दिल्ली हाई कोर्ट ने भारतीय क्रिकेट टीम के मुख्य कोच और पूर्व सांसद गौतम गंभीर, उनके परिवार और उनकी चैरिटेबल फाउंडेशन के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला पूरी तरह रद्द करते हुए उन्हें बड़ी राहत दी है। यह मामला वर्ष 2021 में कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान बिना लाइसेंस के एंटीवायरल दवा फैबिफ्लू को कथित रूप से जमा करने और वितरित करने के आरोपों पर आधारित था। शिकायत के अनुसार, गंभीर और उनकी टीम ने महामारी के दौरान बड़ी मात्रा में दवा बांटी थी, जबकि इसके लिए आवश्यक लाइसेंस उपलब्ध नहीं था। इस मामले को ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 के तहत दर्ज किया गया था, जिसके तहत दोषी पाए जाने पर तीन से पांच साल तक की जेल और जुर्माने का प्रावधान है।
गंभीर और उनके फाउंडेशन ने कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखते हुए बताया कि 22 अप्रैल से 7 मई 2021 के बीच उन्होंने गरीब और कोविड-प्रभावित लोगों की मदद के लिए एक निःशुल्क मेडिकल कैंप चलाया था। इस दौरान न तो दवाओं का कोई अवैध स्टॉक बनाया गया और न ही किसी से दवा के बदले पैसा लिया गया। उन्होंने कहा कि पूरा कार्य डॉक्टरों की निगरानी और मेडिकल नियमों के तहत किया गया और इसका उद्देश्य केवल मानव सेवा था, न कि व्यवसाय या लाभ कमाना।
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने फैसला सुनाते हुए माना कि तकनीकी रूप से लाइसेंस की कमी थी, लेकिन गंभीर का उद्देश्य पूरी तरह मानवीय था और उन्होंने संकट की घड़ी में जरूरतमंदों की मदद की। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे समय में सहायता देने वाले लोगों के खिलाफ कड़े आपराधिक प्रावधान लगाना उचित नहीं है, खासकर जब कोई स्वार्थ या गलत इरादा न हो।
फैसले के साथ ही गंभीर, उनके परिवार और फाउंडेशन पर चल रही सभी कानूनी कार्रवाई समाप्त हो गई और मामला बंद हो गया। अदालत का यह निर्णय महामारी के दौरान मानवीय कार्यों के लिए कानूनी छूट और संवेदनशीलता का उदाहरण माना जा रहा है।
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