उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद जाति आधारित रैलियों और कार्यक्रमों पर पाबंदी लगाने का बड़ा फैसला लिया है। इसके साथ ही अब सरकारी दस्तावेज़ों, एफआईआर, गिरफ्तारी मेमो और चार्जशीट में किसी की जाति का उल्लेख नहीं किया जाएगा। यूपी के मुख्य सचिव दीपक कुमार ने इस संबंध में शासनादेश जारी किया है।
जारी निर्देशों के अनुसार, सोशल मीडिया और इंटरनेट पर भी जाति का महिमामंडन या नफरत फैलाने वाले कंटेंट पर आईटी एक्ट के तहत कार्रवाई होगी। एफआईआर और गिरफ्तारी मेमो में आरोपी की पहचान अब पिता और मां के नाम से होगी। इसके अलावा, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के क्राइम क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम (CCTNS) में जाति वाले कॉलम को खाली छोड़ा जाएगा और इसे हटाने के लिए एनसीआरबी को पत्र भी लिखा जाएगा।

गाड़ियों पर जाति का महिमामंडन पूरी तरह बैन होगा। नोटिस बोर्ड, सार्वजनिक स्थलों और सोशल मीडिया पर जाति आधारित नारे, महिमामंडन या आलोचना भी पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगी। हालांकि, एससी/एसटी एक्ट जैसे विशेष मामलों में जाति का उल्लेख करना आवश्यक होगा, इसलिए यह आदेश वहाँ लागू नहीं होगा।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में अपने एक फैसले में जाति व्यवस्था को लेकर सख्त टिप्पणी की थी। अदालत ने कहा था कि यदि भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनना है तो जाति व्यवस्था का अंत करना ही होगा। कोर्ट ने सरकारी दस्तावेज़ों, गाड़ियों और सार्वजनिक स्थानों से जाति आधारित प्रतीक और नारे हटाने का निर्देश दिया था।
हाईकोर्ट के जस्टिस विनोद दिवाकर ने जातिगत महिमामंडन को ‘राष्ट्र-विरोधी’ करार दिया। उन्होंने कहा कि वंश की बजाय संविधान के प्रति श्रद्धा ही सच्ची देशभक्ति और राष्ट्र सेवा की वास्तविक अभिव्यक्ति है। कोर्ट ने नीति निर्माताओं को सुझाव दिया कि सार्वजनिक वाहनों में जाति के प्रतीकों और नारों पर अंकुश लगाया जाए, सोशल मीडिया पर जातिगत महिमामंडन को नियंत्रित किया जाए और विशिष्ट जाति आधारित संस्थानों के बजाय अंतर-जातीय संस्थानों और सामुदायिक केंद्रों को बढ़ावा दिया जाए।
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