महाराष्ट्र में समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की दिशा में महायुति सरकार ने प्रक्रिया तेज कर दी है। राज्य के गृह राज्य मंत्री योगेश कदम ने विधानसभा में जानकारी दी कि मुख्यमंत्री की मंजूरी के बाद सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति गठित की जा रही है। यह समिति राज्य के लिए UCC का मसौदा तैयार करेगी और अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगी।
योगेश कदम ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार समान नागरिक संहिता लागू करने को लेकर सकारात्मक और प्रतिबद्ध है। समिति की रिपोर्ट तथा मसौदा मिलने के बाद सरकार आगे की कानूनी और विधायी प्रक्रिया पर निर्णय लेगी।
हालाँकि अभी महाराष्ट्र में UCC लागू नहीं हुआ है। फिलहाल सरकार ने समिति और मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया की घोषणा की है। प्रस्तावित कानून को लागू करने के लिए प्रारूप, मंत्रिमंडल की मंजूरी, विधानसभा की प्रक्रिया और आवश्यक संवैधानिक औपचारिकताओं से गुजरना होगा।
#WATCH मुंबई: महाराष्ट्र सरकार के मंत्री योगेश कदम ने UCC पर कहा,"UCC महाराष्ट्र में लागू होना चाहिए ये जो मांग है वो UCC लागू करने के लिए एक समिति गठित की जाएगी। जिसका सीएम ने आदेश दिया हुआ है। समिति गठित होने के बाद जो भी निष्कर्ष आएगा उसके हिसाब से महाराष्ट्र में इसे लागू किया… pic.twitter.com/TGDDrHLKsf
— ANI_HindiNews (@AHindinews) June 23, 2026
उत्तराखंड सहित दूसरे राज्यों के मॉडल का होगा अध्ययन
प्रस्तावित विशेषज्ञ समिति उत्तराखंड में लागू समान नागरिक संहिता के प्रावधानों के साथ अन्य राज्यों में तैयार किए गए कानूनों और प्रस्तावों का अध्ययन करेगी। समिति विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति के अधिकार, भरण-पोषण और बहुविवाह जैसे विषयों पर महाराष्ट्र की सामाजिक तथा कानूनी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए मसौदा तैयार कर सकती है।
सरकार की ओर से सार्वजनिक सुझाव लेने की बात भी कही गई है। इससे विभिन्न समुदायों, महिला संगठनों, कानूनी विशेषज्ञों और अन्य हितधारकों को अपनी राय रखने का अवसर मिल सकता है।
गृह राज्य मंत्री ने उत्तराखंड का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ लागू UCC में बहुविवाह पर रोक लगाई गई है। उनके मुताबिक महाराष्ट्र सरकार भी प्रस्तावित कानून में बहुविवाह और महिलाओं के समान अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर विचार करेगी।
#WATCH मुंबई | UCC पर महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कहा, "यूनिफॉर्म सिविल कोड के बारे में शिवसेना पहले से ही सकारात्मक है बालासाहब ठाकरे जी की भूमिका शुरू से ही वही रही है। देश में एक ही कानून होना चाहिए, सभी को न्याय मिलना चाहिए… इस पर हमारी भी भूमिका सकारात्मक… pic.twitter.com/08bqOna5vm
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क्या है समान नागरिक संहिता?
समान नागरिक संहिता का उद्देश्य विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, संपत्ति के बँटवारे और पारिवारिक मामलों के लिए धर्म से अलग एक समान नागरिक कानून बनाना है।
वर्तमान में भारत में अलग-अलग धार्मिक समुदायों से जुड़े कई पारिवारिक विषय विभिन्न पर्सनल लॉ के अंतर्गत आते हैं। UCC लागू होने पर इन विषयों में नागरिकों पर समान नियम लागू करने का प्रस्ताव होता है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य से नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करने की अपेक्षा की गई है। हालाँकि इसे लागू करने के स्वरूप, धार्मिक स्वतंत्रता, सामाजिक विविधता और व्यक्तिगत अधिकारों को लेकर देश में लंबे समय से राजनीतिक तथा कानूनी बहस चलती रही है।
तीन तलाक के मुद्दे से शुरू हुई चर्चा
महाराष्ट्र विधानसभा में UCC पर चर्चा की शुरुआत भाजपा विधायक देवयानी फरांडे द्वारा पेश किए गए ध्यानाकर्षण प्रस्ताव से हुई। उन्होंने नासिक सहित राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में मुस्लिम महिलाओं के साथ कथित तत्काल तीन तलाक, धमकी और उत्पीड़न के मामलों का मुद्दा उठाया।
