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Reading: धीरज साहू के ₹500 करोड़ जायज, क्योंकि कॉन्ग्रेस को भी चुनाव लड़ना है: रघुराम राजन आप ‘अर्थशास्त्री’ ही हैं या ‘चम्मच’
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धीरज साहू के ₹500 करोड़ जायज, क्योंकि कॉन्ग्रेस को भी चुनाव लड़ना है: रघुराम राजन आप ‘अर्थशास्त्री’ ही हैं या ‘चम्मच’

पिछले कुछ सालों में रघुराम राजन ने अपनी भूमिका अर्थशास्त्री की जगह पॉलिटिकल एक्टिविस्ट की कर ली है। बावजूद उनसे इस थेथरई की उम्मीद शायद ही किसी ने की हो कि वे कॉन्ग्रेस सांसद के ठिकानों से मिले नोटों के पहाड़ को भी लोकतंत्र के नाम पर सही ठहरा देंगे।

Last updated: 2023/12/12 at 3:34 PM
One India News Team
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भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन (Raghuram Rajan) ने कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद धीरज साहू के ठिकानों से मिले ₹500 करोड़ को सही ठहराया है। उनका कहना है कि चुनाव लड़ने के लिए पैसे चाहिए होते हैं, इसलिए विपक्षी दलों का कालाधन रखना कोई गलत बात नहीं है।

रघुराम राजन ने ये बातें ‘द रेड माइक’ (The Red Mike) नाम के यूट्यूब चैनल को दिए इंटरव्यू में कही है। रघुराम राजन का कहना है कि सरकार में रहने वाला दल वैध पैसों से चुनाव लड़ सकता है, इसलिए उसे कोई समस्या नहीं होती। विपक्ष को भी चुनाव लड़ने के लिए पैसा चाहिए होता है, इसलिए वह कालाधन रखते हैं जो कि गलत नहीं है।

जब रघुराम राजन से यूट्यूब चैनल के एंकर ने भारत में इलेक्टोरल बांड्स को लेकर प्रश्न पूछा तो उन्होंने कहा, ” इलेक्टोरल बांड राजनीतिक दलों को पैसा देने का सबसे अपारदर्शी तरीका हैं। किसने दिया और क्या मिला उनको देकर, किसी को कुछ नहीं पता इस बारे में। ऐसे में यह पार्टियों को फाइनेंस करने का कैसे पारदर्शी तरीका हो सकता है।”

जब यूट्यूबर ने उनसे पूछा कि क्या यह नकद के जितना ही बुरा है, तो उन्होंने कहा, “यह नकद रखने से भी अधिक बुरा है, क्योंकि इस बारे में केवल स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया को पता है।” आगे रघुराम राजन ने सरकार को कठघरे में खड़े करके विपक्षी नेताओं के करोड़ों में नकद इकट्ठा करने को सही ठहराने लगे। आप उनके यह दावे इस वीडियो में 33 मिनट के बाद से सुन सकते हैं।

आरबीआई के पूर्व गवर्नर ने कहा, “सरकार में रहने वाली पार्टी के पास पैसा इकट्ठा करने के लिए ‘अनफेयर एडवांटेज’ होती है। इसलिए वो हमेशा वैध पैसा पाते हैं। विपक्ष को चुनाव लड़ने के लिए कालेधन का इस्तेमाल करना पड़ता है। चुनाव कैसे लड़े जाते हैं, वो पैसे से लड़े जाते हैं। सरकार वाले चेक बना कर पैसा ले सकते हैं, विपक्ष वालों को नकद नोटों के बण्डल लेने पड़ते हैं।”

रघुराम राजन ने आगे कहा, “आप चुनाव में वैध स्रोतों से पैसा लेकर और कालाधन लेकर चुनाव लड़ने वाले विपक्ष पर ED और CBI की जाँच करवा कर मुकाबला गैर बराबरी का बना रहे हैं। यह स्वच्छ चुनाव प्रक्रिया नहीं है।”

