पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 का सत्ता परिवर्तन केवल मुख्यमंत्री या सत्ताधारी दल बदलने तक सीमित नहीं दिख रहा है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली राज्य की पहली बीजेपी सरकार 16 अगस्त 2026 को अपने 100 दिन पूरे करने जा रही है। इन शुरुआती 100 दिनों में सरकार ने प्रशासन, कल्याणकारी योजनाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य, सरकारी प्रतीकों और बजट प्राथमिकताओं में कई बदलाव किए हैं।
इन बदलावों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा पश्चिम बंगाल की ‘कलर पॉलिटिक्स’ की हो रही है। कभी वामपंथी शासन के कारण ‘लाल बंगाल’ की राजनीतिक पहचान मजबूत थी। ममता बनर्जी के शासनकाल में सरकारी इमारतों से लेकर कई सार्वजनिक स्थानों तक नीला-सफेद रंग प्रमुखता से दिखाई दिया। 2026 में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद कुछ प्रमुख सरकारी और सार्वजनिक स्थानों पर केसरिया रंग और रोशनी ने राजनीतिक प्रतीकों को लेकर नई बहस शुरू कर दी है।
नीला-सफेद से केसरिया: सरकारी प्रतीकों में बदलाव
नई बीजेपी सरकार के शपथ ग्रहण के समय कोलकाता के ऐतिहासिक Writers’ Buildings समेत कई सरकारी इमारतों को केसरिया रोशनी से सजाया गया था। राइटर्स बिल्डिंग लंबे समय तक पश्चिम बंगाल के प्रशासन का केंद्र रही थी, जबकि ममता बनर्जी सरकार ने 2013 में प्रशासनिक सचिवालय नबन्ना स्थानांतरित कर दिया था। बीजेपी की जीत के बाद राइटर्स बिल्डिंग को फिर प्रशासनिक महत्व देने की योजना भी चर्चा में आई।
हालांकि हर रंग परिवर्तन को सरकार का आधिकारिक ‘भगवाकरण आदेश’ कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। सार्वजनिक और सांस्कृतिक संस्थानों में हुए कुछ बदलाव स्थानीय स्तर के रहे हैं और हर मामले में राज्य सरकार की ओर से औपचारिक निर्देश के प्रमाण सामने नहीं आए हैं।
इस बहस का सबसे दिलचस्प उदाहरण कोलकाता की Academy of Fine Arts बनी। वहां करीब 200 वर्ग फुट के एक हिस्से का रंग लगभग एक महीने में टेराकोटा से केसरिया, फिर सफेद और बाद में दोबारा केसरिया हो गया। इसे कलाकारों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच बंगाल की सांस्कृतिक पहचान पर संघर्ष के प्रतीक के रूप में देखा जाने लगा।
Before coming to power in 2021, we had promised a basic income for one woman in every family. After assuming office, Smt. @MamataOfficial went a step further and launched Lakshmir Bhandar, extending monthly financial assistance to all women across Bengal.
Today, 2.42 crore women… pic.twitter.com/i269QJQ7XW
— All India Trinamool Congress (@AITCofficial) March 21, 2026
‘खेला होबे दिवस’ की जगह ‘आयुष्मान दिवस’
राजनीतिक प्रतीकों में सबसे स्पष्ट बदलाव 16 अगस्त को दिखाई देगा। ममता बनर्जी की सरकार इस तारीख को ‘खेला होबे दिवस’ के तौर पर मनाती थी। शुभेंदु अधिकारी सरकार ने अब इसे ‘आयुष्मान दिवस’ के रूप में मनाने का फैसला किया है। खास बात है कि इसी दिन बीजेपी सरकार के 100 दिन भी पूरे होंगे।
यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जून 2026 में पश्चिम बंगाल सरकार ने केंद्र के साथ Ayushman Bharat-Pradhan Mantri Jan Arogya Yojana (AB PM-JAY) लागू करने के लिए MoU किया। केंद्र सरकार के मुताबिक इससे राज्य के करीब 1.43 करोड़ परिवारों यानी लगभग 6 करोड़ लोगों को योजना के दायरे में लाया जा सकता है।
लक्ष्मी भंडार से अन्नपूर्णा योजना तक
नई सरकार के शुरुआती दौर का सबसे चर्चित कल्याणकारी बदलाव अन्नपूर्णा योजना है। बीजेपी ने महिलाओं को हर महीने ₹3,000 की आर्थिक सहायता देने का वादा किया था और जून में इस योजना के तहत भुगतान शुरू हुआ। केंद्र सरकार के MyScheme पोर्टल पर भी अन्नपूर्णा योजना के तहत पात्र महिलाओं को ₹3,000 प्रतिमाह देने का उल्लेख है।
3 जून को पहले बड़े DBT ट्रांसफर में सरकार ने 28,25,769 महिलाओं के बैंक खातों में ₹3,000-₹3,000 भेजने की जानकारी दी।
यहां आपके मूल ड्राफ्ट में एक और महत्वपूर्ण सुधार जरूरी है। यह कहना कि ‘लक्ष्मी भंडार पूरी तरह बंद कर दिया गया’ स्थिति को जरूरत से ज्यादा सरल बना देता है। शुरुआती दौर में सरकार ने मौजूदा लाभार्थियों को नई अन्नपूर्णा व्यवस्था में समाहित करने और उनकी पात्रता का सत्यापन करने की बात कही थी। मई में राज्य सरकार ने यह भी कहा था कि मौजूदा लाभार्थियों को एक झटके में सहायता से बाहर नहीं किया जाएगा।
