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फिलीपींस के बाद इटली भी चीन के ‘बेल्ट एंड रोड’ से हुआ बाहर, अपने ही जाल में फंसते जा रहे जिनपिंग?

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने साल 2013 में बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) प्रोजेक्ट को लॉन्च किया था. यह दुनिया के सबसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में से एक है. चीन इस प्रोजेक्ट को ऐतिहासिक सिल्क रूट के तौर पर पेश करता है. मध्य काल में चीन सहित कई देश एशिया और यूरोप के देशों से व्यापार करने के लिए सिल्क रूट का ही इस्तेमाल किया करते थे.

Last updated: 2023/12/07 at 4:20 PM
One India News Team
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दुनिया भर में अपनी पहुंच सुनिश्चित कर व्यापार, निवेश और राजनीतिक पकड़ मजबूत करने के चीन के प्रयासों को उस वक्त बड़ा झटका लगा जब इटली ने औपचारिक रूप से बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव से बाहर होने की घोषणा की. इससे पहले नवंबर में ही दक्षिण चीन सागर में फिलीपींस की नाव और चीनी तटरक्षक जहाज में टक्कर के बाद फिलीपींस ने बीआरआई प्रोजेक्ट से अलग होने की घोषणा की थी.

Contents
चीन के लिए बड़ा झटकासंकट में चीन का बीआरआई प्रोजेक्टक्या है चीन का ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (What is Belt and Road Initiative?)भारत क्यों कर रहा है BRI का विरोध?

इटली 2019 में बड़े उत्साह के साथ BRI में शामिल हुआ था. उस समय इटली के प्रधानमंत्री फाइव स्टार मूवमेंट के नेता ग्यूसेप कोंटे थे. बीआरआई में इटली का शामिल होना चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए एक बड़ी राजनीतिक जीत थी. ऐसा कहा जाने लगा कि चीन, यूरोप में घुसपैठ करने के लिए इटली का इस्तेमाल करेगा. लेकिन जॉर्जिया मेलोनी की सरकार बनने के बाद से ही यह अटकलें लगाई जाने लगी कि इटली शायद ही 2024 में बीआरआई एग्रीमेंट को रिन्यू करेगा.

चीन के लिए बड़ा झटका

BRI प्रोजेक्ट से इटली का अलग होना चीन के लिए इसलिए भी बड़ा झटका है क्योंकि इटली यूरोपीय यूनियन की तीसरी और वैश्विक स्तर पर दसवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. इसके अलावा इटली बीआरआई प्रोजेक्ट में शामिल होने वाला एकमात्र जी-7 देश था.

2019 में इटली जब बीआरआई में शामिल हुआ था, उस वक्त भी उसके पश्चिमी सहयोगी देशों ने इसका विरोध किया था. क्योंकि बीआरआई में शामिल होने वाला इटली जी-7 का एकमात्र देश था. अमेरिका और कई यूरोपीय देशों के चीन के साथ रिश्ते तनावपूर्ण स्थिति में हैं. अमेरिका ने इटली सरकार को यह स्पष्ट कर दिया था कि बीआरआई में इटली की भागदारी, जी-7 में उसकी स्थिति के परस्पर विरोधी है.

इसके अलावा जी-7 समूह ने एक आधिकारिक नीति अपनाई है जिसे डी-रिस्किंग नाम दिया गया है. नाटो में इटली के पूर्व राजदूत स्टेफानो स्टेफानीनी का कहना है कि चीन के साथ पश्चिमी देशों के बिगड़ते संबंध और खासकर रणनीतिक क्षेत्रों में चीन पर निर्भरता कम करने के प्रयासों के मद्देनजर बीआरआई प्रोजेक्ट में शामिल रहना मुश्किल था.

इटली की प्रधानमंत्री ने बीआरआई में इटली की भागदारी को एक गलती बताते हुए कहा था कि उनकी सरकार इस एग्रीमेंट से अलग हो सकती है. वहीं, इटली के वर्तमान रक्षा मंत्री गुइडो क्रोसेटो ने कुछ समय पहले एक इंटरव्यू में कहा था कि पिछली सरकार द्वारा बीआरआई में शामिल होना एक तात्कालिक और उद्दंड निर्णय था.

वहीं, दक्षिण चीन सागर में फिलीपीनी नाव और चीनी तटरक्षक जहाज में टकराव के बाद फिलीपींस ने बीआरआई प्रोजेक्ट से बाहर होने की घोषणा की थी. दक्षिण चीन सगार में फिलीपींस के कुछ क्षेत्रों पर चीन के दावों के कारण फिलीपींस में चीन के खिलाफ लोगों में काफी गुस्सा है. अमेरिका समेत कई पश्चिमी यूरोपीय देश पहले ही चीन के इस प्रोजेक्ट से किनारा किए हुए हैं. भारत भी बीआरआई में शामिल होने से इनकार कर चुका है. ऐसे में इटली के अलग होने के बाद बीआरआई में छोटे-छोटे और ज्यादातर अफ्रीकन देश ही रह गए हैं. इनमें से भी कई देश ऐसे हैं जो चीनी कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं.

