सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (8 अक्टूबर 2025) को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि बच्चों को सेक्स एजुकेशन कम उम्र से ही दी जानी चाहिए, न कि केवल 9वीं से 12वीं कक्षा के छात्रों तक सीमित रखी जानी चाहिए। न्यायालय ने कहा कि बच्चों में शारीरिक और मानसिक विकास की समझ प्रारंभिक अवस्था से ही विकसित होनी चाहिए, ताकि वे जीवन के विभिन्न चरणों में आने वाले बदलावों को सही तरीके से समझ सकें और गलतफहमियों या अनुचित व्यवहार से बच सकें। यह टिप्पणी अदालत ने एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें 15 वर्षीय नाबालिग लड़के पर बलात्कार और धमकाने के आरोप लगे थे।
जानकारी के अनुसार, आरोपी लड़के की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही निर्देश दिया था कि उसे जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड की शर्तों के अनुसार रिहा किया जाए। सुनवाई के दौरान अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार से सवाल किया कि राज्य के स्कूलों में सेक्स एजुकेशन को लेकर क्या नीति अपनाई गई है और यह किस तरह से लागू की जा रही है। इस पर राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि 9वीं से 12वीं कक्षा तक के छात्रों को NCERT की गाइडलाइंस के अनुरूप सेक्स एजुकेशन दी जाती है।
हालाँकि, अदालत इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुई। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने कहा कि केवल किशोर अवस्था में इस शिक्षा की शुरुआत करना पर्याप्त नहीं है। बच्चों को प्राथमिक स्तर से ही उम्र के अनुरूप जागरूकता दी जानी चाहिए, ताकि वे अपने शरीर, भावनाओं और सीमाओं को समझ सकें। कोर्ट ने यह भी कहा कि कम उम्र में ही सही जानकारी न मिलने के कारण बच्चे गलत दिशा में जा सकते हैं, जिससे समाज में यौन अपराधों की घटनाएँ बढ़ती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सेक्स एजुकेशन का अर्थ सिर्फ यौन संबंधों की जानकारी देना नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य बच्चों को संवेदनशीलता, सहमति (consent), व्यक्तिगत सीमाएँ (boundaries), लैंगिक समानता (gender equality) और सम्मानजनक व्यवहार के प्रति जागरूक बनाना है। इससे बच्चों में न केवल आत्मविश्वास बढ़ेगा, बल्कि वे दूसरों के प्रति भी जिम्मेदारी और सम्मान की भावना विकसित कर पाएँगे।
अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों से कहा कि वे इस दिशा में ठोस कदम उठाएँ और शिक्षा नीति में सुधार करें, ताकि बच्चों को सुरक्षित, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक दृष्टि से संतुलित यौन शिक्षा दी जा सके। कोर्ट ने यह फैसला सरकारों पर छोड़ते हुए कहा कि वे अपने-अपने राज्यों में विशेषज्ञों की मदद से इस पर विचार करें और उपयुक्त बदलाव लाएँ।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी न केवल शिक्षा के क्षेत्र में सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि यह समाज में बच्चों के प्रति जागरूकता और सुरक्षा को लेकर एक सकारात्मक संदेश भी देती है। यह निर्णय इस बात पर जोर देता है कि यौन शिक्षा को टेबू (taboo) न मानकर इसे बच्चों के सर्वांगीण विकास का आवश्यक हिस्सा समझा जाना चाहिए।
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