मई 2025 के सैन्य संघर्ष और ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार फिर पर्दे के पीछे से कूटनीतिक संपर्कों की चर्चा तेज हो गई है। हाल ही में श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में दोनों देशों के राजनेताओं, पूर्व सैन्य अधिकारियों, रणनीतिक विशेषज्ञों और पूर्व राजनयिकों ने एक ट्रैक-2 वार्ता में हिस्सा लिया। इस बातचीत में सीमा पार आतंकवाद, संकट के समय संचार व्यवस्था, सीमा पार नदियों के पानी और भविष्य में तनाव को बढ़ने से रोकने जैसे संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा हुई।
यह बैठक लंदन स्थित थिंक टैंक International Institute for Strategic Studies यानी IISS की ओर से आयोजित एक क्षेत्रीय सुरक्षा सम्मेलन के दौरान हुई। कोलंबो के हिल्टन होटल में भारत और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों ने लगभग डेढ़ दिन तक अलग-अलग चर्चाएं कीं। सम्मेलन में भारत और पाकिस्तान के अलावा श्रीलंका, मालदीव और ब्रिटेन के प्रतिनिधि भी शामिल हुए।
कोलंबो में जुटे भारत-पाकिस्तान के प्रतिनिधि
रिपोर्ट्स के अनुसार, इस बैक-चैनल चर्चा में भारत की ओर से कई प्रमुख नाम शामिल रहे।
राम माधवः ‘इंडिया फाउंडेशन’ के अध्यक्ष और 2014 से 2020 तक बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव रहे।
जनरल एमएम नरवणेः पूर्व भारतीय सेना प्रमुख (2019-2022)।
रुचि घनश्यामः ब्रिटेन में पूर्व भारतीय दूत। वह 90 के दशक के अंत में इस्लामाबाद स्थित उच्चायोग में काम करने वाली पहली महिला राजनयिकों में से एक थीं।
पाकिस्तान के प्रतिनिधिमंडल में कौन-कौन था?
पाकिस्तान की तरफ से इस बैठक में एक सेवारत (वर्किंग) राजनयिक सहित कई अहम चेहरे शामिल हुए।
सज्जाद हैदर खानः पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय में सेवारत राजनयिक (महानिदेशक, दक्षिण एशिया और सार्क)।
शेरी रहमानः पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (PPP) की नेता, पूर्व मंत्री और अमेरिका में पाकिस्तान की पूर्व राजदूत।
मेजर जनरल (रिटायर्ड) इस्फंदयार अली खान पटौदीः पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) में काम कर चुके पूर्व अधिकारी और एक मैकेनाइज्ड डिवीजन के कमांडर। खास बात यह है कि वह बॉलीवुड स्टार सैफ अली खान के चाचा भी हैं।
किन मुद्दों पर हुई चर्चा?
सूत्रों के अनुसार, कोलंबो में हुई इस ट्रैक-2 चर्चा से कोई बड़ा या औपचारिक नतीजा सामने नहीं आया है, लेकिन बातचीत के दौरान कई गंभीर मुद्दों पर विचार-विमर्श हुआ। इसमें सीमा पार आतंकवाद सबसे प्रमुख मुद्दा रहा। भारत लंबे समय से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को दोनों देशों के बीच संबंधों की सबसे बड़ी बाधा बताता रहा है।
इसके अलावा सीमा पार बहने वाली नदियों के पानी के बंटवारे, संकट या सैन्य तनाव के समय दोनों देशों के बीच बेहतर कम्युनिकेशन और भविष्य में तनाव को नियंत्रण में रखने के उपायों पर भी बातचीत हुई। चर्चा का उद्देश्य औपचारिक समाधान निकालना नहीं था, बल्कि दोनों देशों के बीच संवाद की न्यूनतम खिड़की को खुला रखना था।
मई 2025 के संघर्ष के बाद बढ़ी बैक-चैनल कूटनीति
भारत और पाकिस्तान के बीच मई 2025 में चार दिनों तक सैन्य तनाव रहा था। यह तनाव अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद बढ़ा, जिसके जवाब में भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी ढांचों को निशाना बनाया था। भारत ने इस कार्रवाई को आतंकवाद के खिलाफ केंद्रित और सीमित सैन्य जवाब बताया था।
मई 2025 के संघर्ष के बाद से दोनों देशों के रणनीतिकारों, पूर्व राजनयिकों, सांसदों और सुरक्षा विशेषज्ञों के बीच कई बैक-चैनल संपर्क हुए हैं। बताया जाता है कि पहली ऐसी बैठक जुलाई 2025 में लंदन में हुई थी। कोलंबो की हालिया बातचीत को इसी कड़ी की नई बैठक माना जा रहा है।
आधिकारिक बातचीत नहीं, ट्रैक-2 संपर्क
भारत और पाकिस्तान के बीच फिलहाल कोई औपचारिक या आधिकारिक स्तर की वार्ता नहीं चल रही है। हालांकि, दोनों देशों के सैन्य संचालन महानिदेशकों यानी DGMOs के बीच हॉटलाइन अभी भी सक्रिय है और नियमित संपर्क बना हुआ है।
