महात्मा फुले वाडा में वट पूर्णिमा पूजा को लेकर जारी विवाद के बीच महाराष्ट्र पुरातत्व विभाग ने महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। विभाग ने नया पत्र जारी कर स्पष्ट किया है कि महात्मा फुले वाडा को राज्य संरक्षित स्मारक घोषित किए जाने से पहले परिसर में प्रचलित परंपराओं और धार्मिक रीति-रिवाजों को आगे भी जारी रखा जाएगा।
इस स्पष्टीकरण के बाद श्रद्धालुओं, विशेष रूप से विवाहित हिंदू महिलाओं के लिए महात्मा फुले वाडा परिसर में परंपरागत रूप से की जाने वाली वट पूर्णिमा पूजा का रास्ता साफ हो गया है।
यह नया पत्र 23 जून 2026 को सहायक निदेशक, पुरातत्व विभाग, पुणे मंडल की ओर से जारी किया गया है। पत्र खड़क पुलिस स्टेशन, पुणे के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक को संबोधित है। इसमें पुरातत्व एवं संग्रहालय निदेशालय, मुंबई के निर्देशों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि संरक्षित स्मारक घोषित होने से पहले वाडा परिसर में जो परंपराएँ और धार्मिक प्रथाएँ प्रचलित थीं, उन्हें उसी प्रकार जारी रखा जाए।
पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के निर्देश
पुरातत्व विभाग ने स्थानीय पुलिस प्रशासन से कहा है कि वट पूर्णिमा के अवसर पर वर्षों से चली आ रही परंपरा को जारी रखने में आवश्यक सहयोग किया जाए। इसके साथ ही परिसर में कानून-व्यवस्था और स्मारक की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
विभाग का नया रुख 2 जून 2026 को जारी किए गए पिछले आदेश से पूरी तरह अलग माना जा रहा है। पहले आदेश में पुलिस तैनात करने की बात कही गई थी, ताकि वट पूर्णिमा के दिन महात्मा फुले वाडा परिसर में किसी प्रकार का धार्मिक कार्यक्रम आयोजित न हो सके।
पुराने आदेश के सामने आने के बाद हिंदू संगठनों, स्थानीय श्रद्धालुओं और वट पूर्णिमा का व्रत रखने वाली महिलाओं ने इसका विरोध किया था।

2 जून के आदेश से क्यों खड़ा हुआ था विवाद?
पुरातत्व विभाग के 2 जून के आदेश में महात्मा ज्योतिराव फुले के कर्मकांड विरोधी वैचारिक दृष्टिकोण का उल्लेख किया गया था। आदेश को विवाहित हिंदू महिलाओं द्वारा वाडा परिसर में स्थित बरगद के पेड़ की पारंपरिक पूजा पर रोक लगाने के प्रयास के रूप में देखा गया।
विरोध करने वाले संगठनों का कहना था कि महात्मा फुले के विचारों की विभागीय व्याख्या के आधार पर वर्षों पुरानी धार्मिक परंपरा को प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता।
श्रद्धालुओं ने दावा किया कि वट पूर्णिमा के अवसर पर परिसर में पूजा लंबे समय से शांतिपूर्ण तरीके से आयोजित होती रही है और इससे स्मारक की संरचना या उसके पुरातात्विक महत्व को नुकसान पहुँचने का कोई प्रमाण सामने नहीं आया है।
विरोध करने वालों ने इसे हिंदू धार्मिक परंपराओं में अनावश्यक प्रशासनिक हस्तक्षेप बताते हुए पुराना आदेश वापस लेने की माँग की थी।
हिंदू जनजागृति समिति ने सौंपा था ज्ञापन
महात्मा फुले वाडा में वट पूर्णिमा पूजा की अनुमति देने की माँग को लेकर हिंदू जनजागृति समिति ने संबंधित अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा था। यह ज्ञापन श्री हेमंत गोसावी को दिया गया था।
