कर्नाटक में सामने आया वाल्मीकि फंड घोटाला राज्य के राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में एक बड़ा भूचाल बन चुका है। इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ताज़ा कार्रवाई ने एक बार फिर इसे सुर्खियों में ला दिया है। बुधवार, 11 जून 2025 को ED ने कर्नाटक के बेल्लारी जिले में आठ अलग-अलग ठिकानों पर छापेमारी की, जिसमें कॉन्ग्रेस के सांसद ई. तुकाराम, विधायक नारा भारत रेड्डी, विधायक जी.एन. गणेश, और विधायक बी. नागेन्द्र के आवास एवं कार्यालय शामिल थे। बी नागेन्द्र वही नेता हैं जिन्हें पहले इसी मामले में मंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था। यह कार्रवाई मनी लॉन्ड्रिंग निरोधक कानून (PMLA) के तहत की गई और इससे यह स्पष्ट हो गया कि यह घोटाला सिर्फ वित्तीय अनियमितताओं तक सीमित नहीं, बल्कि इसमें चुनावी भ्रष्टाचार और राजनीतिक साज़िश की परतें भी शामिल हैं।
इस घोटाले की शुरुआत मई 2024 में एक आत्महत्या से हुई थी, जब महर्षि वाल्मीकि जनजातीय विकास निगम (KMVSTDC) के एक 48 वर्षीय कर्मचारी चंद्रशेखर ने आत्महत्या कर ली थी। चंद्रशेखर के सुसाइड नोट ने इस घोटाले का पर्दाफाश किया, जिसमें उसने लिखा कि उसे अधिकारियों द्वारा निगम के खातों से अवैध रूप से पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया गया था। आरोप था कि एक मंत्री के मौखिक निर्देश पर यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की वसंत नगर शाखा से एमजी रोड शाखा में बड़ी राशि स्थानांतरित की गई, और इसके बाद इस धन को विभिन्न फर्जी खातों में भेजा गया। बाद की जांच में यह सामने आया कि इस प्रक्रिया में ₹187 करोड़ का लेनदेन हुआ, जिसमें से ₹88 करोड़ से ज़्यादा की राशि अवैध खातों में गई।
ED की जांच में और भी गंभीर खुलासे हुए। चार्जशीट के अनुसार, घोटाले से निकाले गए पैसे का इस्तेमाल 2024 के लोकसभा चुनाव में बेल्लारी सीट को प्रभावित करने के लिए किया गया। ED का दावा है कि करीब 7 लाख वोटरों को लगभग ₹200 प्रति व्यक्ति की दर से रिश्वत दी गई, ताकि वे कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार ई. तुकाराम के पक्ष में वोट करें। इसके अलावा, चुनाव बूथ पर काम करने वाले पार्टी कार्यकर्ताओं को भी ₹10,000 प्रति व्यक्ति दिए गए। यह सब बी नागेन्द्र के पूर्व निजी सचिव विजय गौड़ा के फोन डेटा की जांच से सामने आया, जिसमें पैसे के वितरण, बैंक विवरण, और फोटो तक ED को मिले।
ED ने यह भी आरोप लगाया कि बी नागेन्द्र ने इस घोटाले के बाद अपने तीन आईफोन तोड़ दिए, ताकि सबूत न मिल सकें। साथ ही, उन्होंने जांच के दौरान कोई ठोस जवाब नहीं दिया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि जब ये लेन-देन हुए तब राज्य के वित्त विभाग ने भी अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं किया और घोटाले की अनदेखी की गई।
कुल मिलाकर, यह घोटाला केवल एक आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि राजनीतिक भ्रष्टाचार, चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की साजिश, और सत्ता के दुरुपयोग का एक गंभीर उदाहरण बन गया है। वाल्मीकि फंड जैसी योजनाओं को जनजातीय और दलित समुदाय के विकास के लिए बनाया गया था, लेकिन कथित रूप से इसका उपयोग राजनीतिक फायदे और चुनाव जीतने के लिए किया गया, जिससे न केवल प्रशासनिक प्रणाली पर प्रश्नचिह्न खड़ा होता है, बल्कि वंचित समुदायों के साथ धोखा भी प्रतीत होता है। ED की कार्रवाई अभी जारी है और इस मामले में और बड़े नामों के उजागर होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।