तृणमूल कांग्रेस (TMC) के पूर्व राज्यसभा सांसद साकेत गोखले एक बार फिर विवादों में आ गए हैं। इस बार विवाद की वजह केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लिखा गया उनका एक पत्र है। इस पत्र में उन्होंने भूख हड़ताल पर बैठे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक से सरकार को संवाद स्थापित करने और उनकी भूख हड़ताल समाप्त कराने का आग्रह किया है। हालांकि, पत्र की सामग्री से ज्यादा चर्चा उसके लेटरहेड को लेकर हो रही है।
गोखले ने जिस लेटरहेड का इस्तेमाल किया, उस पर भारत का राजकीय प्रतीक ‘अशोक स्तंभ’ अंकित है और नीचे बड़े अक्षरों में “Former Member of Parliament” (पूर्व सांसद) लिखा गया है। इसी को लेकर कानूनी बहस शुरू हो गई है, क्योंकि नियमों के अनुसार पूर्व सांसदों को निजी या राजनीतिक पत्राचार में राष्ट्रीय प्रतीक का उपयोग करने की अनुमति नहीं है।
क्या लिखा है पत्र में?
15 जुलाई 2026 को लिखे गए पत्र में साकेत गोखले ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से अपील की कि वे सोनम वांगचुक से बातचीत करें और उनकी चिंताओं का समाधान निकालें।
गोखले ने पत्र में कहा कि वांगचुक 28 जून 2026 से NEET और CBSE परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के विरोध में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं। उन्होंने दावा किया कि दो सप्ताह के भीतर वांगचुक का वजन 8 किलोग्राम से अधिक कम हो चुका है, इसलिए सरकार को तत्काल संवाद स्थापित करना चाहिए।
बाद में गोखले ने इस पत्र की प्रति सोशल मीडिया पर भी साझा की, जिसके बाद लेटरहेड पर बने राष्ट्रीय प्रतीक को लेकर विवाद शुरू हो गया।

विवाद की वजह क्या है?
विवाद का केंद्र पत्र की सामग्री नहीं बल्कि उस पर छपा राष्ट्रीय प्रतीक (अशोक स्तंभ) है।
आलोचकों का कहना है कि साकेत गोखले अब सांसद नहीं हैं। उनकी राज्यसभा सदस्यता अप्रैल 2026 में समाप्त हो चुकी है, इसलिए उन्हें अपने निजी लेटरहेड पर राष्ट्रीय प्रतीक का उपयोग करने का अधिकार नहीं है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा करना भारत के राज्य प्रतीक (अनुचित उपयोग निषेध) अधिनियम, 2005 तथा उसके अंतर्गत बनाए गए भारत के राज्य प्रतीक (उपयोग विनियमन) नियम, 2007 का उल्लंघन माना जा सकता है।
क्या कहते हैं 2007 के नियम?
भारत के राज्य प्रतीक (उपयोग विनियमन) नियम, 2007 के नियम 10 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सरकार के पूर्व पदाधिकारी राष्ट्रीय प्रतीक का उपयोग नहीं कर सकते।
इसमें स्पष्ट उल्लेख है कि निम्नलिखित लोग भी निजी रूप से राष्ट्रीय प्रतीक का उपयोग नहीं कर सकते—
- पूर्व राष्ट्रपति
- पूर्व प्रधानमंत्री
- पूर्व केंद्रीय मंत्री
- पूर्व सांसद
- पूर्व विधायक
- पूर्व राज्यपाल
- पूर्व न्यायाधीश
- सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी
नियम के अनुसार, केवल वे व्यक्ति या संस्थाएं ही राष्ट्रीय प्रतीक का उपयोग कर सकती हैं जिन्हें नियमों के तहत अधिकृत किया गया हो।
किन लोगों को राष्ट्रीय प्रतीक उपयोग करने की अनुमति है?
2007 के नियमों के अनुसार राष्ट्रीय प्रतीक का उपयोग केवल अधिकृत सरकारी संस्थाएं और संवैधानिक पदाधिकारी ही कर सकते हैं, जैसे—
- भारत के राष्ट्रपति
- उपराष्ट्रपति
- प्रधानमंत्री
- राज्यपाल एवं उपराज्यपाल
- भारत के मुख्य न्यायाधीश
- सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय
- लोकसभा एवं राज्यसभा
- केंद्र सरकार के मंत्रालय
- राज्य सरकारों के विभाग
- भारतीय दूतावास एवं उच्चायोग
- अधिकृत सरकारी कार्यालय एवं आयोग
इनके लिए भी इसका उपयोग केवल सरकारी पत्राचार, आधिकारिक दस्तावेज, सील, भवन, वाहन और अन्य अधिकृत सरकारी कार्यों तक सीमित रहता है।
यह प्रतिबंध क्यों लगाया गया है?
इस कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी व्यक्ति निजी पत्राचार या दस्तावेज को सरकारी या संवैधानिक दस्तावेज जैसा प्रदर्शित न कर सके।
यदि कोई निजी व्यक्ति या पूर्व पदाधिकारी राष्ट्रीय प्रतीक का उपयोग करता है, तो इससे आम लोगों के बीच यह भ्रम पैदा हो सकता है कि दस्तावेज सरकार या किसी संवैधानिक संस्था द्वारा जारी किया गया है।
क्या हो सकती है कानूनी कार्रवाई?
भारत के राज्य चिह्न (अनुचित उपयोग निषेध) अधिनियम, 2005 की धारा 3 के अनुसार बिना अनुमति राष्ट्रीय प्रतीक का ऐसा उपयोग नहीं किया जा सकता जिससे सरकारी दस्तावेज होने का आभास हो।
वहीं, धारा 7(1) में दंड का प्रावधान किया गया है। इसके अनुसार दोषी पाए जाने पर—
- अधिकतम 2 वर्ष तक की जेल हो सकती है।
- 5,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
- या दोनों सजा एक साथ दी जा सकती हैं।
बार-बार उल्लंघन की स्थिति में कठोर दंड का भी प्रावधान है।
कौन-कौन राष्ट्रीय प्रतीक का निजी इस्तेमाल नहीं कर सकता?
कानून के अनुसार निजी उपयोग के लिए राष्ट्रीय प्रतीक का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसमें शामिल हैं—
- राजनीतिक दल
- निजी कंपनियां
- एनजीओ
- ट्रस्ट एवं सोसायटी
- निजी स्कूल एवं विश्वविद्यालय
- निजी अस्पताल
- मीडिया संस्थान
- वेबसाइट
- यूट्यूब चैनल
- वकील
- डॉक्टर
- इंजीनियर
- अन्य निजी पेशेवर
कब समाप्त हुई साकेत गोखले की सांसद सदस्यता?
साकेत गोखले जुलाई 2023 में तृणमूल कांग्रेस की ओर से राज्यसभा के लिए चुने गए थे। वे गोवा से राज्यसभा सांसद लुइज़िन्हो फलेरो के इस्तीफे से रिक्त हुई सीट पर निर्वाचित हुए थे।
चूंकि यह उपचुनाव था, इसलिए उन्होंने पूरा छह वर्षीय कार्यकाल नहीं बल्कि केवल शेष कार्यकाल पूरा किया। उनकी सदस्यता अप्रैल 2026 में समाप्त हो गई। इसके बाद पार्टी ने उन्हें दोबारा राज्यसभा नहीं भेजा। वर्तमान में वे पूर्व सांसद हैं।
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