छत्तीसगढ़ सरकार आगामी शीतकालीन सत्र में एक नया धर्मांतरण निषेध कानून लाने जा रही है। सरकार का यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बस्तर, जशपुर और रायगढ़ जैसे जनजातीय इलाकों में धार्मिक परिवर्तन को लेकर लंबे समय से तनाव और विवाद बढ़ते रहे हैं। कई बार स्थिति इतनी बिगड़ी कि पुलिस और प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा। फिलहाल राज्य में मध्य प्रदेश का पुराना कानून लागू है, जिसके तहत धर्म परिवर्तन से पहले जिला मजिस्ट्रेट (DM) की अनुमति जरूरी है। लेकिन सरकार का मानना है कि यह कानून अब पर्याप्त नहीं है और इसे और मजबूत करने की आवश्यकता है।
नए कानून का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी व्यक्ति बिना कानूनी प्रक्रिया का पालन किए धर्म न बदल सके। यदि किसी को डर, धमकी, लालच या धोखे से धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया जाता है, तो ऐसे मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान किया जाएगा। सरकार चाहती है कि हर धर्मांतरण की आधिकारिक जानकारी दर्ज हो, जिससे आगे कोई विवाद न हो और विशेष रूप से जनजातीय क्षेत्रों में शांति बनी रहे। यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करेगा लेकिन अवैध और जबरन धर्मांतरण पर सख्ती लागू करेगा।
नए कानून के संभावित प्रावधानों में सबसे महत्वपूर्ण यह होगा कि धर्म परिवर्तन पहले की तुलना में कहीं अधिक कठोर और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत होगा। किसी व्यक्ति को धर्म बदलने से पहले लिखित सूचना DM को तय समय सीमा में देना अनिवार्य होगा। यह सुनिश्चित करेगा कि व्यक्ति अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन कर रहा है, न कि किसी दबाव में। यदि कोई व्यक्ति बिना सूचना दिए धर्म बदल लेता है, तो ऐसे परिवर्तन को कानूनी रूप से वैध नहीं माना जाएगा।
ड्राफ्ट में यह भी स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि यदि कोई लालच, डर, धमकी या धोखे से किसी को धर्म बदलने के लिए प्रेरित करता है, तो उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इसमें जेल और भारी जुर्माने दोनों का प्रावधान हो सकता है। इसके अलावा ‘शादी के बहाने धर्म परिवर्तन’—जिसे कई राज्यों में लव जिहाद कहा जाता है—के मामलों पर भी कानून अधिक कठोरता से कार्रवाई कर सकता है। यदि कोई व्यक्ति केवल विवाह कराने के उद्देश्य से धर्म परिवर्तन करवाता है, तो ऐसी शादी को अदालत अवैध घोषित कर सकेगी।
कानून का उद्देश्य किसी की धार्मिक स्वतंत्रता छीनना नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को अपना पसंदीदा धर्म चुनने का अधिकार रहेगा, लेकिन यह अधिकार विधिक सीमाओं के भीतर ही प्रयोग किया जा सकेगा। सरकार का मानना है कि इससे जनजातीय इलाकों में फैल रहे तनाव में कमी आएगी, सामाजिक विभाजन रुकेगा और समाज में स्थिरता मजबूत होगी।
भारत के कई राज्यों में पहले से धर्मांतरण विरोधी कानून लागू हैं। इसकी शुरुआत ओडिशा ने 1967 में की थी और इसके बाद मध्य प्रदेश ने भी ऐसा कानून बनाया। समय के साथ उत्तर प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और राजस्थान ने इन कानूनों को और कठोर बनाया है। अधिकांश राज्यों में यदि कोई व्यक्ति डर दिखाकर, लालच देकर या शादी का बहाना बनाकर धर्म परिवर्तन करवाता है, तो उसे 3 से 10 साल तक जेल और भारी जुर्माने की सजा हो सकती है। कई मामलों में ये अपराध गैर-जमानती हैं।
इन कानूनों की आवश्यकता इसलिए महसूस की गई क्योंकि कई जगहों पर संगठित तरीके से अवैध धर्मांतरण की घटनाएँ सामने आईं। अक्सर ऐसे अभियान कमजोर, गरीब या सरल लोगों को लक्ष्य बनाकर चलाए जाते हैं। कई बार किसी गाँव या क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोगों को धीरे-धीरे योजनाबद्ध ढंग से धर्म बदलवाने की कोशिश होती है, जिससे सामाजिक तनाव और विभाजन की स्थिति पैदा होती है।
इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए, छत्तीसगढ़ सरकार नया कानून लाकर धर्मांतरण की प्रक्रिया को पारदर्शी, नियंत्रित और सुरक्षित बनाना चाहती है, ताकि लोगों को उनकी इच्छा के विरुद्ध किसी भी तरह के धार्मिक दबाव से बचाया जा सके।
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