गुजरात के भरूच जिले में स्थित ऐतिहासिक जुम्मा (जामा) मस्जिद को लेकर चल रहा विवाद अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। करीब छह महीने से संतों, जैन संगठनों और विभिन्न धार्मिक समूहों द्वारा इस स्थल को प्राचीन जैन समाधि विहार और श्री चक्रधर स्वामी की जन्मस्थली बताए जाने के बाद पुरातत्व विभाग ने मस्जिद के लगभग 700 वर्षों से बंद तहखाने का निरीक्षण किया।
तहखाने का दरवाजा खोले जाने पर वहां से 19वें जैन तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ सहित कई जैन देवी-देवताओं की प्राचीन प्रतिमाएं मिलने का दावा किया गया है। इन प्रतिमाओं पर संवत 1213 अंकित होने की जानकारी सामने आई है, जिसके बाद इस ऐतिहासिक स्थल को लेकर विवाद और गहरा गया है।
तहखाने से मिलीं प्राचीन मूर्तियां, प्रशासन सतर्क
सूत्रों के अनुसार, पुरातत्व विभाग ने पूरे निरीक्षण की वीडियो रिकॉर्डिंग कर विस्तृत रिपोर्ट उच्च अधिकारियों को भेज दी है। प्रतिमाओं की बरामदगी के बाद प्रशासन ने परिसर में बिना अनुमति किए गए निर्माण और अतिक्रमणों की जांच शुरू कर दी है।
सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए तहखाने की ओर जाने वाले मुख्य प्रवेश द्वार को फिलहाल बंद कर दिया गया है। साथ ही परिसर में बनाए गए वजूखाना, बिजली-पंखों और अन्य सुविधाओं की वैधता की भी जांच की जा रही है।

जैन पक्ष का दावा: मंदिर को मस्जिद में बदला गया था
जैन और हिंदू संगठनों का आरोप है कि यह स्थल मूल रूप से एक प्राचीन जैन समाधि विहार था, जिसे 13वीं शताब्दी में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के दौरान मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया था।
उनका दावा है कि आज भी इमारत के स्तंभों और वास्तुशिल्प में जैन परंपरा की प्राचीन नक्काशी और धार्मिक प्रतीकों के अवशेष स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। हाल में मिली प्रतिमाओं को वे अपने दावे का महत्वपूर्ण प्रमाण बता रहे हैं।
शंकराचार्य मठ के महंत ने क्या कहा?
भरूच के नवचौकी ओवारा स्थित शंकराचार्य मठ के महंत मुक्तानंद स्वामी ने कहा कि जुम्मा मस्जिद वास्तव में एक जैन समाधि विहार है।
उन्होंने कहा, “लंबे समय से चल रहे आंदोलन और प्रतिनिधित्व के बाद जब 700 साल पुराना तहखाना खोला गया तो वहां संवत 1213 की भगवान मल्लिनाथ की प्रतिमाएं मिलीं। यह हमारे दावे को मजबूत करता है। इस पवित्र स्थल को पुनः मंदिर के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए।”
मस्जिद ट्रस्ट ने आरोपों को किया खारिज
दूसरी ओर जुम्मा मस्जिद ट्रस्ट ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि यह ऐतिहासिक मस्जिद लंबे समय से सरकारी अभिलेखों में दर्ज है।
मस्जिद ट्रस्टी अब्दुल कामठी के अनुसार, “यह मस्जिद वर्ष 1907 से भारत सरकार के गजट में दर्ज है और वक्फ बोर्ड के अंतर्गत पंजीकृत ट्रस्ट द्वारा संचालित की जाती है। कुछ लोग जानबूझकर नया विवाद खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। हम इस मामले में कानूनी लड़ाई लड़ेंगे और सच्चाई अदालत के सामने रखेंगे।”
कानूनी और प्रशासनिक फैसला करेगा भविष्य
फिलहाल इस ऐतिहासिक धरोहर की वास्तविक पहचान को लेकर दोनों पक्ष आमने-सामने हैं। पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट और उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर आगे प्रशासनिक एवं न्यायिक स्तर पर निर्णय लिया जाएगा।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह स्थल जुम्मा मस्जिद के रूप में यथावत रहेगा या फिर इसे जैन धार्मिक विरासत से जुड़े स्थल के रूप में मान्यता देने की दिशा में कोई कदम उठाया जाएगा। इस मामले पर आने वाले दिनों में कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
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