कोलंबो की बैठक को कुछ लोगों ने ट्रैक-1.5 बातचीत बताने की कोशिश की, क्योंकि पाकिस्तान की ओर से एक सेवारत राजनयिक इसमें मौजूद था। हालांकि, भारतीय पक्ष की ओर से कोई भी सेवारत अधिकारी शामिल नहीं था। इसलिए इसे औपचारिक या अर्ध-औपचारिक बातचीत के रूप में नहीं देखा जा रहा है। भारतीय अधिकारियों ने भी स्पष्ट किया है कि इस तरह के संपर्कों का आधिकारिक वार्ता से कोई संबंध नहीं है।
भारत का रुख साफ: आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं
भारतीय पक्ष का आधिकारिक रुख अब भी स्पष्ट है कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। भारत लंबे समय से कहता रहा है कि पाकिस्तान को पहले अपनी जमीन से चलने वाले आतंकी ढांचों और भारत विरोधी गतिविधियों पर विश्वसनीय कार्रवाई करनी होगी। इसी कारण दोनों देशों के बीच औपचारिक संवाद लंबे समय से ठप है।
कोलंबो की ट्रैक-2 बैठक को इस संदर्भ में देखा जा रहा है कि औपचारिक बातचीत बंद होने के बावजूद रणनीतिक स्तर पर संवाद की कुछ खिड़कियां खुली रखी जा रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, परमाणु हथियारों से लैस दो पड़ोसी देशों के बीच संकट के समय कम्युनिकेशन चैनल बनाए रखना क्षेत्रीय स्थिरता के लिए जरूरी है।
IISS सम्मेलन में अमेरिकी अधिकारी भी शामिल
कोलंबो में आयोजित क्षेत्रीय सुरक्षा सम्मेलन के दौरान IISS की ओर से एक विशेष डिनर भी रखा गया था। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस डिनर में दक्षिण और मध्य एशियाई मामलों के लिए अमेरिकी विदेश विभाग के सहायक सचिव एस. पॉल कपूर भी शामिल हुए। वे 21 से 24 जून तक श्रीलंका के दौरे पर थे। कुछ चुनिंदा भारतीय और पाकिस्तानी प्रतिनिधि भी इस डिनर में मौजूद रहे।
हालांकि, इस डिनर या ट्रैक-2 चर्चा को किसी आधिकारिक मध्यस्थता के रूप में नहीं देखा जा रहा है। भारत की नीति हमेशा से रही है कि भारत-पाकिस्तान मुद्दे द्विपक्षीय ढांचे के भीतर ही हल किए जाने चाहिए और आतंकवाद पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
RSS नेता के बयान के बाद संवाद पर नई चर्चा
मई में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी दत्तात्रेय होसबोले ने एक इंटरव्यू में कहा था कि भारत को पाकिस्तान के सैन्य और राजनीतिक प्रतिष्ठान की हरकतों के खिलाफ अपनी सुरक्षा और सम्मान की रक्षा करनी चाहिए, लेकिन बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं करने चाहिए। उनके इस बयान के बाद पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम. एम. नरवणे ने भी कहा था कि ट्रैक-2 कूटनीति और लोगों के बीच संपर्क बनाए रखना महत्वपूर्ण है।
कोलंबो की बैठक को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है, जहां औपचारिक बातचीत की जगह रणनीतिक विशेषज्ञों और पूर्व अधिकारियों के जरिए संवाद की संभावना टटोली जा रही है।
क्या बदल सकता है भारत-पाकिस्तान संबंधों का माहौल?
फिलहाल कोलंबो बैठक से कोई बड़ा परिणाम सामने नहीं आया है। लेकिन यह संकेत जरूर मिला है कि मई 2025 के संघर्ष के बाद भी दोनों देशों के बीच संवाद की कुछ गैर-आधिकारिक राहें खुली हुई हैं। भारत की प्राथमिकता आतंकवाद पर सख्त रुख बनाए रखना है, जबकि पाकिस्तान की ओर से तनाव घटाने और संवाद बहाल करने की कोशिशों के संकेत दिए जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद पर ठोस और भरोसेमंद कार्रवाई नहीं करता, तब तक औपचारिक बातचीत की संभावना कमजोर रहेगी। हालांकि, ट्रैक-2 संवाद भविष्य के लिए माहौल बनाने, गलतफहमी कम करने और संकट की स्थिति में कम्युनिकेशन चैनल बनाए रखने में भूमिका निभा सकता है।
कोलंबो में हुई यह चर्चा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ऐसे समय में हुई है जब दक्षिण एशिया में सुरक्षा माहौल अब भी संवेदनशील है। भारत का संदेश साफ है कि आतंकवाद पर कोई समझौता नहीं होगा, लेकिन क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गैर-आधिकारिक संवाद की भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
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