भारत की आज़ादी के तुरंत बाद नवंबर 1947 में जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती शहर राजौरी ने विभाजन काल की सबसे भीषण और भयावह त्रासदियों में से एक का सामना किया। पाकिस्तान समर्थित कबायली हमलावरों और स्थानीय विद्रोहियों ने 7 से 11 नवंबर 1947 के बीच राजौरी पर कब्ज़ा कर लिया था, जिसके बाद शहर में अमानवीय हिंसा का दौर शुरू हुआ।
इस दौरान नागरिकों, विशेषकर हिंदू और सिख समुदाय के लोगों की बेरहमी से हत्या की गई। आसपास के इलाकों से हजारों लोग हिंसा से बचने के लिए राजौरी पहुंचे थे, लेकिन दुर्भाग्यवश यही शहर उनके लिए मौत का गवाह बन गया। इतिहासकारों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार 11 और 12 नवंबर, यानी छोटी दिवाली और दिवाली के दिन, सबसे भयावह नरसंहार हुआ।
राजौरी के उस काले अध्याय को याद करते हुए – अमर बलिदान की श्रद्धांजलि
भारत की आज़ादी के तुरंत बाद नवंबर 1947 में सीमावर्ती शहर राजौरी (जम्मू) ने विभाजन काल की सबसे भयानक त्रासदियों में से एक का सामना किया।
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जब पूरा भारत आज़ादी के बाद पहली बार दीपावली का पर्व मना रहा था, उसी समय राजौरी की सड़कों पर खून बह रहा था। हालात इतने भयावह थे कि हजारों महिलाओं ने अपमान और कैद से बचने के लिए जहर खा लिया या कुओं में कूदकर अपनी जान दे दी। यह दृश्य प्राचीन जौहर की भयावह स्मृति को जीवंत कर देता है।
अनुमानों के अनुसार, राजौरी में करीब 20,000 से 30,000 तक निर्दोष नागरिक मारे गए, घायल हुए या अपहृत किए गए। शहर लगभग पांच महीने तक हमलावरों के कब्ज़े में रहा, जिससे जनजीवन पूरी तरह तबाह हो गया।
आखिरकार 13 अप्रैल 1948 को भारतीय सेना ने एक साहसिक और निर्णायक अभियान चलाकर राजौरी को मुक्त कराया। इस विजय के बाद 13 अप्रैल को हर साल ‘राजौरी दिवस’ या ‘विजय दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा। यह दिन उन वीर सैनिकों के शौर्य को याद करने के साथ-साथ उन निर्दोष नागरिकों और महिलाओं को श्रद्धांजलि देने का भी प्रतीक है, जिन्होंने अपनी इज्जत और मातृभूमि की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।
राजौरी में स्थित बलिदान भवन स्मारक उसी ऐतिहासिक कुएं के पास बना है, जहां कई महिलाओं ने अपना जीवन न्योछावर किया था। यहां हर साल श्रद्धांजलि समारोह आयोजित होते हैं, जिनमें लोग शहीदों को नमन करते हैं और उनके बलिदान को स्मरण करते हैं।
राजौरी दिवस आज़ादी की कीमत और उन लोगों के अदम्य साहस की याद दिलाता है, जिन्होंने सम्मान और देश के लिए अपना सर्वस्व कुर्बान कर दिया। देश उन शहीदों को नमन करता है—उनका बलिदान कभी भुलाया नहीं जाएगा।
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