ज्ञापन में कहा गया था कि महात्मा फुले के वैचारिक दृष्टिकोण का हवाला देकर वर्षों से चली आ रही हिंदू परंपरा को रोका नहीं जाना चाहिए। संगठन ने माँग की थी कि पूजा को शांतिपूर्ण तरीके से आयोजित करने की अनुमति दी जाए और प्रशासन आवश्यक सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करे।
हिंदू संगठनों के साथ-साथ स्थानीय श्रद्धालुओं और वट पूर्णिमा व्रत करने वाली महिलाओं ने भी पुराने आदेश का विरोध किया। उनका कहना था कि धार्मिक पूजा और स्मारक संरक्षण के बीच संतुलन बनाया जा सकता है तथा पूर्ण प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता नहीं है।
12 पन्नों की कानूनी आपत्ति भी दाखिल
पुरातत्व विभाग के 2 जून के आदेश के विरुद्ध 12 पन्नों की कानूनी आपत्ति भी दाखिल की गई थी। आपत्ति में आरोप लगाया गया कि पूजा पर रोक लगाने का निर्णय स्मारक संरक्षण से जुड़े किसी ठोस प्रमाण या वास्तविक संरचनात्मक खतरे के आधार पर नहीं लिया गया।
कानूनी आपत्ति में कहा गया कि विभाग ने प्रभावित महिलाओं और श्रद्धालुओं का पक्ष सुने बिना आदेश जारी कर दिया। इसके अतिरिक्त न तो कोई पूर्व सूचना दी गई और न ही ऐसा पुरातात्विक अथवा संरचनात्मक साक्ष्य सार्वजनिक किया गया, जिससे यह साबित होता हो कि पारंपरिक पूजा के कारण स्मारक को नुकसान पहुँच रहा था।
आपत्ति दर्ज कराने वालों ने कहा कि किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व की विचारधारा की प्रशासनिक व्याख्या को धार्मिक गतिविधि प्रतिबंधित करने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।
नए आदेश का हिंदू संगठनों ने किया स्वागत
हिंदू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय प्रवक्ता रमेश शिंदे ने पुरातत्व विभाग के नए आदेश का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र सरकार ने हिंदू श्रद्धालुओं की चिंताओं पर ध्यान देते हुए महात्मा फुले वाडा में पारंपरिक वट पूर्णिमा पूजा जारी रखने का रास्ता साफ किया है।
रमेश शिंदे के अनुसार नया पत्र दर्शाता है कि हिंदू संगठनों, स्थानीय महिलाओं और श्रद्धालुओं की ओर से लगातार उठाई गई आपत्तियों को सरकार और प्रशासन ने गंभीरता से लिया।
उन्होंने इस घटनाक्रम को धार्मिक परंपराओं से जुड़े मुद्दों पर महाराष्ट्र की देवेंद्र फडणवीस सरकार की सकारात्मक प्रतिक्रिया का उदाहरण बताया।
फडणवीस सरकार के रुख में बदलाव के राजनीतिक मायने
महात्मा फुले वाडा विवाद पर जारी नए आदेश को केवल पुरातत्व विभाग का प्रशासनिक यू-टर्न नहीं माना जा रहा। राजनीतिक स्तर पर इसे इस संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है कि महाराष्ट्र सरकार हिंदू संगठनों, मंदिर संस्थाओं और धार्मिक समूहों की चिंताओं पर अपने निर्णयों की समीक्षा करने के लिए तैयार है।
आलोचकों का कहना था कि पुराने आदेश में धार्मिक स्वतंत्रता और परंपरागत पूजा के अधिकारों का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा गया। वहीं समर्थकों का तर्क था कि स्मारक परिसर की ऐतिहासिक पहचान और महात्मा फुले के विचारों का सम्मान किया जाना चाहिए।
नए आदेश में पहले से प्रचलित परंपराओं को जारी रखने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बात कहकर दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया गया है।
देवस्थान भूमि कानून का मसौदा भी हुआ था स्थगित
