पर्यावरण संरक्षण के आदर्शमध्य प्रदेश के प्रसिद्ध संन्यासी समर्थ दादा गुरु पिछले पाँच वर्ष से निराहार साधना में लगे हैं। दावा है कि वे अन्न का एक दाना भी नहीं खाते और केवल नर्मदा नदी के जल पर निर्भर हैं। इस दौरान उन्होंने चार लाख किलोमीटर पैदल यात्रा पूरी की है, जिसमें नर्मदा परिक्रमा भी शामिल है। उनका यह तप केवल आध्यात्मिक साधना नहीं, बल्कि नर्मदा नदी के संरक्षण और पर्यावरण जागरूकता का संदेश भी है।
दादा गुरु का मानना है कि मां नर्मदा न केवल एक नदी हैं, बल्कि वे जीवनदायिनी भगवती हैं जिनका अस्तित्व बचाना हम सभी का धर्म है। वे नर्मदा परिक्रमा के दौरान सैकड़ों अनुयायियों के साथ पैदल चलते हैं और बिना अन्न-जल के भी उनकी ऊर्जा अद्भुत बनी रहती है। वे घंटों प्रवचन देते हैं और पर्यावरण संरक्षण के लिए नर्मदा तट पर पौधारोपण एवं सफाई अभियानों का नेतृत्व करते हैं।
इस अद्भुत जीवनशैली और निराहार साधना को लेकर मध्य प्रदेश सरकार ने दादा गुरु पर शोध करने के लिए विशेषज्ञों की एक टीम गठित की है। चिकित्सकीय निगरानी में किये गए परीक्षणों में पाया गया कि उनके शरीर के सभी साइंटिफिक पैरामीटर सामान्य हैं, जो कि इस तपस्या को विज्ञान के लिए एक चुनौती बनाता है।
दादा गुरु की यह निराहार साधना और नर्मदा परिक्रमा देश-विदेश में पर्यावरण संरक्षण के लिए जागरूकता फैलाने का एक प्रभावशाली उदाहरण बनी है। मंत्रियों सहित कई जनप्रतिनिधि भी इस परिक्रमा में नंगे पांव चलते हुए उनके साथ जुड़ते हैं। उन्होंने नौरादेही अभ्यारण्य जैसे जल संरक्षण क्षेत्रों को राष्ट्र की धरोहर बताया है और नदियों के संरक्षण हेतु संवैधानिक अधिकार देने की बात भी कही।
समर्थ दादा गुरु की यह यात्रा और साधना आध्यात्म, योग और पर्यावरण संरक्षण का अनूठा संगम है, जो समाज के लिए प्रेरणा एवं विज्ञान के लिए शोध का विषय बनी हुई है। उनका यह तप न केवल प्रकृति की रक्षा का संदेश देता है बल्कि मानव जीवन में प्रकृति और आध्यात्म के समन्वय की भी एक मिसाल स्थापित करता है।
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