मध्य प्रदेश के धार जिले स्थित ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद में अब इंदौर हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। शुक्रवार (15 मई 2026) को कोर्ट ने अपने निर्णय में भोजशाला को वाग्देवी (माता सरस्वती) का प्राचीन मंदिर माना है और हिंदू पक्ष को पूजा का अधिकार प्रदान किया है।
यह मामला कई वर्षों से कानूनी, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक बहस का केंद्र बना हुआ था। अदालत का यह निर्णय भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की विस्तृत वैज्ञानिक रिपोर्ट और प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर आया है।
कोर्ट ने 5 याचिकाओं और 3 इंटरवेंशन पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस द्वारा 2022 में दायर याचिका में भोजशाला के वास्तविक धार्मिक स्वरूप की पहचान और पूजा अधिकार की मांग की गई थी। इसके बाद हाई कोर्ट के आदेश पर ASI ने 98 दिनों तक वैज्ञानिक सर्वे किया।
ASI रिपोर्ट में क्या मिला?
ASI रिपोर्ट में दावा किया गया कि भोजशाला परिसर में परमार कालीन विशाल मंदिर के अवशेष मौजूद हैं। रिपोर्ट में 94 मूर्तियाँ, देवी-देवताओं की आकृतियाँ, संस्कृत शिलालेख, नक्काशीदार स्तंभ और मंदिर शैली की संरचना के प्रमाण मिले।
रिपोर्ट के अनुसार 106 स्तंभों और 82 पिलास्टर्स पर कई धार्मिक आकृतियाँ पाई गईं, जिन्हें बाद में विकृत किए जाने के संकेत मिले। ASI ने यह भी बताया कि मौजूदा संरचना में मंदिर के मूल पत्थरों का उपयोग किया गया है।
कोर्ट का फैसला
हाई कोर्ट ने कहा कि भोजशाला मूल रूप से वाग्देवी का मंदिर था और मुस्लिम पक्ष को वैकल्पिक स्थल की मांग करने का अधिकार है। कोर्ट ने परिसर के रखरखाव की जिम्मेदारी ASI को ही दी है। अब पुराने आदेश रद्द कर दिए गए हैं, जिनके तहत सीमित दिनों में पूजा और नमाज की अनुमति दी गई थी।
#WATCH | Dhar, Madhya Pradesh | On Dhar-Bhojshala case, advocate Vishnu Shankar Jain says, "The Indore High Court has delivered a historic verdict, partially setting aside the ASI's order dated April 7, 2003. Furthermore, the Court has granted the Hindu side the right to worship… pic.twitter.com/gilTokeGJy
— ANI (@ANI) May 15, 2026
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार भोजशाला का निर्माण 11वीं शताब्दी में राजा भोज ने किया था और यह शिक्षा एवं ज्ञान का केंद्र था। यहाँ संस्कृत, ज्योतिष, दर्शन और अन्य विषयों की शिक्षा दी जाती थी। परिसर में संस्कृत शिलालेख और प्राचीन स्थापत्य के कई प्रमाण मिले हैं।
विवाद लंबे समय से भोजशाला को मंदिर और मस्जिद दोनों रूपों में पहचान देने को लेकर चलता रहा है, जिसमें हिंदू पक्ष इसे सरस्वती मंदिर और मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता रहा है।
लंबे संघर्ष के बाद फैसला
करीब दो वर्षों तक चली सुनवाई, वैज्ञानिक जांच और ऐतिहासिक दस्तावेजों की समीक्षा के बाद अदालत ने यह महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। इस फैसले को सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हमारी यूट्यूब चैनल को लाइक, शेयर और सब्सक्राइब करे
Like, Share and Subscribe our YouTube channel