गौरतलब है कि जून 2026 में यह दूसरा अवसर है, जब हिंदू संगठनों और धार्मिक संस्थाओं के विरोध के बाद महाराष्ट्र सरकार या उसके किसी विभाग ने अपने रुख में बदलाव किया है।
इससे पहले 6 जून 2026 को महाराष्ट्र सरकार ने प्रस्तावित ‘महाराष्ट्र देवस्थान इनाम उन्मूलन मसौदा 2026’ को फिलहाल स्थगित करने की घोषणा की थी।
मसौदा 7 मई को सार्वजनिक किया गया था और सरकार ने 5 जून तक नागरिकों एवं संबंधित संस्थाओं से आपत्तियाँ और सुझाव माँगे थे। सरकार के अनुसार प्रस्तावित कानून का उद्देश्य देवस्थान की भूमि की सुरक्षा करना, अतिक्रमण हटाना और मंदिरों की संपत्तियों को कानूनी संरक्षण प्रदान करना था।
हालाँकि महाराष्ट्र मंदिर महासंघ, अष्टविनायक मंदिर समिति, विश्व हिंदू परिषद और विभिन्न मंदिर ट्रस्टों ने मसौदे के कुछ प्रावधानों को लेकर गंभीर चिंता जताई थी।
इन संगठनों का कहना था कि कुछ प्रावधानों के कारण देवस्थान की भूमि पर मंदिरों और मंदिर ट्रस्टों का नियंत्रण कमजोर हो सकता है। संगठनों ने आशंका व्यक्त की थी कि वर्तमान कब्जाधारियों, खेती करने वालों, पुजारियों, प्रबंधकों और अन्य पक्षों को अधिकार मिलने से भविष्य में मंदिर संपत्तियों से जुड़े विवाद बढ़ सकते हैं।
15 अगस्त तक आपत्तियों पर सुनवाई
नागपुर में मीडिया से बात करते हुए महाराष्ट्र के राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने घोषणा की थी कि प्रस्तावित देवस्थान भूमि कानून के मसौदे को फिलहाल स्थगित किया जा रहा है।
उन्होंने बताया था कि मसौदे को लेकर प्राप्त आपत्तियों और सुझावों पर 15 अगस्त तक सुनवाई जारी रहेगी। बावनकुले ने कहा था कि प्रस्तावित कानून को लेकर कई प्रकार की गलतफहमियाँ पैदा हुई हैं, जिन्हें दूर करने के लिए व्यापक परामर्श आवश्यक है।
उन्होंने यह भी दोहराया था कि सरकार का मूल उद्देश्य मंदिरों की जमीन की सुरक्षा करना और उसे अतिक्रमण मुक्त बनाना है।
मंदिर संगठनों ने मसौदा स्थगित किए जाने के फैसले का स्वागत किया था। महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के राष्ट्रीय संयोजक सुनील घनवट ने इसे मंदिर ट्रस्टियों, धार्मिक संस्थाओं और हिंदू संगठनों के सामूहिक प्रयासों की सफलता बताया था।
एक महीने में दूसरी बार बदला सरकारी रुख
देवस्थान भूमि कानून के मसौदे और महात्मा फुले वाडा विवाद को एक साथ जोड़कर देखा जा रहा है। दोनों मामलों में हिंदू संगठनों, धार्मिक संस्थाओं और श्रद्धालुओं ने सरकारी निर्णयों पर आपत्ति जताई थी।
देवस्थान भूमि कानून के मामले में सरकार ने मसौदा स्थगित कर व्यापक चर्चा का रास्ता चुना। वहीं महात्मा फुले वाडा मामले में पुरातत्व विभाग ने पुराने आदेश के स्थान पर नया पत्र जारी कर पहले से चली आ रही परंपराओं और धार्मिक प्रथाओं को जारी रखने की अनुमति दी।
महात्मा फुले वाडा में वट पूर्णिमा पूजा को लेकर जारी नया आदेश फिलहाल विवाद को शांत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अब स्थानीय पुलिस और पुरातत्व विभाग की जिम्मेदारी होगी कि पूजा के दौरान श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं, स्मारक की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था—तीनों के बीच उचित संतुलन बनाए रखा जाए।
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