प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राम मंदिर के मुख्य शिखर पर धर्म ध्वज की स्थापना एक साधारण रस्म नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक क्षण के रूप में देखा जा रहा है। यह वह पल है जिसमें सदियों की प्रतीक्षा, अनगिनत संघर्ष और करोड़ों राम भक्तों की भावनाएँ एक साथ आकाश की ओर उठीं। भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के प्रतीक इस ध्वज को देश का बड़ा वर्ग गर्व, आस्था और सभ्यता के पुनरुत्थान के रूप में देख रहा है। लेकिन वहीं, लिबरल और वामपंथी वर्ग का एक हिस्सा इससे असहज दिखाई दे रहा है—जिसमें पड़ोसी देश पाकिस्तान भी शामिल है।
लिबरल वर्ग के कुछ लोगों ने इस बात पर सवाल उठाया कि राम मंदिर पर धर्म ध्वज फहराने स्वयं प्रधानमंत्री क्यों गए। जब प्रधानमंत्री मंदिर के उद्घाटन समारोह में शामिल हुए थे, तब भी यही समूह बेचैनी दिखा चुका है। CPI के महासचिव डी. राजा भी इसी श्रेणी में आते हैं, जिन्होंने X पर लंबा विरोध-पत्र लिखकर कहा कि प्रधानमंत्री का भगवा झंडा फहराना “संविधान पर आधारित बहुलवाद के खिलाफ” है और इसे RSS की विचारधारा को वैध ठहराने का प्रयास बताया। उन्होंने तिरंगे को ही राष्ट्र का एकमात्र प्रतीक बताते हुए इस घटना को “तमाशा” कहने तक की कोशिश की। हालांकि, वे यह भूल गए कि तिरंगा सम्मानित राष्ट्रीय ध्वज है, परंतु भगवा ध्वज इस सभ्यता की हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक आत्मा का प्रतिनिधि है, जिसकी हिंदू समाज में अत्यधिक श्रद्धा है।
Despite the Supreme Court verdict stating that the demolition of the Babri Masjid was a criminal act, for which no one has been held accountable, PM Modi stands before the nation, raising a saffron flag in Ayodhya and claiming it as the symbol of “resurgence of Indian… pic.twitter.com/k9fQOqGGQB
— D. Raja (@ComradeDRaja) November 25, 2025
इस देश का बहुसंख्यक हिंदू समाज अपनी सहिष्णुता और उदारता के लिए जाना जाता है—इसलिए डी. राजा जैसी बातें भी बिना किसी कटु प्रतिक्रिया के सह ली जाती हैं। लेकिन यह सवाल अपनी जगह सही है कि क्या वे इसी तरह किसी अन्य मजहब के धार्मिक प्रतीक के लिए ऐसी टिप्पणी कर पाते? उत्तर स्पष्ट है—नहीं। और यही असमानता इन प्रतिक्रियाओं की मंशा पर प्रश्न उठाती है।
वामपंथी प्रोपेगेंडा फैलाने वाली पत्रकार सुहासिनी हैदर ने भी इसी पर आपत्ति जताई और X पर लिखा कि अन्य धार्मिक स्थलों पर तिरंगा फहराने को कहा जाता है, फिर प्रधानमंत्री धार्मिक ध्वज क्यों फहरा रहे हैं। उनके इस तर्क में न संविधान की सही समझ झलकती है, न धर्म की स्वतंत्रता का सम्मान। संविधान प्रधानमंत्री सहित प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार देता है। हैदर के ऐसे सवालों का उद्देश्य केवल भ्रम फैलाना प्रतीत होता है। वे यह भूल जाती हैं कि राष्ट्रीय पर्वों पर तिरंगा हर स्थान पर फहराया जाता है—इसी राम मंदिर में भी 15 अगस्त 2025 को तिरंगा ही फहराया गया था। वामपंथी वर्ग तिरंगे को भगवा के विरोध में खड़ा करने की कोशिश कर रहा है, जबकि यह इतिहास और परंपरा दोनों के विपरीत है—भगवा इस राष्ट्र की चेतना का मूल रंग रहा है और रहेगा।
Curious contradiction- shrines of all other faiths have been asked to raise the national tricolour for the past few years, but the PM and CM, who have sworn by the constitution will raise a religious flag today. pic.twitter.com/WRcB32WiYq
— Suhasini Haidar (@suhasinih) November 25, 2025
