बिहार के SIR (State-wide Intensive Revision) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अहम आदेश दिया है। अदालत ने चुनाव आयोग की दलीलें सुनने के बाद स्पष्ट किया कि मसौदा मतदाता सूची को लेकर दावे और आपत्तियाँ अब तय समय सीमा, यानी 1 सितंबर 2025, के बाद भी दाखिल की जा सकती हैं। हालांकि न्यायालय ने यह भी साफ कर दिया कि समय सीमा को औपचारिक रूप से बढ़ाने का आदेश पारित नहीं होगा, लेकिन नामांकन की अंतिम तिथि तक प्राप्त होने वाली सभी आपत्तियों पर विचार किया जाएगा। इस दौरान न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि मतदाताओं और राजनीतिक दलों की सुविधा के लिए बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण प्रत्येक जिले में पैरा-लीगल वॉलंटियर्स तैनात करे। इन वॉलंटियर्स का काम होगा मतदाताओं और दलों को ऑनलाइन दावे और आपत्तियाँ दर्ज कराने में मदद करना, ताकि किसी भी तकनीकी कारण से किसी को मताधिकार से वंचित न होना पड़े।
सुनवाई के दौरान आयोग का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने अदालत को बताया कि राजनीतिक दल फिलहाल सूची से नाम हटाने को लेकर आपत्तियाँ दर्ज कर रहे हैं, लेकिन नए नाम जोड़ने के दावे बहुत कम आ रहे हैं। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि बिहार के कुल 7.24 करोड़ मतदाताओं में से 99.5% लोगों ने अपने फॉर्म पहले ही जमा कर दिए हैं। इसके बावजूद, लगभग 65 लाख बहिष्कृत मतदाताओं में से केवल कुछ हजार ही दावे दाखिल किए गए हैं। यह स्थिति गंभीर है क्योंकि मतदाता सूची से बाहर हुए लाखों लोगों को अभी भी अपने नाम जुड़वाने का अवसर नहीं मिल पाया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर चिंता जताते हुए कहा कि पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए आयोग को सभी दावों और आपत्तियों पर गंभीरता से विचार करना होगा।
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 8 सितंबर 2025 को तय की है। उस समय तक यह देखा जाएगा कि कितने दावे और आपत्तियाँ सामने आई हैं और आयोग ने उन्हें निपटाने के लिए क्या कदम उठाए हैं। यह फैसला बिहार विधानसभा चुनावों की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को प्रभावित करने वाला साबित हो सकता है।
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