फरांडे ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा तत्काल तीन तलाक को अपराध घोषित किए जाने के बावजूद कुछ महिलाएँ अभी भी इस प्रकार की शिकायतें लेकर सामने आ रही हैं। उन्होंने ऐसे मामलों का उल्लेख किया, जिनमें महिलाओं को फोन पर तलाक देने, उनके निजी वीडियो सार्वजनिक करने की धमकी देने, मारपीट करने और बिना आर्थिक सहायता के छोड़ने के आरोप लगाए गए।
उन्होंने सरकार से पूछा कि कानून मौजूद होने के बावजूद पीड़ित महिलाओं को समय पर सुरक्षा और न्याय क्यों नहीं मिल पा रहा है। इसके साथ ही उन्होंने महाराष्ट्र में बहुविवाह पर रोक और UCC लागू करने की समयसीमा को लेकर भी सरकार से स्थिति स्पष्ट करने की माँग की।
सभी प्रकार के तीन तलाक पर नहीं है प्रतिबंध
संसद द्वारा पारित मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2019 के अंतर्गत तलाक-ए-बिद्दत या इसी प्रकार तत्काल और अपरिवर्तनीय रूप से दिया गया तलाक शून्य तथा गैरकानूनी है।
यह कानून किसी मुस्लिम पति द्वारा बोलकर, लिखकर, फोन, संदेश, ईमेल या अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से तत्काल और अपरिवर्तनीय तलाक देने पर लागू होता है। दोषी पाए जाने पर अधिकतम तीन वर्ष की जेल और जुर्माना हो सकता है।
कानून पीड़ित महिला को अपने तथा आश्रित बच्चों के लिए भरण-पोषण भत्ता माँगने और नाबालिग बच्चों की अभिरक्षा का दावा करने का अधिकार भी देता है।
इसलिए कानूनी रूप से यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 2019 का केंद्रीय कानून प्रत्येक प्रकार की तलाक प्रक्रिया को अपराध घोषित नहीं करता, बल्कि तत्काल प्रभाव से विवाह समाप्त करने वाले तलाक-ए-बिद्दत को प्रतिबंधित करता है।
दो वर्षों में तीन तलाक से जुड़ी 81 शिकायतें
गृह राज्य मंत्री योगेश कदम ने विधानसभा में तीन तलाक से जुड़े मामलों के आँकड़े भी प्रस्तुत किए। मंत्री के अनुसार वर्ष 2024 में महाराष्ट्र में 42 मामले दर्ज किए गए।
इन मामलों में बड़ी संख्या में आरोपियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की गई। वर्ष 2025 में तीन तलाक से संबंधित 39 मामले दर्ज हुए, जिनमें 137 आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई और 95 गिरफ्तारियाँ होने की जानकारी दी गई।
दोनों वर्षों को मिलाकर राज्य में कुल 81 शिकायतें दर्ज होने की बात सामने आई। मंत्री ने कहा कि ये आँकड़े बताते हैं कि कानून लागू होने के बावजूद तत्काल तलाक से जुड़े मामले पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।
उन्होंने पुलिस को ऐसे मामलों में संवेदनशीलता और तत्परता से कार्रवाई करने तथा पीड़ित महिलाओं को आवश्यक सुरक्षा उपलब्ध कराने की बात कही।
नासिक के मामलों का विधानसभा में उल्लेख
चर्चा के दौरान नासिक से सामने आए कुछ मामलों का विशेष रूप से उल्लेख किया गया। एक शिकायत में महिला ने आरोप लगाया था कि उसके पति ने फोन पर तत्काल तलाक दे दिया। शिकायत के बाद संबंधित प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया।
बताया गया कि मामला दर्ज होने के कुछ दिनों बाद महिला पर कथित हमले का प्रयास भी हुआ, जिसके बाद एक अन्य आपराधिक मामला दर्ज कर आरोपित के खिलाफ कार्रवाई की गई।
विधायक देवयानी फरांडे ने दावा किया कि हाल के दिनों में कई महिलाओं ने उनसे संपर्क कर धमकी, घरेलू हिंसा, आर्थिक उत्पीड़न और तत्काल तलाक से संबंधित शिकायतें की हैं।
विधानसभा में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बहस
तीन तलाक और UCC पर चर्चा के दौरान विधानसभा में सत्ता पक्ष और विपक्ष के सदस्यों के बीच तीखी बहस हुई। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी-शरद पवार गुट के विधायक जयंत पाटिल ने प्रश्न उठाया कि इस विषय पर ध्यानाकर्षण प्रस्ताव को सदन में तत्काल चर्चा के लिए क्यों स्वीकार किया गया।
कांग्रेस नेता विजय वडेट्टीवार ने कहा कि तत्काल तीन तलाक से संबंधित कानून संसद द्वारा बनाया गया केंद्रीय कानून है। उन्होंने सवाल किया कि राज्य विधानसभा में इसी स्वरूप में इस मुद्दे पर चर्चा की आवश्यकता क्यों पड़ी।
