पाकिस्तान इन दिनों बाहरी और अंदरूनी संकटों से जूझ रहा है। एक तरफ वह अमेरिका और अन्य देशों के साथ संबंधों के जरिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी स्थिति मजबूत दिखाने की कोशिश कर रहा है, वहीं देश के भीतर हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के हमलों, बलूचिस्तान में अलगाववादी हिंसा और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में जनता के विरोध प्रदर्शनों ने इस्लामाबाद की ‘एकता’ और ‘स्थिरता’ के दावों की पोल खोल दी है।
TTP का बढ़ता खतरा और सरकार विरोधी अभियान
खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में हाल ही में हुए एक हमले में TTP ने पाकिस्तानी सुरक्षाबलों को निशाना बनाया। हमलावरों ने पहले सड़क किनारे बम (IED) विस्फोट किया और फिर गोलीबारी शुरू कर दी, जिसमें 11 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए। यह हमला उस एयरफोर्स बमबारी की प्रतिक्रिया बताया जा रहा है, जिसमें 30 आम नागरिकों की मौत हुई थी।
TTP का मकसद मौजूदा पाकिस्तानी सरकार को उखाड़ फेंककर कट्टर इस्लामी शासन स्थापित करना है। यह संगठन अफगानिस्तान की सीमा से लगे इलाकों में सक्रिय है और वहीं से हमलों की योजना बनाता है। हालांकि, काबुल ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि अफगानिस्तान अपनी जमीन किसी अन्य देश के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होने देता।
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच 2,600 किलोमीटर लंबी सीमा डूरंड रेखा को लेकर विवाद का केंद्र रही है। पाकिस्तान इसे अंतरराष्ट्रीय सीमा मानता है, जबकि तालिबान इसे ‘थोपी गई’ और ‘अवैध’ सीमा मानता है। इस सीमा पर बाड़ लगाने की पाकिस्तान की कोशिशों का तालिबान लगातार विरोध करता है, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव बना रहता है।
बलूचिस्तान: संसाधनों से समृद्ध, फिर भी सबसे गरीब
बलूचिस्तान में अलगाववादी गतिविधियाँ लगातार बढ़ रही हैं। यहाँ बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने हाल के महीनों में कई आतंकी हमले किए हैं। खासकर जाफर एक्सप्रेस ट्रेन को बार-बार निशाना बनाया गया है।
7 अक्टूबर 2025 को सिंध-बलूचिस्तान सीमा पर जाफर एक्सप्रेस पर हुए IED विस्फोट में कई लोग घायल हुए। सितंबर 2025 में भी इसी ट्रेन के एक कोच को उड़ाया गया था, जबकि अगस्त 2025 में मस्तुंग जिले में हुए धमाके से इसके छह डिब्बे पटरी से उतर गए थे।
बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा और सबसे समृद्ध प्रांत है, जहाँ कोयला, तांबा, सोना और प्राकृतिक गैस जैसे खनिजों की प्रचुरता है। इसके बावजूद यह पाकिस्तान का सबसे गरीब इलाका है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि 1948 में पाकिस्तान द्वारा जबरन कब्जा किए जाने के बाद से इस क्षेत्र को लगातार लूटा गया है। सरकारी उपेक्षा, दमनकारी नीतियाँ और आर्थिक शोषण ने लोगों में अलगाव की भावना को गहरा कर दिया है। यही वजह है कि BLA जैसी संगठन ‘आजादी’ की मांग को लेकर सक्रिय हैं।
POK में जनता बनाम सरकार
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में भी हालात बिगड़ते जा रहे हैं। सितंबर 2025 के अंत से यहाँ के नागरिकों ने इस्लामाबाद की ‘दमनकारी नीतियों’ के खिलाफ व्यापक प्रदर्शन शुरू किए हैं। लोग बिजली, पानी और खाद्य आपूर्ति जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे हैं, साथ ही राजनीतिक आत्म-सम्मान और न्याय की भी आवाज उठा रहे हैं।
हालांकि, पाकिस्तानी सरकार ने इन प्रदर्शनों को शांत करने के बजाय दमनकारी रुख अपनाया। पुलिस और सुरक्षाबलों के साथ झड़प में 12 नागरिकों की मौत हुई और पूरे क्षेत्र में कर्फ्यू जैसा माहौल बन गया। सरकार ने इंटरनेट सेवाएँ बंद कर दीं और संचार व्यवस्था पर रोक लगा दी।
अंतर्कलह से जूझता पाकिस्तान
पाकिस्तान के सामने यह स्थिति उसकी नीतियों की असफलता को दर्शाती है। एक तरफ देश के भीतर आतंकवाद, अलगाववाद और जनता के असंतोष का संकट है, वहीं दूसरी ओर सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘स्थिर और मजबूत’ दिखने की कोशिश कर रही है।
TTP के बढ़ते हमले, बलूचिस्तान में आजादी की मांग, और PoK में विरोध—ये सब दिखाते हैं कि पाकिस्तान के भीतर असंतोष गहराता जा रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान अपने ही नागरिकों की आवाज सुनने के बजाय बाहरी शक्तियों के सहारे अपनी सत्ता बचाने में लगा रहेगा?