संकट में चीन का बीआरआई प्रोजेक्ट

मार्च 2023 में हार्वर्ड के कैनेडी स्कूल और कील इंस्टीट्यूट की ओर से जारी की गई एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चीन का बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) संकट में है. रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने बीआरआई प्रोजेक्ट के दांव पर 20 से अधिक देशों को मार्च 2021 तक 240 बिलियन डॉलर से अधिक का कर्ज दे चुका है. कुल कर्ज का लगभग 80 प्रतिशत 2016 के बाद जारी किया गया है.

चीन से कर्ज लेने वाले देशों में मालदीव, पाकिस्तान, अर्जेंटीना, यूक्रेन, श्रीलंका, जिबूती और बांग्लादेश जैसे देश शामिल हैं. चीन इन देशों को इसलिए कर्ज देता है ताकि ये देश डिफॉल्ट होने से बचें और बीआरआई प्रोजेक्ट को अंतिम रूप दिया जा सके. इसके बावजूद इन देशों की आर्थिक स्थिति सुधर नहीं रही है. आइए जानते हैं कि चीन आखिर क्यों इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए एड़ी-चोटी का जोड़ लगाए हुए है और इसके लिए सहयोगी देशों को कर्ज पर कर्ज दिए जा रहा है. इसके बावजूद चीन का बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव कैसे फेल होने के कगार पर है.

क्या है चीन का ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (What is Belt and Road Initiative?)

चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और एशिया, यूरोप और अफ्रीका के देशों को सड़क मार्ग, रेल मार्ग और बंदरगाह से जोड़ने के लिए 2013 में ‘बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव’ प्रोजेक्ट लॉन्च किया था. दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक गलियारे के तौर पर इस प्रोजेक्ट को चीन के लिए सबसे महत्वकांक्षी योजना बताया जाता है.

अरबों डॉलर के इस प्रोजेक्ट का मकसद चीन की समुद्री गलियारों और शिपिंग मार्गों को बाकी दुनिया से जोड़ना है. ‘बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव’ को जिनपिंग ने 2013 में कजाकिस्तान में लॉन्च किया था. उस वक्त इसे ‘वन बेल्ट वन रोड’ के नाम से जाना जाता था. 2017 में चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी के संविधान में भी बीआरआई के महत्व का उल्लेख किया गया. जिनपिंग ने इस प्रोजेक्ट को ‘प्रोजेक्ट ऑफ द सेंचुरी’ करार दिया था.

वन बेल्ट वन प्रोजेक्ट को दो हिस्सों में बनाया जा रहा है. इसका पहला हिस्सा जमीन पर बनने वाला सिल्क रोड है, जिसे सिल्क रोड इकोनॉमिक बेल्ट कहा जाता है. वहीं, दूसरा मैरीटाइम सिल्क रोड है, जो समुद्री रास्ते से होकर गुजरेगा. ईस्ट एशिया फोरम के अनुसार, 150 से अधिक देशों और 32 अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने बीआरआई बीआरआई प्रोजेक्ट में साथ काम करने में रुचि दिखाई है.

चीन इस प्रोजेक्ट पर भारी भरकम निवेश कर रहा है. अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मई 2023 तक चीन इस प्रोजेक्ट पर 1 ट्रिलियन से ज्यादा खर्च कर चुका है. वहीं, थिंक टैंक ऑर्गेनाइजेशन काउंसिल ऑन फॉरन रिलेशन्स (सीएफआर) ने विशेषज्ञों से हवाले से कहा है कि चीन इस प्रोजेक्ट पर 8 ट्रिलियन डॉलर तक खर्च कर सकता है.

भारत क्यों कर रहा है BRI का विरोध?

भारत शुरुआत से ही ‘बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव’ का विरोध करता रहा है. भारत साफ तौर पर कहता रहा है कि वह ऐसी किसी परियोजना को स्वीकार नहीं करेगा, जो उसकी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन करता हो. दरअसल, बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव की एक महत्वपूर्ण परियोजना चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) से होकर गुजरता है जिसे भारत अपना अभिन्न हिस्सा मानता है. इस इलाके में आर्थिक गतिविधियों में चीन के शामिल होने पर भारत ऐतराज जताता रहा है. सीपीईसी के बहाने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में चीनी सैनिकों की उपस्थिति हमेशा बनी रहेगी. जो रणनीतिक तौर पर भारत के लिए खतरे से कम नहीं है.

इसके अलावा सीपीईसी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के सबसे उत्तरी इलाके गिलगित बाल्टिस्तान क्षेत्र में भी प्रवेश करती है. विशेषज्ञों का कहना है कि चीन इस प्रोजेक्ट की मदद से कश्मीर में तीसरी ताकत बनने की फिराक में है.

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