बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी में स्पष्ट किया है कि पद्म श्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण और भारत रत्न जैसे नागरिक सम्मान ‘उपाधि’ नहीं हैं और इन्हें किसी भी व्यक्ति के नाम के आगे या पीछे प्रिफिक्स या सफिक्स के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून का पालन अनिवार्य है और यह जिम्मेदारी केवल पक्षकारों की ही नहीं, बल्कि अदालत की भी है।
यह टिप्पणी जस्टिस सोमशेखर सुंदरासन ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान की, जिसमें केस के शीर्षक में प्रतिवादी के नाम के साथ ‘पद्म श्री’ शब्द जोड़ा गया था। इसी पर आपत्ति जताते हुए कोर्ट ने कहा कि न्यायिक कार्यवाही में भी इस तरह का उपयोग स्वीकार्य नहीं है।
बॉम्बे हाई कोर्ट के सामने जो याचिका दाखिल की गई थी, उसके केस टाइटल में लिखा था— “डॉ त्रिंबक वी डापकेकर बनाम पद्मश्री डॉ शरद एम हार्डिकर एवं अन्य।” डॉ शरद एम हार्डिकर को वर्ष 2004 में चिकित्सा क्षेत्र में योगदान के लिए पद्म श्री से सम्मानित किया गया था, लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसका उपयोग नाम का हिस्सा बनाकर नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले बालाजी राघवन/एस. पी. आनंद बनाम भारत संघ का हवाला दिया। उस फैसले में संविधान पीठ ने स्पष्ट किया था कि भारत रत्न और पद्म पुरस्कार संविधान के अनुच्छेद 18(1) के तहत ‘उपाधि’ नहीं हैं, लेकिन इन्हें नाम के साथ जोड़ना भी कानूनन गलत है। यदि कोई ऐसा करता है, तो निर्धारित प्रक्रिया के तहत उससे राष्ट्रीय सम्मान वापस भी लिया जा सकता है।
हाई कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि अनुच्छेद 141 के तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून देश की सभी अदालतों पर बाध्यकारी है। इसलिए अदालतों को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि न्यायिक रिकॉर्ड और कार्यवाही में किसी भी व्यक्ति के नाम के साथ पद्म पुरस्कारों को पहचान या शीर्षक के रूप में न जोड़ा जाए।
सीमित हस्तक्षेप करते हुए कोर्ट ने मामले में केवल बैठक की तारीख से जुड़ा संशोधन स्वीकार किया। अपने आदेश के जरिए बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि राष्ट्रीय सम्मान गौरव का विषय हैं, लेकिन उन्हें नाम का हिस्सा बनाना न तो उचित है और न ही संवैधानिक रूप से मान्य।
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