दुनिया की सबसे प्राचीन नगरी वाराणसी और सबसे पुरानी भाषा तमिल का अद्भुत संगम ‘काशी तमिल संगमम्’ के चौथे संस्करण के आयोजन के लिए काशी पूरी तरह तैयार है। एक ओर भारत की सांस्कृतिक राजधानी कही जाने वाली काशी है, तो दूसरी ओर भारत की प्राचीनता, गौरव और विद्वता का केंद्र तमिलनाडु और तमिल संस्कृति। दोनों का यह संगम उतना ही पवित्र माना जाता है जितना गंगा-यमुना का संगम। सदियों पुराने इस रिश्ते को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नया मंच देते हुए इसे राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े सांस्कृतिक उत्सव के रूप में स्थापित किया है।
‘मन की बात’ कार्यक्रम में पीएम मोदी ने लोगों से अपील की कि वे बड़ी संख्या में काशी तमिल संगमम् में शामिल हों। उन्होंने कहा कि दुनिया की सबसे प्राचीन भाषा तमिल और विश्व के सबसे पुराने नगरों में से एक वाराणसी का यह मिलन एक अद्वितीय सांस्कृतिक अनुभव प्रदान करता है। काशी तमिल संगमम् 2 दिसंबर से काशी के नमो घाट पर शुरू हो रहा है। यह कार्यक्रम तमिल भाषा और संस्कृति से प्रेम करने वाले लोगों को एक मंच देता है और साथ ही काशीवासियों के लिए भी एक नया अनुभव लेकर आता है। प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार, यह आयोजन ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की भावना को मजबूत करते हुए देश की एकता और सांस्कृतिक बंधन को और गहरा बनाता है।
उच्च शिक्षा विभाग के सचिव डॉ. विनीत जोशी (@Vineet_K26) ने बताया कि इस वर्ष काशी तमिल संगमम् 4.0 में तीन नई पहल होने जा रही हैं—पहली, तमिलनाडु के शिक्षक काशी आकर छात्रों को तमिल भाषा सिखाएंगे; दूसरी, काशी के छात्र तमिलनाडु जाकर तमिल सीखेंगे; और तीसरी, Sage Agasthya Vehicle… pic.twitter.com/Sy50Cz1Xyl
— Ministry of Education (@EduMinOfIndia) December 1, 2025
तमिल साहित्य में काशी और बाबा विश्वनाथ के प्रति अगाध श्रद्धा सदियों से दिखाई देती है। प्राचीन काल में तमिल राजा काशी की यात्रा पर आया करते थे। लगभग 2300 वर्ष पहले तमिलनाडु के नगरों और ग्रामों में काशी का बखान करने वाले गीत गाए जाते थे। कहा जाता है कि प्रथम तमिल संगम मदुरै में पांड्य राजाओं के संरक्षण में हुआ था, जिसमें अगस्त्य, शिव और मुरुगवेल जैसे दिग्गज विद्वानों ने हिस्सा लिया। द्वितीय संगम कपातपुरम में आयोजित हुआ, जिसे इतिहास का सबसे बड़ा संगम माना जाता है। इसमें उत्तर और दक्षिण भारत के विद्वानों ने एक साथ विचार साझा किए थे।
तमिल भाषा की समृद्धि का उदाहरण यह है कि ‘अगटिटयम अगस्त्यम’ जैसे प्राचीन व्याकरण ग्रंथ का उल्लेख मिलता है, जिसका रचना काल ईसा पूर्व माना जाता है। 15वीं शताब्दी में दक्षिण के राजा पराक्रम पांड्या काशी से शिवलिंग लेकर लौट रहे थे, लेकिन रास्ते में साथ चल रही गाय के रुक जाने को ईश्वरीय संकेत मानकर उन्होंने शिवलिंग वहीं स्थापित कर दिया। वह स्थल आज ‘शिवकाशी’ के नाम से प्रसिद्ध है। तमिलनाडु के उन लोगों के लिए, जो काशी नहीं जा सकते थे, पांड्य शासकों ने तेनकाशी में काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण कराया, जो आज तमिलनाडु-केरल सीमा पर स्थित है।
2 दिसंबर से काशी के नमो घाट पर शुरू हो रहे काशी-तमिल संगमम की थीम बहुत ही रोचक है – Learn Tamil – तमिल करकलम्
काशी-तमिल संगमम उन सभी लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण मंच बन गया है, जिन्हें तमिल भाषा से लगाव है।#MannKiBaat pic.twitter.com/aWBssO3yFi
— Piyush Goyal (@PiyushGoyal) November 30, 2025
काशी तमिल संगमम् की शुरुआत 2022 में हुई थी, जब लगभग 10 हजार तमिल प्रतिनिधि काशी पहुँचे थे। पीएम मोदी ने उद्घाटन समारोह में कहा था कि दुनिया जिस तमिल भाषा का गुणगान करती है, उसके प्रति अपने ही देश में पर्याप्त गौरव नहीं दिखाया जाता। दिसंबर 2023 में नमो घाट पर दूसरे संगमम् का आयोजन हुआ, जहाँ से पीएम मोदी ने वाराणसी तमिल संगमम् ट्रेन को हरी झंडी दिखाई और तमिल साहित्य के कई क्लासिक ग्रंथों के बहुभाषी एवं ब्रेल संस्करण जारी किए।
तीसरा काशी तमिल संगमम् 15 से 24 फरवरी 2025 तक आयोजित किया गया। इसमें दोनों प्राचीन सभ्यताओं—काशी और तमिल—के विद्वानों, छात्रों, दार्शनिकों, कलाकारों, व्यापारियों और कारीगरों ने हिस्सा लिया और अपने अनुभव साझा किए। अब दिसंबर 2025 में चौथे संस्करण का आयोजन शिक्षा मंत्रालय और BHU द्वारा किया जा रहा है। 2 दिसंबर से 16 दिसंबर तक चलने वाले इस कार्यक्रम में 10 हजार से अधिक तमिल प्रतिनिधियों के शामिल होने की संभावना है।
काशी तमिल संगमम् इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वाराणसी में काशी विश्वनाथ और तमिलनाडु के रामेश्वरम में भगवान रामनाथस्वामी विराजमान हैं—दोनों ही स्थल शिवमय हैं और दोनों ही स्थान संगीत, साहित्य और कला के अद्भुत संगम का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह कार्यक्रम उत्तर और दक्षिण भारत के सांस्कृतिक सम्बन्धों को और अधिक जीवंत तथा सशक्त बनाता है।
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