पाकिस्तान के कराची शहर में अल्पसंख्यक अहमदिया मुस्लिम समुदाय ने पुलिस पर धार्मिक भेदभाव और उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए हैं। समुदाय का कहना है कि बकरीद से पहले पुलिस उनके कुर्बानी के जानवर जब्त कर रही है और उन्हें धार्मिक परंपराएं निभाने से रोका जा रहा है।
यह मामला उस समय चर्चा में आया जब सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें कराची के मलिर इलाके में पुलिसकर्मी एक बकरी को वाहन में ले जाते दिखाई दिए। दावा किया गया कि यह जानवर एक अहमदी परिवार का था।
“अहमदियों को डराया और परेशान किया जा रहा” – समुदाय
अहमदिया समुदाय के प्रतिनिधि अमीर महमूद ने मीडिया से बातचीत में कहा कि कराची में समुदाय के लोगों के लिए बकरीद से पहले कुर्बानी के जानवर खरीदना और उन्हें घरों में रखना बेहद मुश्किल हो गया है।
उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस समुदाय के लोगों को डराने-धमकाने की कार्रवाई कर रही है और कई इलाकों में अहमदियों के जानवर “गैर-कानूनी तरीके” से जब्त किए जा रहे हैं।
महमूद ने कहा:
“पाकिस्तान में अहमदियों को मुस्लिम नहीं माना जाता, इसलिए उन्हें बकरीद पर कुर्बानी करने की अनुमति भी नहीं दी जाती।”
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में कराची के मलिर क्षेत्र में पुलिसकर्मियों को एक बकरी वाहन में ले जाते हुए देखा गया। वीडियो सामने आने के बाद मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर बहस तेज हो गई है।
हालांकि, पुलिस प्रशासन की ओर से इस वायरल वीडियो और आरोपों पर कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
पाकिस्तान में अहमदियों की कानूनी स्थिति
पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय लंबे समय से धार्मिक और कानूनी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है।
1974 में गैर-मुस्लिम घोषित
पाकिस्तान की संसद ने 1974 में संविधान संशोधन के जरिए अहमदियों को आधिकारिक रूप से गैर-मुस्लिम घोषित कर दिया था।
1984 के कानून
इसके बाद 1984 में तत्कालीन सैन्य शासक मोहम्मद जिया-उल-हक के शासन में ऐसे कानून बनाए गए, जिनके तहत:
- अहमदियों का खुद को मुस्लिम कहना अपराध माना गया
- अपनी इबादतगाह को मस्जिद कहना प्रतिबंधित किया गया
- इस्लामी प्रतीकों और धार्मिक प्रथाओं के इस्तेमाल पर कानूनी रोक लगाई गई
इन कानूनों को लेकर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने कई बार चिंता जताई है।
अहमदी समुदाय और धार्मिक मतभेद
अहमदी समुदाय का धार्मिक विश्वास मुख्यधारा के मुस्लिमों से अलग माना जाता है।
जहाँ अधिकांश मुस्लिम पैगंबर मोहम्मद को अंतिम पैगंबर मानते हैं, वहीं अहमदी समुदाय मिर्जा गुलाम अहमद को एक सुधारक और पैगंबर मानता है। इसी धार्मिक मतभेद के कारण पाकिस्तान में यह समुदाय लंबे समय से विवाद और भेदभाव का सामना कर रहा है।
मानवाधिकार संगठनों की चिंता
धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर काम करने वाले कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने पहले भी पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय की स्थिति को लेकर चिंता जताई है। विशेषज्ञों का कहना है कि धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों को लेकर पाकिस्तान लगातार अंतरराष्ट्रीय आलोचना का सामना करता रहा है।
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