विश्व प्रसिद्ध नीलकंठ महादेव मंदिर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए आने वाले दिनों में यात्रा और अधिक सुविधाजनक होने जा रही है। नीलकंठ महादेव मंदिर तक रोपवे निर्माण की अनुमति राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड से मिल चुकी है, जिससे श्रद्धालुओं को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।
अब तक पौड़ी जिले में स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं को ऋषिकेश के स्वर्ग आश्रम से लगभग 30 किलोमीटर का सड़क मार्ग तय करना पड़ता था। इसके अलावा स्वर्ग आश्रम से करीब 13 किलोमीटर का कठिन पैदल मार्ग भी है, जिसे बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन के लिए तय करते हैं।
दरअसल, नीलकंठ महादेव मंदिर के लिए रोपवे की मांग लंबे समय से की जा रही थी। मंदिर का पैदल मार्ग राजाजी टाइगर नेशनल पार्क के संवेदनशील क्षेत्र से होकर गुजरता है, जहां बाघ, तेंदुए और हाथियों की संख्या अधिक है। कई बार पैदल मार्ग पर हाथियों के आने और श्रद्धालुओं पर हमले की घटनाएं भी सामने आती रही हैं, जिससे सुरक्षा को लेकर चिंता बनी रहती है।
वहीं, सावन के महीने में नीलकंठ महादेव मंदिर में उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और उत्तराखंड से भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस दौरान स्वर्ग आश्रम से मंदिर तक का करीब 30 किलोमीटर का सड़क मार्ग अत्यधिक ट्रैफिक जाम की समस्या से जूझता है और श्रद्धालुओं को कई-कई घंटे इंतजार करना पड़ता है।
श्रद्धालुओं को सुगम और सुरक्षित यात्रा सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से प्रशासन लगातार विभिन्न विकल्पों पर चर्चा कर रहा था। इसी क्रम में उत्तराखंड राज्य वन्यजीव बोर्ड की बैठक में ऋषिकेश–नीलकंठ महादेव रोपवे परियोजना पर विचार किया गया। इसके बाद राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्टैंडिंग कमेटी ने इस परियोजना को स्वीकृति दे दी।
ऋषिकेश से नीलकंठ महादेव मंदिर तक प्रस्तावित रोपवे की लंबाई लगभग 4.5 किलोमीटर होगी। यह परियोजना करीब 450 करोड़ रुपये की लागत से बनाई जाएगी, जिसमें लगभग 13 टावर स्थापित किए जाएंगे। रोपवे त्रिवेणी घाट, ऋषिकेश से नीलकंठ महादेव मंदिर तक बनाया जाएगा।
नीलकंठ महादेव रोपवे को मोनोकेबल डिटैचेबल गोंडोला तकनीक से विकसित किया जाएगा। इसके निर्माण से ट्रैफिक जाम की समस्या में कमी आएगी और श्रद्धालुओं को आने-जाने में समय की बचत होगी। खासतौर पर महिलाओं, बुजुर्गों, दिव्यांगों और बच्चों को इससे बड़ी सुविधा मिलेगी।
नीलकंठ महादेव मंदिर पौड़ी जिले के मणिकूट पर्वत पर स्थित है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान उत्पन्न विष को भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण किया था। विष की तीव्र उष्मा के कारण भगवान शिव ने इसी स्थान पर हजारों वर्षों तक तपस्या की, जिससे उनका कंठ नीला हो गया और इस स्थान का नाम नीलकंठ महादेव पड़ा। यह मंदिर लगभग 3,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और देश-विदेश के श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र माना जाता है।
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