एनसीपी विधायक सना मलिक ने कहा कि महिलाओं के विरुद्ध हिंसा और उत्पीड़न किसी एक धर्म या समुदाय तक सीमित नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि केवल मुस्लिम महिलाओं के मामलों को अलग करके देखने के बजाय सभी समुदायों की महिलाओं की सुरक्षा पर समान रूप से चर्चा होनी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि तत्काल और अपरिवर्तनीय तलाक तथा अन्य तलाक प्रक्रियाओं में कानूनी अंतर को स्पष्ट रूप से समझा जाना चाहिए।
‘देश संविधान के अनुसार चलता है’
सना मलिक की टिप्पणियों पर भाजपा विधायकों ने आपत्ति जताई। भाजपा विधायक अतुल भातखलकर ने कहा कि देश का शासन संविधान के अनुसार चलता है और सभी नागरिक समान संवैधानिक व्यवस्था के अधीन हैं।
सत्ता पक्ष के सदस्यों ने कहा कि महिलाओं के साथ अन्याय को धार्मिक परंपरा या पर्सनल लॉ के नाम पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। वहीं विपक्षी सदस्यों ने सरकार से किसी समुदाय को निशाना बनाए बिना व्यापक परामर्श करने की माँग की।
इस दौरान सदन में कई बार व्यवधान और तीखी नोकझोंक की स्थिति बनी। विधानसभा अध्यक्ष ने विषय को सामाजिक रूप से गंभीर बताते हुए सदस्यों से चर्चा जारी रखने को कहा।
सरकार ने कहा—किसी धर्म के खिलाफ नहीं होगा UCC
गृह राज्य मंत्री योगेश कदम ने कहा कि प्रस्तावित समान नागरिक संहिता का उद्देश्य किसी धर्म, समुदाय या व्यक्ति को निशाना बनाना नहीं है। सरकार का ध्यान महिलाओं को समान अधिकार, सुरक्षा, सम्मान और न्याय दिलाने पर है।
उन्होंने कहा कि भविष्य में तैयार होने वाला मसौदा धर्म के आधार पर भेदभाव किए बिना सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक नियमों की व्यवस्था पर केंद्रित होगा।
सरकार के अनुसार विवाह, तलाक, भरण-पोषण और पारिवारिक अधिकारों के मामले में महिलाओं को समान कानूनी संरक्षण देना प्रस्तावित UCC का प्रमुख उद्देश्य रहेगा।
बहुविवाह पर भी हो सकता है प्रावधान
विधानसभा में बहुविवाह का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। देवयानी फरांडे ने पाकिस्तान सहित कुछ देशों में दूसरे विवाह से पहले पहली पत्नी की सहमति या संबंधित प्राधिकरण की अनुमति जैसी व्यवस्थाओं का उल्लेख किया।
उन्होंने पूछा कि महाराष्ट्र में महिलाओं के हितों की रक्षा के लिए बहुविवाह पर स्पष्ट प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जाना चाहिए।
योगेश कदम ने उत्तर दिया कि प्रस्तावित UCC लागू होने पर बहुविवाह से संबंधित मुद्दों को भी उसके कानूनी ढाँचे में शामिल किया जाएगा। उन्होंने उत्तराखंड के कानून का उदाहरण देते हुए कहा कि महाराष्ट्र की समिति वहाँ के प्रावधानों का अध्ययन करेगी।
हालाँकि महाराष्ट्र के प्रस्तावित मसौदे में बहुविवाह के उल्लंघन पर क्या सजा होगी, यह समिति की रिपोर्ट और अंतिम विधेयक सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा।
समिति की रिपोर्ट के बाद तय होगा अगला कदम
सरकार द्वारा बनाई जा रही समिति विभिन्न कानूनों, न्यायालयों के फैसलों, दूसरे राज्यों के अनुभवों और जनता की राय का अध्ययन कर सकती है। इसके बाद समिति महाराष्ट्र के लिए एक विस्तृत मसौदा प्रस्तुत करेगी।
मसौदे में किन समुदायों पर कानून लागू होगा, क्या अपवाद रखे जाएँगे, विवाह पंजीकरण की प्रक्रिया क्या होगी और उत्तराधिकार तथा संपत्ति से संबंधित अधिकार किस प्रकार तय किए जाएँगे, जैसे प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है।
सरकार को यह भी तय करना होगा कि महाराष्ट्र की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता को ध्यान में रखते हुए समान नियमों को किस प्रकार लागू किया जाए।
फिलहाल राज्य सरकार ने अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता जाहिर कर दी है, लेकिन कानून का अंतिम स्वरूप समिति की रिपोर्ट, सार्वजनिक परामर्श और विधानसभा में होने वाली विधायी प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।
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