भारत के सर्वोच्च न्यायालय में तीन नए न्यायाधीशों की नियुक्ति हो गई है। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने जानकारी दी कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश पर तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों को नियुक्त किया है। ये नियुक्तियाँ शीर्ष अदालत में खाली तीन पदों को भरने के लिए की गई हैं।
नए नियुक्त न्यायाधीश
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न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया
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न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई
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न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर
न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया – गहरी संवैधानिक समझ और प्रशासनिक अनुभव
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कानूनी करियर की शुरुआत: अगस्त 1988 में, गुजरात हाई कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता एसएन शेलत के अधीन।
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विशेषज्ञता: संवैधानिक, सिविल, श्रम और सेवा कानूनों में।
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न्यायिक पदों की यात्रा:
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21 नवंबर, 2011: गुजरात उच्च न्यायालय के अतिरिक्त न्यायाधीश।
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6 सितंबर, 2013: स्थायी न्यायाधीश।
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25 फरवरी, 2024: कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश।
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न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई – प्रशासनिक न्यायाधिकरण से शीर्ष अदालत तक
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नामांकन: 8 जुलाई, 1989 को अधिवक्ता के रूप में।
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प्रैक्टिस क्षेत्र: सिविल, आपराधिक, संवैधानिक, सेवा और चुनाव मामलों में विशेषज्ञता।
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सरकारी अनुभव:
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केंद्र सरकार के स्थायी वकील (2000-2004)।
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राजस्थान सरकार के कई विभागों के प्रतिनिधि।
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न्यायिक पद:
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8 जनवरी, 2013: राजस्थान हाई कोर्ट के अतिरिक्त न्यायाधीश।
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7 जनवरी, 2015: स्थायी न्यायाधीश।
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5 फरवरी, 2024: गुवाहाटी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश।
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न्यायमूर्ति अतुल एस चंदुरकर – गहराई से कानूनी अध्ययन और नागपुर से न्यायालय तक
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कानूनी करियर की शुरुआत: 21 जुलाई, 1988, वरिष्ठ अधिवक्ता बीएन नाइक के चैंबर से।
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प्रैक्टिस स्थान: शुरुआत मुंबई, बाद में 1992 से नागपुर में स्वतंत्र अभ्यास।
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न्यायिक पद:
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21 जून, 2013: बॉम्बे हाई कोर्ट के अतिरिक्त न्यायाधीश।
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न्युक्ति की प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने तीनों नामों की सिफारिश की थी। संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत, भारत के मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति की गई। इन नियुक्तियों से जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस ऋषिकेश रॉय के सेवानिवृत्त होने से खाली हुए पदों को भरा गया है।
अब सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या
इन तीनों की नियुक्ति के बाद, सुप्रीम कोर्ट में कार्यरत जजों की संख्या 34 के स्वीकृत पदों के करीब पहुंच गई है।
नए जजों की नियुक्ति से न केवल सुप्रीम कोर्ट की कार्यक्षमता बढ़ेगी, बल्कि विविध क्षेत्रीय और पेशेवर अनुभवों से न्यायपालिका को मजबूती मिलेगी। इन न्यायाधीशों से आने वाले समय में महत्वपूर्ण संवैधानिक और सामाजिक मामलों में निर्णायक भूमिका निभाने की उम्मीद है।