केरल की राजनीति हमेशा अपने बदलते समीकरणों के लिए जानी जाती है, लेकिन 2026 के विधानसभा चुनावों ने इस परंपरा को और दिलचस्प बना दिया है। यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) ने 140 सीटों वाली विधानसभा में 102 सीटों के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की, जिससे राज्य में सत्ता परिवर्तन लगभग तय माना जा रहा था।
हालांकि, इतनी बड़ी जीत के बावजूद कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन में मुख्यमंत्री पद को लेकर गहरा सस्पेंस बना हुआ है। चुनाव परिणाम आए कई दिन बीत जाने के बाद भी पार्टी यह तय नहीं कर पाई है कि राज्य की कमान किसे सौंपी जाए।
मुख्यमंत्री पद के लिए तीन गुटों में बंटी कांग्रेस
सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद को लेकर तीन प्रमुख गुट सक्रिय हैं:
- केसी वेणुगोपाल का गुट, जिन्हें राहुल गांधी का करीबी माना जाता है
- वीडी सतीसन का गुट, जो विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे हैं
- रमेश चेन्नीथला का अनुभवी गुट, जो समझौते के उम्मीदवार के रूप में देखे जा रहे हैं
इन गुटों के बीच विधायकों का समर्थन बंटा हुआ है, जिससे पार्टी के अंदर खींचतान और बढ़ गई है।
Posters supporting KC Venugopal and VD Satheesan for the Chief Ministership were placed next to each other at Vellayambalam in Thiruvananthapuram on Friday.
📸@nirmalharindran pic.twitter.com/b6aUvfELmB
— The Hindu (@the_hindu) May 8, 2026
हाईकमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती
कांग्रेस हाईकमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि केसी वेणुगोपाल दिल्ली में पार्टी संगठन के बड़े पद पर हैं, लेकिन वह विधायक नहीं हैं। वहीं वीडी सतीसन जमीनी स्तर पर मजबूत पकड़ रखते हैं और कार्यकर्ताओं के बीच लोकप्रिय हैं। तीसरी ओर रमेश चेन्नीथला वरिष्ठता के आधार पर दावा ठोक रहे हैं।
राहुल गांधी इस राजनीतिक गतिरोध को खत्म करने की कोशिश में लगातार नेताओं से बातचीत कर रहे हैं, लेकिन अब तक कोई सहमति नहीं बन पाई है।
BJP का तंज, सोशल मीडिया पर भी घमासान
इस राजनीतिक असमंजस पर भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर तंज कसते हुए कहा कि जो पार्टी मुख्यमंत्री तय नहीं कर पा रही, वह सरकार कैसे चलाएगी। सोशल मीडिया पर भी दोनों गुटों के समर्थकों के बीच तीखी बयानबाजी देखने को मिल रही है।
जनता में निराशा की स्थिति
जहाँ एक ओर कांग्रेस को भारी जनादेश मिला है, वहीं दूसरी ओर नेतृत्व को लेकर अनिश्चितता ने जनता में भी सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर जल्द फैसला नहीं हुआ तो यह जीत भी पार्टी के लिए संगठनात्मक कमजोरी का प्रतीक बन सकती है।
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