सोशल मीडिया पर भी कथित रूप से ‘बाबरी मस्जिद’ को पुनः बनाने की मांग उठने लगी है। TMC विधायक हुमायूँ कबीर ने मुर्शिदाबाद में 6 दिसंबर 2025 को “बाबरी नाम की मस्जिद” बनाने की घोषणा कर दी। कई सोशल मीडिया हैंडल, जैसे ‘इंडियन मुस्लिम आर्काइव’, ने भी बाबरी को “उलटने योग्य प्रतीक” बताते हुए हागिया सोफिया का संदर्भ दिया।अभिनेता अनुपम खेर के धर्म ध्वज स्थापना पर की गई पोस्ट पर राजीव निगम ने उसे “फुल नौटंकी” बताने की कोशिश की। इससे स्पष्ट है कि कुछ लोग राम मंदिर से जुड़ी हर सकारात्मक घटना पर नकारात्मक राजनीति करने में व्यस्त हैं।
Loss of Babri is neither a civilisational achievement for Hindus nor L for broader Ummah, it is just a symbol which can be reversed like Hagia Sophia
Meanwhile Hinduism wiped out from once cradles of Hindu civilisation like Punjab, Sindh, Bengal & Kashmir can't be reversed https://t.co/IiyDNdOiY7 pic.twitter.com/xQKTyq6bWM
— Indian Muslim Archives (@Rustum_0) November 25, 2025
भारत में लिबरल-लेफ्ट का वर्ग तो इससे नाराज है ही, पड़ोसी पाकिस्तान भी इस घटना पर तिलमिलाया हुआ है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर “तथाकथित राम मंदिर” और “बाबरी मस्जिद के ध्वंस” की बात उठाते हुए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से हस्तक्षेप की मांग की। पाकिस्तान ने यह भी आरोप लगाया कि भारत में मुस्लिमों को हाशिए पर धकेला जा रहा है। पाकिस्तान के यह बयान उस समय आए हैं जब उसका अपना देश भुखमरी, आर्थिक दिवालियापन और गृह युद्ध जैसी स्थितियों से लड़खड़ा रहा है। ऐसी परिस्थितियों में भारत-विरोध उसके लिए घरेलू असफलताओं से ध्यान हटाने का साधन बन जाता है।
babur is no where to find, mughals are done & dusted whereas hindusim & ram mandir stand tall for upcoming centuries. pic.twitter.com/rhHZHoDiPs
— Idc. (@dudeitsokay) November 25, 2025
भारत के वामपंथियों की प्रतिक्रिया भी किसी से छिपी नहीं है। 2019 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा राम जन्मभूमि पर दिए गए फैसले पर भी यही वर्ग निराशा और असंतोष जताता दिखा था। कभी धर्मनिरपेक्षता खतरे में, कभी इतिहास मिटाने की बातें—लेकिन सच्चाई यह है कि जिस इतिहास को बलपूर्वक ढंका गया था, वही अब पुनर्स्थापित हुआ है। यह धर्म ध्वज उस स्मृति का जीवंत, दृश्यमान प्रतीक है।
फुल नौटंकी चालू आहे https://t.co/NkbhamPfXP
— Rajeev Nigam (@apnarajeevnigam) November 25, 2025
आज जब धर्म ध्वज शिखर पर फहरा रहा है, उसी समय एक निश्चित लिबरल-वामपंथी समूह उसमें भी राजनीति, बहुसंख्यकवाद और ‘पॉलिटिकल हिंदुत्व’ के चश्मे से देख रहा है। प्रश्न यह है कि किसी समाज की सांस्कृतिक जड़ों का सम्मान होता है तो इससे कुछ लोगों को असुविधा क्यों होती है? ऐसा प्रतीत होता है कि भारत की प्राचीन पहचान को स्वीकार करना इस वर्ग को कठिन लगता है।
🔊PR No.3️⃣5️⃣0️⃣/2️⃣0️⃣2️⃣5️⃣
Pakistan calls international attention to rising Islamophobia and heritage desecration in India
🔗⬇️https://t.co/bOgneV9A5I pic.twitter.com/0No1NFqJpY
— Ministry of Foreign Affairs – Pakistan (@ForeignOfficePk) November 25, 2025
राम मंदिर का निर्माण किसी सरकार की इच्छा नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक स्मृति, संघर्ष, तप और समर्पण का परिणाम है। और आज, जब धर्म ध्वज शिखर पर स्थापित हुआ है, यह भारत के आत्मबोध और सांस्कृतिक जागरण का प्रतीक बन खड़ा है। यह ध्वज भारत माता के मस्तक पर तिलक के समान है—गौरव, आत्मविश्वास और पुनर्जागरण का चिह्न।
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