अयोध्या में मस्जिद निर्माण का मामला पाँच साल बाद भी ठप पड़ा हुआ है, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में मुस्लिम पक्ष को मस्जिद के लिए पाँच एकड़ भूमि आवंटित करने का आदेश दिया था। यह जमीन धन्नीपुर गाँव में अगस्त 2020 में उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को सौंपी भी जा चुकी थी। लेकिन इसके बाद से अब तक मस्जिद निर्माण की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठ पाया है। मस्जिद के लिए बनाए गए ट्रस्ट ने योजना तो बनाई, चंदा भी जुटाया और 2021 में अयोध्या विकास प्राधिकरण (ADA) के पास लेआउट प्लान स्वीकृति हेतु आवेदन भी किया, परंतु आवश्यक अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) हासिल करने में नाकाम रहा।
RTI के जरिए सामने आया है कि लोक निर्माण विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नागरिक उड्डयन, सिंचाई विभाग, नगर निगम, जिलाधिकारी कार्यालय और अग्निशमन विभाग जैसे कई विभागों से अनिवार्य NOC माँगे गए थे, लेकिन मस्जिद ट्रस्ट इन्हें प्रस्तुत नहीं कर पाया। नतीजा यह हुआ कि ADA ने नियमों के अनुसार उनका लेआउट प्लान खारिज कर दिया। RTI में यह भी स्पष्ट हुआ कि ट्रस्ट ने आवेदन और जाँच शुल्क के तौर पर करीब 4 लाख रुपए ADA को जमा किए थे, लेकिन बिना NOC पूरी प्रक्रिया अधर में ही अटक गई।
ट्रस्ट के सचिव अतहर हुसैन का कहना है कि उन्हें अग्निशमन विभाग की ओर से एक बड़ी आपत्ति मिली थी। अग्निशमन विभाग की साइट जाँच में पाया गया कि प्रस्तावित मस्जिद और अस्पताल भवन की ऊँचाई के मद्देनजर वहाँ तक पहुँचने वाली सड़क की चौड़ाई न्यूनतम 12 मीटर होनी चाहिए। जबकि मौके पर जो सड़कें मौजूद थीं, वे 6 मीटर से अधिक चौड़ी नहीं थीं और मुख्य सड़क तो केवल 4 मीटर की ही थी। इस तकनीकी खामी ने पूरे प्रस्ताव को बड़ा झटका दिया। हुसैन का कहना है कि उन्हें बाकी विभागों की ओर से किसी आपत्ति की जानकारी नहीं दी गई, लेकिन RTI के जवाब से अब यह साफ हो गया है कि मस्जिद योजना के लिए आवश्यक अनुमतियाँ अधूरी रहीं।
सवाल यह उठता है कि जिस ट्रस्ट ने जमीन मिलने के बाद बड़े पैमाने पर चंदा वसूला, योजनाओं की घोषणा की और मस्जिद परिसर में अस्पताल व अन्य सुविधाओं का खाका भी खींचा, उसने इतने सालों में सबसे बुनियादी औपचारिकताएँ पूरी क्यों नहीं कीं। यह स्थिति मस्जिद परियोजना के प्रति ट्रस्ट की गंभीरता पर सवाल खड़े करती है। दूसरी ओर, अयोध्या में राम मंदिर का भव्य निर्माण तेजी से आगे बढ़ा और अब पूर्णता की ओर है, जबकि मस्जिद निर्माण का काम सरकारी प्रक्रियाओं, लापरवाहियों और संगठनात्मक असफलताओं के चलते आज भी शुरू नहीं हो पाया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पाँच साल बाद भी मस्जिद का सपना अधर में लटका हुआ है, जिससे यह साफ झलकता है कि ऐतिहासिक फैसले के बावजूद इस परियोजना को प्राथमिकता नहीं दी गई।
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