कुल मिलाकर रघुराम राजन का कहना है कि यदि कोई विपक्षी दल भ्रष्टाचार से कमाए गए पैसे के बल पर चुनाव लड़ता है तो यह गलत नहीं है क्योंकि अधिकांश लोग सत्तारूढ़ दल को ही चंदा देते हैं। उनका यह भी कहना है कि सरकार में बैठे दल को ज्यादा चंदा मिलता है इसलिए विपक्षी दलों को भ्रष्टाचार या फिर अवैध स्रोत से कमाए गए पैसे का सहारा लेना पड़ता है। ऐसे में यदि सरकार अवैध तरीके से जुटाए गए पैसे पर कार्रवाई करें तो यह गलत है और इससे सरकार तथा विपक्ष के बीच चुनावी मुकाबला बराबरी का नहीं रह जाता।

इस प्रकार के कुतर्क देकर रघुराम राजन यह सिद्ध करना चाह रहे हैं कि विपक्षी दल यदि अवैध स्रोतों से पैसा लेते हैं तो यह कहीं से भी गलत नहीं है। हाँ, इस अवैध पैसे पर कार्रवाई जरूर गलत है। कार्रवाई होने से चुनावों में सत्ताधारी दल को इससे बढ़त मिल जाती है।

रघुराम राजन वर्तमान सरकार के अंध विरोधी हैं। इसलिए विपक्ष की चिंता में उनका दुबला होना जायज है। लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि वैध तरीकों से सत्तारूढ़ दल हो या विपक्ष पैसा जुटाना गलत नहीं है। लोकतंत्र के हित में भी यही है। लेकिन जब सत्ताधारी दल हो या विपक्ष, वह अवैध तरीके से पैसे इकट्ठा करने लगे तो वह न अर्थव्यवस्था के हित में है और न लोकतंत्र के।

अवैध धन का यह कहकर बचाव नहीं किया जा सकता कि सत्ता में रहने वाले दल के पास बढ़त होती है। ऐसा कह कर रघुराम राजन एक प्रकार से विपक्ष के राजनीतिक भ्रष्टाचार को सही ठहरा रहे हैं।

रघुराम राजन का कहना है कि इलेक्टोरल बांड के जरिए पार्टियों को मिलने वाले पैसे का स्रोत पता नहीं लगता, इसलिए यह अपारदर्शी है। वह इसके बदले नकद लेनदेन को अधिक पारदर्शी बताते हैं। क्या रघुराम राजन यह बता सकते हैं कि कॉन्ग्रेस के सांसद धीरज साहू के यहाँ पकड़े गए पैसे का स्रोत क्या है?

पार्टियों को इलेक्टोरल बांड के जरिए मिलने वाला फंड बैंकिंग सिस्टम से होकर आता है। ऐसे में बैंकिंग सिस्टम में घुसने से पहले और इसके बाद इसके स्रोत के बारे में कम से कम देश की एजेंसियों की तो पता चलता ही होगा। वहीं नकद पैसे का स्रोत कोई भी एजेंसी आसानी से पता नहीं लगा सकती।

क्या रघुराम राजन चाहते हैं कि इलेक्टोरल बांड जैसी व्यवस्था हटा कर पार्टियों को मिलने वाला सारा पैसा नकद में हो? हालाँकि, ऐसा मूर्खतापूर्ण दावा वो पहली बार नहीं कर रहे हैं, इससे पहले भी उन्होंने ऐसे कई सुझाव दिए हैं। मसलन महँगाई से लड़ने को ₹5,000 और ₹10,000 के नोट चलाना या फिर देश में चीजों को निर्माण बढ़ाने को प्रयास ना करने की सलाह।

इतना ही नहीं राजन अपने अनुमानों में भी गलत हो चुके हैं। उन्होंने दिसम्बर 2022 में राहुल गाँधी के साथ के एक बातचीत में कहा था कि हम 5% जीडीपी वृद्धि दर पाकर भाग्यशाली होंगे। हालाँकि, यह उनका अनुमान हो या मनोकामना, दोनों ही गलत सिद्ध हुए और 2022-23 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7.2% रही।

जाहिर है कि पिछले कुछ सालों में रघुराम राजन ने अपनी भूमिका अर्थशास्त्री की जगह पॉलिटिकल एक्टिविस्ट की कर ली है। बावजूद उनसे इस थेथरई की उम्मीद शायद ही किसी ने की हो कि वे कॉन्ग्रेस सांसद के ठिकानों से मिले नोटों के पहाड़ को भी लोकतंत्र के नाम पर सही ठहरा देंगे।

 

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