इस साल के पद्म विभूषण पुरस्कार की घोषणा के साथ ही केरल की राजनीति में एक अनोखा और चुनौतीपूर्ण मोड़ आ गया है। पहली बार ऐसा होगा कि किसी बड़े कम्युनिस्ट नेता को मरणोपरांत देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान—पद्म विभूषण—मिला। इस सम्मान की घोषणा केंद्र में बैठे भाजपा सरकार द्वारा की गई है, जबकि यह पार्टी कम्युनिस्टों की कट्टर विरोधी रही है। इस निर्णय ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है, क्योंकि इससे पहले किसी भी कम्युनिस्ट नेता ने राष्ट्रीय सम्मान को स्वीकार करना मुनासिब नहीं समझा था। दिवंगत सीपीएम नेता वी एस अच्युतानंदन के परिवार ने स्पष्ट रूप से यह संदेश दे दिया है कि वे देश से मिले सम्मान को स्वीकार करेंगे। उनके बेटे वी ए अरुण कुमार ने कहा है, “यह देश से मिला सम्मान है। हम इसे स्वीकार करेंगे।” इस कदम ने केरल में सत्ताधारी एलडीएफ और सीपीएम के लिए राजनीतिक जटिलता खड़ी कर दी है।
सीपीएम का इतिहास यह दर्शाता है कि पार्टी आमतौर पर केंद्र सरकार द्वारा दिए जाने वाले ऐसे पुरस्कारों से दूरी बनाए रखती है। इसके कई उदाहरण हैं। केरल के पहले मुख्यमंत्री ई एम एस नंबूदरीपाद ने 1992 में पद्म विभूषण लेने से मना कर दिया था। 2008 में पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु को भारत रत्न देने की चर्चा हुई थी, लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया। बाद में उनके उत्तराधिकारी और बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने भी पद्म भूषण लेने से इंकार कर दिया। ऐसे में वी एस अच्युतानंदन का सम्मान लेने का निर्णय, भले ही मरणोपरांत हो, सीपीएम के लिए अब एक नई चुनौती बन गया है।
केरल की राजनीतिक परिदृश्य में यह स्थिति पार्टी के लिए दोहरी कठिनाई पैदा करती है। एक तरफ, परिवार का समर्थन और सम्मान की स्वीकृति पार्टी की इच्छा के खिलाफ है, वहीं दूसरी तरफ अगर पार्टी औपचारिक रूप से पुरस्कार लेने से इनकार करती है तो यह राजनीतिक रूप से विवादास्पद साबित हो सकता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ मान रहे हैं कि इस परिस्थिति में सीपीएम के पास चुप रहने और मौन साधने के अलावा कोई विकल्प बचता नहीं है। भाजपा ने इस कदम के जरिए केरल में अपनी रणनीति को सफल बनाया है—सीपीएम पर दबाव डालते हुए, अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करना। इस तरह, वी एस अच्युतानंदन को पद्म विभूषण देना सिर्फ सम्मान का मामला नहीं रह गया, बल्कि यह केरल की राजनीति में भाजपा के लिए एक चालाकी भरा राजनीतिक दांव भी बन गया है।
इस पूरे परिदृश्य का निहितार्थ यह है कि केरल की आगामी विधानसभा चुनावों में यह निर्णय सियासी माहौल को प्रभावित कर सकता है। पुरस्कार की स्वीकृति से पार्टी को जनता के बीच छवि बनाने में मुश्किलें आएंगी, जबकि परिवार और नेता इस सम्मान को देश की पहचान और मूल्य मानकर इसे स्वीकार करेंगे। भाजपा के लिए यह कदम एक रणनीतिक जीत है, जिसने विरोधी दल को नई राजनीतिक दुविधा में डाल दिया है, और राज्य की राजनीति में एक अप्रत्याशित मोड़ ला दिया है।
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