हालांकि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बाद में दावा किया कि सत्यापन के दौरान लक्ष्मी भंडार से जुड़े करीब 30 लाख संदिग्ध या अपात्र नाम सामने आए और लगभग 30 लाख पुराने लाभार्थी नई अन्नपूर्णा योजना के लिए पात्र नहीं होंगे। सरकार ने कथित अनियमितताओं की जांच के लिए SIT की बात भी कही। इन आंकड़ों को सरकार के दावों के रूप में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
इस तरह बीजेपी सरकार ने केवल सहायता राशि नहीं बढ़ाई बल्कि लाभार्थियों के सत्यापन और वेलफेयर डेटाबेस की जांच को भी अपनी नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है।
1885 :: Writers' Building , Calcutta
It Was Constructed In 1777 by Thomas Lyon pic.twitter.com/eyRMChcU17
— indianhistorypics (@IndiaHistorypic) May 6, 2026
स्कूल और मदरसों में ‘वंदे मातरम’
शिक्षा के क्षेत्र में भी नई सरकार ने अपनी राजनीतिक प्राथमिकता साफ की है। मई 2026 में सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों की मॉर्निंग असेंबली में ‘वंदे मातरम’ का गायन अनिवार्य करने के निर्देश जारी हुए। इसके बाद राज्य के सरकारी, सहायता प्राप्त और मान्यता प्राप्त मदरसों तक भी यह व्यवस्था लागू की गई।
सरकार इसे राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रीय एकता से जोड़कर पेश कर रही है, जबकि इस फैसले ने शिक्षा और पहचान की राजनीति पर नई बहस भी पैदा की।
इसके अलावा पश्चिम बंगाल ने केंद्र की PM-SHRI Schools Scheme लागू करने के लिए मई में समझौता किया। पिछली सरकार के समय पश्चिम बंगाल इस योजना से बाहर रहने वाले राज्यों में शामिल था।
पहला बीजेपी बजट: ₹4.39 लाख करोड़ का रोडमैप
शुभेंदु सरकार के पहले बजट ने यह संकेत दिया कि सरकार अपनी शुरुआती राजनीति को केवल प्रतीकों तक सीमित नहीं रखना चाहती। जून में पेश बजट का आकार करीब ₹4.39 लाख करोड़ रखा गया। इसमें उद्योग, बुनियादी ढांचा और रोजगार सृजन को प्रमुख प्राथमिकता दी गई।
सरकार ने एक लाख सरकारी पदों पर भर्ती, सरकारी कर्मचारियों के DA में 20 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी और बड़े बुनियादी ढांचा तथा शिक्षा संबंधी प्रस्ताव पेश किए। अन्नपूर्णा योजना के लिए भी बड़े वित्तीय आवंटन का प्रावधान किया गया।
लेकिन सरकार की असली परीक्षा घोषणाओं की संख्या से नहीं होगी। एक लाख सरकारी नौकरियों की घोषणा तभी ठोस उपलब्धि मानी जाएगी जब भर्ती प्रक्रियाएं पूरी हों और उम्मीदवारों को नियुक्ति मिले। यही पैमाना एयरपोर्ट, औद्योगिक परियोजनाओं और दूसरे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रस्तावों पर भी लागू होगा।
अल्पसंख्यक और मदरसा विभाग के बजट में बड़ी कटौती
पहले बीजेपी बजट का एक विवादास्पद पहलू Minority Affairs and Madrasah Education Department का आवंटन रहा। 2026-27 के बजट में विभाग के लिए ₹2,175.43 करोड़ प्रस्तावित किए गए, जबकि अंतरिम बजट में यह राशि ₹5,713.61 करोड़ थी। यानी करीब 62 प्रतिशत की कमी।
बीजेपी सरकार इस तरह के नीतिगत बदलावों को संसाधनों के नए वितरण और समान कल्याण की नीति से जोड़ती है, जबकि विपक्ष इन्हें अल्पसंख्यक कल्याण में कटौती के रूप में देखता है। इसलिए इस मुद्दे पर दोनों राजनीतिक पक्षों के दावों को अलग-अलग रखना महत्वपूर्ण है।
बंगाल में बदली सत्ता की भाषा
इन 100 दिनों को एक साथ रखकर देखें तो एक पैटर्न उभरता है। शुभेंदु अधिकारी सरकार ममता बनर्जी सरकार की केवल कुछ योजनाओं या प्रशासनिक फैसलों को नहीं बदल रही, बल्कि पिछली सरकार से जुड़े राजनीतिक प्रतीकों और शब्दावली से भी दूरी बनाने की कोशिश कर रही है।
‘खेला होबे दिवस’ से ‘आयुष्मान दिवस’, लक्ष्मी भंडार से अन्नपूर्णा योजना, PM-SHRI और आयुष्मान भारत को अपनाने से लेकर वंदे मातरम के निर्देश तक—नई सरकार केंद्र की बीजेपी सरकार की प्रमुख नीतियों के साथ पश्चिम बंगाल का तालमेल भी बढ़ा रही है।
लेकिन पश्चिम बंगाल के राजनीतिक परिवर्तन का अंतिम आकलन इमारतों के रंग से नहीं होगा। अगले पांच वर्षों में रोजगार, औद्योगिक निवेश, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और सरकारी योजनाओं की वास्तविक डिलीवरी ही यह तय करेगी कि 2026 का सत्ता परिवर्तन केवल राजनीतिक रंग का बदलाव था या पश्चिम बंगाल के शासन में भी उतना ही बड़ा परिवर्तन लेकर आया।
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