CSDS के संजय कुमार द्वारा यह स्वीकार कर लेने के बाद कि उन्होंने महाराष्ट्र के संदर्भ में जो वोट बढ़ने का डेटा दिया था, वह पूरी तरह ग़लत और भ्रामक था, राजनीतिक हलकों में बड़ी हलचल मच गई है। शुरुआत में उन्होंने जो आँकड़े जारी किए, उन्हें कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने अपने बयानों और टीवी डिबेट्स में बड़े आत्मविश्वास से दोहराया। यह डेटा न केवल मीडिया में चर्चा का विषय बना बल्कि सोशल मीडिया पर भी इसे कांग्रेस समर्थकों ने बड़े पैमाने पर प्रचारित किया। इस पूरे घटनाक्रम से लोगों के बीच एक कृत्रिम धारणा बनाने की कोशिश की गई कि महाराष्ट्र में विपक्ष की स्थिति बहुत मजबूत हो रही है।
कांग्रेस के पवन खेड़ा, इमरान प्रतापगढ़ी समेत कई नेताओं ने इस फ़र्ज़ी आँकड़े को अपना कर ट्वीट्स किए और टीवी चैनलों पर जाकर इसे तथ्य की तरह प्रस्तुत किया। लेकिन जैसे ही सच सामने आया और संजय कुमार ने स्वीकार किया कि यह डेटा गलत था, उन्हीं नेताओं ने चुपचाप अपने ट्वीट्स डिलीट कर दिए। हैरानी की बात यह है कि किसी ने भी सार्वजनिक रूप से अपनी गलती मानकर माफी नहीं मांगी। इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि यह एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा था, न कि मासूम भूल।
इस बीच राहुल गांधी ने भी इस ग़लत डेटा को आधार बनाकर खुद को डेटा एक्सपर्ट की तरह प्रस्तुत किया। उन्होंने पीपीटी के माध्यम से मंचों पर दिखाया कि कैसे विपक्ष की स्थिति मजबूत है और तेजस्वी यादव जैसे नेताओं को भी इस “डेटा आधारित राजनीति” में अपने साथ शामिल कर लिया। इस तरह यह केवल एक आंकड़ा नहीं रहा, बल्कि एक राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने का उपकरण बन गया। कई दिनों तक संजय कुमार खामोश रहे और जब चुनाव आयोग ने इस मामले को गंभीरता से लेना शुरू किया, तब जाकर उन्होंने अंग्रेज़ी में ट्वीट करके माफी मांग ली, मानो अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया हो।
यह पूरा प्रकरण केवल संजय कुमार या कांग्रेस के प्रवक्ताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यापक रूप से उस मानसिकता को दर्शाता है जिसमें जनता को गुमराह करने के लिए झूठे आंकड़े और फर्जी नैरेटिव गढ़े जाते हैं। यही कारण है कि अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या अलग-अलग संस्थानों में ऐसे और भी “संजय कुमार” बैठे हैं, जो राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं।
राहुल गांधी और उनके करीबी रणनीतिकारों की राजनीति का यही तरीका बन चुका है—जनता के बीच अविश्वास और अराजकता का माहौल खड़ा करो और भ्रम फैलाकर अपने लिए जगह बनाने की कोशिश करो। लेकिन आज का भारत 10 या 20 साल पहले वाला भारत नहीं है। अब जनता कहीं अधिक जागरूक, डिजिटल रूप से सशक्त और राजनीतिक रूप से परिपक्व हो चुकी है। लोग फर्जी आंकड़ों और भ्रामक नैरेटिव्स के पीछे छिपे इरादों को पहचानने लगे हैं।
इसलिए, भले ही संजय कुमार जैसे लोग अपनी गलती स्वीकार कर माफी मांग लें, और कांग्रेस के प्रवक्ता चुपचाप अपने ट्वीट्स हटा दें, जनता के मन में यह छवि साफ़ बन चुकी है कि यह सब केवल अराजक राजनीति का हिस्सा है। राहुल गांधी और उनकी टीम चाहे जितनी बार ऐसे प्रयास करें, अंततः जनता ही तय करेगी कि देश किस दिशा में जाएगा—और जनता ने बार-बार यह साबित किया है कि वह झूठ और भ्रमजाल के पीछे नहीं जाएगी।
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