मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच डोनाल्ड ट्रंप की ईरान के साथ युद्धविराम की कोशिशों को बड़ा झटका लगा है। इजरायल, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने इन प्रयासों का खुलकर विरोध किया है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन देशों ने ट्रंप प्रशासन पर युद्ध रोकने की कोशिशों के खिलाफ जोरदार लॉबिंग की है।
UAE ने दी कड़ी चेतावनी
यूसुफ अल ओतैबा ने The Wall Street Journal में प्रकाशित अपने लेख ‘UAE Stands Up to Iran’ में कहा कि ईरान के साथ युद्ध का अंत ऐसा होना चाहिए जिससे क्षेत्र के लिए उसके खतरे को पूरी तरह खत्म किया जा सके।
उन्होंने जल्दबाजी में युद्धविराम को खतरनाक बताते हुए संकेत दिया कि इससे ईरान और मजबूत हो सकता है।
सऊदी अरब भी सख्त रुख में
मोहम्मद बिन सलमान ने भी कथित तौर पर ट्रंप से बातचीत कर स्पष्ट किया है कि ईरान को इस बार कमजोर करना जरूरी है, नहीं तो वह और शक्तिशाली होकर उभरेगा।
रिपोर्ट्स के अनुसार, सऊदी अरब चाहता है कि युद्ध खत्म होने से पहले ईरान की क्रूज और बैलिस्टिक मिसाइल क्षमताओं को अधिकतम कमजोर किया जाए।
يحقّ لنا في دول الخليج العربي أن نتساءل: أين مؤسسات العمل العربي والإسلامي المشترك، وفي مقدمتها الجامعة العربية ومنظمة التعاون الإسلامي، ودولنا وشعوبنا تتعرض لهذا العدوان الإيراني الغاشم؟ وأين الدول العربية والإقليمية "الكبرى"؟
في هذا الغياب والعجز، لا يجوز لاحقًا الحديث عن…
— د. أنور قرقاش (@AnwarGargash) March 23, 2026
खाड़ी देशों की चिंता: स्थायी खतरा
CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका के सहयोगी देशों को डर है कि अगर जल्दबाजी में युद्धविराम हुआ तो हालात पहले से ज्यादा खराब हो सकते हैं।
UAE के राष्ट्रपति के सलाहकार अनवर गर्गश ने कहा कि सिर्फ सीजफायर नहीं, बल्कि स्थायी समाधान जरूरी है, जिसमें ईरान के मिसाइल, ड्रोन और परमाणु खतरे को खत्म करना शामिल है।
अमेरिका का क्या है लक्ष्य?
अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने कहा कि अमेरिका का उद्देश्य ईरान की आक्रामक मिसाइल क्षमताओं को नष्ट करना और उसके सैन्य ढांचे को कमजोर करना है।
संयुक्त राष्ट्र में भी उठा मुद्दा
खाड़ी देशों ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भी ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों को “अस्तित्वगत खतरा” बताया है।
कुवैत और UAE ने ईरान पर आतंकवाद और विस्तारवाद के जरिए क्षेत्रीय अस्थिरता फैलाने का आरोप लगाया है।
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