सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को बड़ा झटका देते हुए कर्मचारियों के महंगाई भत्ते (DA) को उनका वैधानिक अधिकार करार दिया है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस पी.के. मिश्रा की बेंच ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह 2009 से 2019 तक का बकाया DA जारी करे। अदालत ने कहा कि ROPA नियमों के तहत परिलब्धियों की गणना के लिए DA अनिवार्य है और इसे देने से वित्तीय तंगी का हवाला देकर इनकार नहीं किया जा सकता।
वित्तीय संकट की दलील खारिज, विशेष समिति का गठन
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की उस दलील को खारिज कर दिया जिसमें वित्तीय क्षमता का हवाला देकर कर्मचारियों को DA देने से बचने की कोशिश की गई थी। अदालत ने भुगतान की प्रक्रिया तय करने के लिए पूर्व जस्टिस इंदु मल्होत्रा की अध्यक्षता में एक विशेष समिति गठित की है। इस समिति में दो सेवानिवृत्त हाई कोर्ट मुख्य न्यायाधीश और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) के वरिष्ठ अधिकारी शामिल होंगे।
ROPA नियम और अनुच्छेद 309 पर कोर्ट की अहम टिप्पणी
यह फैसला उन अपीलों पर आया है, जो राज्य सरकार ने कर्मचारियों के पक्ष में आए पिछले फैसलों के खिलाफ दायर की थीं। कोर्ट ने अनुच्छेद 309 की शक्तियों और ROPA नियमों के विस्तार सहित 13 महत्वपूर्ण कानूनी सवालों पर विचार किया। बेंच ने कहा कि DA एक गतिशील (Dynamic) तत्व है और नियमों में बदलाव संभव है, लेकिन राज्य सरकार द्वारा DA नियमों में बदलाव ‘मनमाना’ और ‘सनकी’ था।
‘वैध अपेक्षा’ सिद्धांत पर जोर, मौलिक अधिकार का सवाल खुला
अदालत ने कहा कि नियमों में बदलाव से कर्मचारियों के भीतर ‘वैध अपेक्षा’ (Legitimate Expectation) पैदा हुई थी, जिसका उल्लंघन बिना ठोस आधार के नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वित्तीय नीति किसी दिए गए अधिकार के रास्ते में बाधा नहीं बन सकती। हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि साल में दो बार DA देना अनिवार्य नहीं है और महंगाई भत्ते को मौलिक अधिकार मानने का सवाल भविष्य के लिए खुला रखा गया है।
हमारी यूट्यूब चैनल को लाइक, शेयर और सब्सक्राइब करे
Like, Share and Subscribe our YouTube channel