैसी सुविधाएँ जोड़ी गई हैं।
पर्यटन और स्थानीय विकास
फिलहाल यहाँ प्रतिदिन लगभग 3000-3500 श्रद्धालु आते हैं। लेकिन पुनर्विकास कार्य पूर्ण होने के बाद यह संख्या बढ़कर 5000-7000 प्रतिदिन तक पहुँचने की संभावना है। इससे स्थानीय होटल व्यवसाय, टैक्सी सेवाएँ, गाइड, हस्तशिल्प, स्मृति चिह्न विक्रेताओं और भोजनालयों को सीधा लाभ मिलेगा। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और उदयपुर को एक प्रमुख धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में स्थापित किया जाएगा।
#WATCH | Prime Minister Narendra Modi visits an exhibition in Matabari, Tripura
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सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान
त्रिपुरसुंदरी मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह त्रिपुरा की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर का प्रतीक भी है। राज्य का नाम भी देवी त्रिपुरसुंदरी से जुड़ा हुआ माना जाता है। यहाँ वैष्णव और शाक्त परंपराओं का संगम है, जो इसे और भी विशेष बनाता है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा इस मंदिर के नव्य स्वरूप का उद्घाटन न केवल त्रिपुरा, बल्कि पूरे पूर्वोत्तर भारत के लिए गौरव का क्षण है।
In a short while, PM Narendra Modi will inaugurate the development work of ‘Mata Tripura Sundari Temple Complex’ at Matabari, Tripura under Pilgrimage Rejuvenation And Spiritual Heritage Augmentation Drive (PRASAD) scheme.
The project includes modifications in the temple… pic.twitter.com/gytMZU6l8c
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524 वर्ष प्राचीन इस शक्तिपीठ का आधुनिक स्वरूप प्रधानमंत्री के ‘विकास भी, विरासत भी’ के विजन को साकार करता है। यह स्थल आने वाले समय में न केवल आस्था का केंद्र बनेगा, बल्कि त्रिपुरा के सांस्कृतिक और आर्थिक विकास की नई पहचान भी स्थापित करेगा।
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