दिल्ली दंगों की साजिश से जुड़े संवेदनशील मामले में सुप्रीम कोर्ट में 12 सितंबर 2025 को सुनवाई होनी थी, लेकिन यह टल गई। अब यह सुनवाई 19 सितंबर को होगी। यह मामला जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच के सामने सूचीबद्ध था। जस्टिस अरविंद कुमार ने स्पष्ट किया कि उन्हें केस की फाइल देर रात ही प्राप्त हुई थी, ऐसे में इतनी गंभीर और जटिल याचिका पर सुनवाई के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाया। इस वजह से आज सुनवाई करना संभव नहीं रहा और इसे अगली तारीख पर स्थगित कर दिया गया। यह याचिका दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देती है जिसमें उमर खालिद, शरजील इमाम सहित नौ आरोपितों की जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी।
दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि नागरिकों को विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार शांतिपूर्ण तरीके से और कानून के दायरे में होना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा था कि विरोध की आड़ में हिंसा फैलाने या उसकी साजिश करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। हाई कोर्ट के अनुसार, उपलब्ध सबूतों से यह संकेत मिलता है कि आरोपितों की भूमिका हिंसा फैलाने की साजिश से जुड़ी हो सकती है, इसलिए उन्हें जमानत नहीं दी जा सकती।
उमर खालिद और शरजील इमाम पर आरोप है कि वे फरवरी 2020 में हुए दिल्ली दंगों के मास्टरमाइंड थे। इन दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे। दंगों के दौरान कई घरों, दुकानों और धार्मिक स्थलों को भी भारी नुकसान पहुंचा था। जांच एजेंसियों ने दावा किया कि यह हिंसा अचानक नहीं हुई थी, बल्कि इसके पीछे सुनियोजित साजिश थी। इसी आधार पर आरोपितों पर गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के तहत गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया गया।
उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य आरोपित लंबे समय से जेल में बंद हैं और वे लगातार यह दावा करते रहे हैं कि उनके खिलाफ दर्ज किए गए आरोप झूठे और राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित हैं। उनका कहना है कि उन्होंने केवल शांतिपूर्ण विरोध का समर्थन किया था, दंगों या हिंसा से उनका कोई लेना-देना नहीं है। हालांकि जांच एजेंसियों ने उनके भाषणों, कॉल डिटेल्स और कथित बैठकों को सबूत के तौर पर अदालत में पेश किया है।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई अब 19 सितंबर को होगी। इस दौरान अदालत यह तय करेगी कि आरोपितों को जमानत दी जा सकती है या नहीं। यह सुनवाई बेहद अहम मानी जा रही है, क्योंकि इससे न केवल आरोपितों के भविष्य का फैसला होगा, बल्कि यह भी तय होगा कि अदालत विरोध प्रदर्शनों और उससे जुड़े मामलों की सीमाओं और जिम्मेदारियों को किस तरह परिभाषित करती है।
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