बिहार की राजनीति में इन दिनों एक नया सियासी संग्राम छिड़ गया है, जहां लालू प्रसाद यादव के दोनों बेटे—तेज प्रताप यादव और तेजस्वी यादव—खुले तौर पर आमने-सामने आ गए हैं। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले दोनों भाइयों के बीच बढ़ती खींचतान ने आरजेडी (राष्ट्रीय जनता दल) के भीतर तनाव की स्थिति पैदा कर दी है।
दरअसल, महुआ सीट पर आरजेडी उम्मीदवार मुकेश रौशन के समर्थन में प्रचार करने पहुंचे तेजस्वी यादव के दौरे के बाद तेज प्रताप यादव भड़क उठे। उन्होंने एक इंटरव्यू में अपने छोटे भाई तेजस्वी को ‘दूधमुंहा बच्चा’ कहकर संबोधित किया। तेज प्रताप ने कहा, “तेजस्वी जी का अभी दूध का दांत नहीं टूटा है।” उनके इस बयान ने न केवल राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है, बल्कि लालू परिवार के भीतर की मतभेदों को भी सार्वजनिक कर दिया है।
तेज प्रताप ने अपने बयान में आगे कहा कि अगर महुआ की जनता उनका समर्थन करेगी, तो वे बिहार के मुख्यमंत्री बनने के लिए तैयार हैं। उन्होंने दावा किया कि उनकी पार्टी के 20 विधायक चुनाव जीतने जा रहे हैं और सरकार की “चाबी” उनके पास होगी। उन्होंने यह भी कहा कि महुआ के लोगों के लिए यह गर्व की बात होगी कि बिहार का अगला मुख्यमंत्री महुआ से होगा।
तेज प्रताप ने गठबंधन को लेकर अपनी शर्तें भी रखीं। उन्होंने कहा कि वे उसी पार्टी को समर्थन देंगे जो महुआ में इंजीनियरिंग कॉलेज स्थापित करेगी। उन्होंने कहा, “जो महुआ में इंजीनियरिंग कॉलेज देगा, हम उसी के साथ मिलकर सरकार बनाएंगे।”
अपने छोटे भाई पर निशाना साधते हुए तेज प्रताप ने कहा, “हमारे छोटे और नादान भाई कहते हैं कि पार्टी से बड़ा कोई नहीं होता, लेकिन हम कहना चाहते हैं कि पार्टी से बड़ी जनता होती है। लोकतंत्र में जनता ही असली मालिक है, न कि कोई पार्टी या परिवार। महुआ मेरी राजनीतिक कर्मभूमि है, जो मेरे लिए पार्टी और परिवार दोनों से ज्यादा अहम है।”
गौरतलब है कि तेज प्रताप यादव, जो पहले भी अपने बेबाक और विवादित बयानों के लिए सुर्खियों में रहे हैं, इस बार अपने ही भाई के खिलाफ मोर्चा खोल चुके हैं। तेजस्वी यादव, जो आरजेडी के राष्ट्रीय नेता और लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक उत्तराधिकारी माने जाते हैं, फिलहाल इस विवाद पर चुप्पी साधे हुए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह भाई-भाई की लड़ाई बिहार विधानसभा चुनाव में आरजेडी की एकजुटता पर असर डाल सकती है। वहीं, विपक्षी दल इस स्थिति का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं। कुल मिलाकर, तेज प्रताप और तेजस्वी के बीच की यह तकरार न केवल पारिवारिक मतभेदों की झलक देती है, बल्कि बिहार की राजनीति में एक नए समीकरण का संकेत भी देती है।
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