पश्चिम बंगाल विधानसभा ने OBC आरक्षण कानून में बड़ा बदलाव करते हुए दो अहम संशोधन विधेयक पास किए हैं। इन संशोधनों के बाद राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC आरक्षण की व्यवस्था को फिर से बदला गया है। नए कानून के तहत मई 2024 के कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश के अनुरूप उन 77 मुस्लिम समुदायों को OBC सूची से बाहर कर दिया गया है, जिन्हें पहले की तृणमूल कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में सूची में शामिल किया गया था।
विधानसभा में पास हुए विधेयकों के जरिए पश्चिम बंगाल में OBC आरक्षण को 17 प्रतिशत से घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया गया है। पहले राज्य में OBC आरक्षण OBC-A और OBC-B श्रेणी में बंटा हुआ था, जिसमें OBC-A को 10 प्रतिशत और OBC-B को 7 प्रतिशत आरक्षण मिलता था। अब सरकार ने मूल 66 OBC समुदायों की सूची को बहाल करते हुए आरक्षण ढांचे को 7 प्रतिशत पर वापस लाने का दावा किया है।
इन विधेयकों में West Bengal Commission for Backward Classes Act, 1993 में भी संशोधन किया गया है। इसके तहत पिछड़ा वर्ग आयोग को फिर से OBC समुदायों की सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति की जांच करने तथा नए दावों पर सिफारिश देने की केंद्रीय भूमिका दी गई है। सरकार का कहना है कि आगे किसी भी समुदाय को OBC सूची में शामिल करने का फैसला आयोग की जांच और सिफारिश के आधार पर ही होगा।
पश्चिम बंगाल के पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री गौरी शंकर घोष ने विधानसभा में कहा कि पिछली सरकार ने बिना उचित सर्वे और आयोग की प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए कई समुदायों को OBC सूची में शामिल किया था। उन्होंने आरोप लगाया कि यह फैसला राजनीतिक हित और वोट बैंक को ध्यान में रखकर लिया गया था। घोष के अनुसार, सर्वे के आधार पर पहले से शामिल 66 समुदायों को बरकरार रखा गया है और केवल हाई कोर्ट द्वारा अवैध मानी गई अतिरिक्त सूची को हटाया गया है।
मंत्री ने यह भी कहा कि नया कानून फर्जी OBC सर्टिफिकेट जारी करने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने में मदद करेगा। सरकार के मुताबिक, अब पिछड़ा वर्ग आयोग समुदायों की वास्तविक सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति का मूल्यांकन करेगा। यदि किसी समुदाय को सचमुच आरक्षण की जरूरत साबित होती है, तो आयोग उसकी सिफारिश राज्य सरकार को कर सकता है।
यह पूरा मामला मई 2024 के कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले से जुड़ा है। हाई कोर्ट ने 2010 के बाद जारी OBC प्रमाणपत्रों को रद्द करते हुए कहा था कि OBC सूची में शामिल करने की प्रक्रिया कानूनी रूप से सही नहीं थी। अदालत ने कहा था कि कई समुदायों को OBC घोषित करने में धर्म को मुख्य आधार बनाया गया प्रतीत होता है। उस समय अदालत ने 77 समुदायों, जिनमें अधिकतर मुस्लिम समुदाय थे, के OBC दर्जे को रद्द किया था।
सुप्रीम कोर्ट में भी इस मामले पर सुनवाई के दौरान आरक्षण के आधार को लेकर सवाल उठे थे। दिसंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि आरक्षण केवल धर्म के आधार पर नहीं दिया जा सकता। हालांकि राज्य की ओर से यह दलील दी गई थी कि आरक्षण धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि पिछड़ेपन के आधार पर दिया गया था।
BJP सरकार ने सत्ता में आने के बाद अपने चुनावी वादे के तहत OBC सूची को मूल स्वरूप में बहाल करने की बात कही थी। राज्य सरकार के अनुसार, संशोधन विधेयक इसी वादे और कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप लाए गए हैं। India Today के अनुसार, विधेयकों के जरिए मूल 66-category OBC list को फिर से लागू किया गया है और पिछड़ा वर्ग आयोग की भूमिका को मजबूत किया गया है।
विधानसभा में इन बिलों का विरोध भी हुआ। इंडियन सेक्युलर फ्रंट के विधायक नवशाद सिद्दीकी ने कहा कि आरक्षण कोटा में किसी भी बदलाव के लिए ठोस empirical data और scientific assessment जरूरी होता है। उनका आरोप था कि सरकार बिना पर्याप्त डेटा के OBC आरक्षण घटा रही है, जिससे कई समुदाय उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरियों के अवसरों से वंचित हो सकते हैं।
ISF का कहना है कि यह फैसला सामाजिक न्याय की मूल अवधारणा को कमजोर कर सकता है। विरोधियों ने यह भी सवाल उठाया कि जिन समुदायों को लंबे समय से आरक्षण का लाभ मिल रहा था, उनके सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन की नई समीक्षा किए बिना अचानक सूची से बाहर करना उचित नहीं होगा।
दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि यह फैसला किसी समुदाय को स्थायी रूप से बाहर करने के लिए नहीं, बल्कि कानूनी प्रक्रिया को बहाल करने के लिए है। मंत्री गौरी शंकर घोष ने कहा कि पिछड़ा वर्ग आयोग जांच करेगा और अगर किसी समुदाय को शामिल करना जरूरी पाया गया, तो कानून के अनुसार उसकी सिफारिश की जा सकती है।
इन OBC संशोधन विधेयकों के साथ बंगाल विधानसभा ने एंटी-सोशल एक्टिविटी यानी “गुंडा दमन” से जुड़ा बिल भी पास किया। इसके अलावा राज्य में यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी UCC को लेकर भी राजनीतिक चर्चा तेज है। रिपोर्ट्स के अनुसार, मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने राज्य में UCC लागू करने की दिशा में कदम उठाने और ड्राफ्टिंग कमेटी बनाने की घोषणा की है।
कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल में OBC आरक्षण कानून में यह बदलाव राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी तीनों स्तरों पर बड़ा घटनाक्रम है। सरकार इसे हाई कोर्ट के आदेश और चुनावी वादे की पूर्ति बता रही है, जबकि विपक्ष और कुछ सामाजिक संगठनों का आरोप है कि इससे पिछड़े समुदायों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। अब सबकी नजर इस बात पर होगी कि पिछड़ा वर्ग आयोग आगे किन समुदायों की समीक्षा करता है और क्या मामला फिर से अदालतों तक पहुंचता है।
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