वैश्विक जलवायु को प्रभावित करने वाला El Niño एक बार फिर चिंता का कारण बनता जा रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, प्रशांत महासागर के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी से जुड़ा यह चक्र 2026-27 में बेहद शक्तिशाली रूप ले सकता है, जिसे आम तौर पर ‘सुपर एल नीनो’ कहा जाता है।
क्या होता है El Niño?
El Niño दरअसल El Niño Southern Oscillation (ENSO) का हिस्सा है। इसमें समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी बढ़ जाता है, जिससे दुनिया भर के मौसम पैटर्न बदल जाते हैं।
इसका असर यह होता है कि कहीं भारी बारिश और बाढ़ आती है, तो कहीं सूखा, जंगलों में आग और हीटवेव बढ़ जाती हैं।
1877 जैसा संकट फिर लौट सकता है?
इतिहास में 1877-78 का एल नीनो सबसे विनाशकारी माना जाता है, जब समुद्र का तापमान करीब 2.7°C तक बढ़ गया था। इसका असर भारत समेत कई देशों में भयंकर अकाल, सूखा और महामारी के रूप में सामने आया था।
वैज्ञानिकों की चेतावनी
National Oceanic and Atmospheric Administration (NOAA), World Meteorological Organization (WMO) और European Centre for Medium-Range Weather Forecasts के अनुसार इस बार समुद्री तापमान 3°C तक बढ़ सकता है।
इस बात की करीब 25% संभावना जताई गई है कि यह ‘बहुत मजबूत’ एल नीनो बन सकता है और इसका असर 2026 के अंत से 2027 तक रह सकता है।
ग्लोबल वार्मिंग से बढ़ा खतरा
वैज्ञानिकों के मुताबिक, आज पृथ्वी पहले से लगभग 1.4°C ज्यादा गर्म हो चुकी है। ऐसे में एल नीनो का असर और खतरनाक हो सकता है।
हीटवेव, सूखा, जंगलों में आग और जल संकट पहले से ज्यादा गंभीर रूप ले सकते हैं।
दुनिया पर क्या होगा असर?
- भारत, ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में कमजोर मानसून और सूखा
- दक्षिण अमेरिका में भारी बारिश और बाढ़
- गेहूँ, चावल, मक्का जैसी फसलों पर असर
- वैश्विक खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी
- जल संकट और बिजली उत्पादन पर असर
क्या दुनिया तैयार है?
आज के समय में सैटेलाइट, सेंसर और आधुनिक तकनीक के जरिए एल नीनो की निगरानी की जा रही है। इससे सरकारों को पहले से तैयारी का समय मिल जाता है।
फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती आबादी और आपस में जुड़ी वैश्विक अर्थव्यवस्था के कारण इसका असर व्यापक हो सकता है।
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