भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने आधुनिक युद्ध और तकनीकी बदलावों को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि आज के दौर में युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है, जहां लैब से युद्ध के मैदान तक टेक्नोलॉजी पहुंचने का समय दशकों से घटकर महज कुछ महीनों का रह गया है।
जनरल द्विवेदी ने स्पष्ट किया कि जो इनोवेशन बड़े पैमाने पर लागू नहीं हो सकता, वह प्रभावी नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि भारत को प्रयोगात्मक स्तर से आगे बढ़कर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), साइबर, क्वांटम टेक्नोलॉजी, ऑटोनॉमस सिस्टम, अंतरिक्ष और उन्नत सामग्री जैसे क्षेत्रों में एंटरप्राइज-स्केल पर काम करना होगा।
उन्होंने दोहरे उपयोग (Dual-use) वाले रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) इकोसिस्टम को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। इसमें शिक्षा संस्थानों, सरकारी रिसर्च एजेंसियों और निजी क्षेत्र के बीच बेहतर तालमेल और सरकार के स्पष्ट समर्थन की जरूरत बताई।
#WATCH | Delhi: Indian Army Chief General Upendra Dwivedi says, "In today's conflicts, the cycle from lab to battlefield has compressed from decades to months. Innovation that cannot scale is innovation that arrives too late. The pipeline from idea to prototype exists. The… pic.twitter.com/CSK9wsfSqG
— ANI (@ANI) May 19, 2026
विदेशी निर्भरता सबसे बड़ी चुनौती
सेना प्रमुख ने कहा कि आज की रणनीतिक कमजोरी केवल सैन्य ताकत की कमी नहीं है, बल्कि विदेशी सप्लाई चेन, महत्वपूर्ण खनिजों और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर बढ़ती निर्भरता है।
उन्होंने कहा कि भारत को इन निर्भरताओं को खत्म कर आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से बढ़ना होगा। इसे केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्य जरूरत के रूप में देखना होगा।
टेक्नोलॉजी में वर्चस्व ही तय करेगा युद्ध का परिणाम
जनरल द्विवेदी ने कहा कि आने वाले दशक में जो देश तकनीकी क्षेत्र में वर्चस्व स्थापित करेगा, वही युद्ध के परिणामों को नियंत्रित करेगा। भारत को न सिर्फ नई तकनीकों को अपनाना है, बल्कि उन्हें स्वदेशी बनाकर वैश्विक नेतृत्व हासिल करना होगा।
‘इतिहास इंतजार नहीं करता’
अपने संबोधन में उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के शब्दों को उद्धृत करते हुए कहा कि “शांति का अर्थ शक्ति का अभाव नहीं, बल्कि क्षमता, आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प की उपस्थिति है।”
उन्होंने कहा कि इतिहास उन देशों का साथ देता है जो तेजी से आगे बढ़ते हैं, और भारत को भी उसी गति से आगे बढ़ना होगा।
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