प्रस्तावित परिसीमन कानून और संविधान के 131वें संशोधन विधेयक को लेकर विपक्षी खेमे में सियासी हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस को आशंका है कि भारतीय जनता पार्टी इस विधेयक को दोबारा पारित कराने के लिए डीएमके और शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी जैसे विपक्षी दलों का समर्थन हासिल करने की कोशिश कर सकती है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने दोनों क्षेत्रीय पार्टियों से अपील की है कि वे राज्यों के अधिकारों और संघीय व्यवस्था से जुड़े इस संवेदनशील मुद्दे पर अपने पुराने रुख पर कायम रहें। चिदंबरम का आरोप है कि विधेयक को महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत राजनीतिक आरक्षण जल्द लागू करने के नाम पर पेश किया जा रहा है, लेकिन इसके जरिए परिसीमन और निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन का रास्ता भी खोला जा सकता है।
अप्रैल में लोकसभा से पारित नहीं हो पाया था विधेयक
संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 को 16 अप्रैल 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था। इसमें लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव शामिल था। इनमें राज्यों से अधिकतम 815 और केंद्रशासित प्रदेशों से 35 सदस्य रखने का प्रावधान प्रस्तावित किया गया था। विधेयक आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका और लोकसभा से पारित नहीं हुआ।
सरकार का कहना था कि इस संवैधानिक बदलाव का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को तेजी से लागू करना है। वर्ष 2023 में पारित संविधान के 106वें संशोधन के तहत महिला आरक्षण का प्रावधान पहले ही किया जा चुका है, लेकिन उसका क्रियान्वयन अगली जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन से जुड़ा हुआ है।
चिदंबरम ने विधेयक की जरूरत पर उठाए सवाल
पी. चिदंबरम ने तर्क दिया कि महिलाओं के लिए आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान पहले से मौजूद है, इसलिए एक और संविधान संशोधन लाने की आवश्यकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। उन्होंने आशंका जताई कि विधेयक के पीछे वास्तविक उद्देश्य परिसीमन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं में ऐसे बदलाव करना हो सकता है, जिससे सत्तारूढ़ दल को राजनीतिक लाभ मिले।
कांग्रेस सहित विपक्ष के कई दलों ने अप्रैल में इस आधार पर विधेयक का विरोध किया था कि 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करने से जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले दक्षिणी राज्यों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है। आलोचकों ने महिलाओं के आरक्षण को परिसीमन से अलग करके लागू करने की मांग भी की थी।
DMK और NCP के समर्थन की कोशिश का दावा
चिदंबरम ने दावा किया कि बीजेपी अब विधेयक का संशोधित संस्करण लाने के लिए आवश्यक मत जुटाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि डीएमके और एनसीपी (शरद पवार) विधेयक के संभावित राजनीतिक और संघीय प्रभावों से परिचित हैं और उम्मीद है कि दोनों पार्टियां अपने पुराने विरोध पर कायम रहेंगी।
उन्होंने कहा कि अप्रैल 2026 में विपक्षी दलों ने जिन संवैधानिक और राजनीतिक आधारों पर विधेयक का विरोध किया था, उनसे पीछे हटना उनकी घोषित नीति के विपरीत माना जाएगा।
सुप्रिया सुले के बयान से तेज हुई सियासी चर्चा
इस विवाद के बीच एनसीपी (शरद पवार) की सांसद सुप्रिया सुले ने कहा कि यदि प्रस्तावित परिसीमन व्यवस्था में प्रत्येक राज्य की लोकसभा सीटों में समान रूप से 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी की जाती है, तो इसका विरोध करने का कोई बड़ा कारण नहीं दिखाई देता। उनके इस बयान के बाद विपक्षी खेमे में संभावित मतभेद और एनसीपी के बीजेपी के करीब जाने की अटकलें तेज हो गईं।
हालांकि, सुले ने एनडीए में शामिल होने या बीजेपी के साथ किसी समझौते की अटकलों को खारिज भी किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी ने विधेयक पर अभी अंतिम निर्णय नहीं लिया है और समर्थन को लेकर किसी दल से औपचारिक बातचीत नहीं हुई है।
अमित शाह ने दिया था समान सीट वृद्धि का प्रस्ताव
अप्रैल में लोकसभा की बहस के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने प्रत्येक राज्य में सीटों की संख्या 50 प्रतिशत बढ़ाने के लिए आधिकारिक संशोधन लाने का प्रस्ताव दिया था। इसके लिए उन्होंने सदन की कार्यवाही कुछ समय के लिए रोकने और विपक्षी दलों के साथ सहमति बनाने की कोशिश भी की थी, लेकिन प्रस्ताव पर सहमति नहीं बन सकी।
दक्षिणी राज्यों के लिए क्यों संवेदनशील है परिसीमन?
परिसीमन के बाद लोकसभा सीटों का बंटवारा यदि केवल जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संतुलन बदल सकता है। दक्षिणी राज्यों का कहना है कि उन्होंने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, इसलिए सीटों के पुनर्वितरण में उन्हें दंडित नहीं किया जाना चाहिए।
इसी कारण डीएमके, कांग्रेस और दक्षिण भारत के कई अन्य दल केंद्र से यह आश्वासन चाहते हैं कि किसी भी नई परिसीमन व्यवस्था में राज्यों के मौजूदा आनुपातिक प्रतिनिधित्व और संघीय अधिकारों की रक्षा की जाएगी।
विपक्षी एकता की अगली परीक्षा
सुप्रिया सुले के बयान और बीजेपी द्वारा संभावित रूप से विधेयक का नया संस्करण पेश किए जाने की चर्चाओं के बीच परिसीमन का मुद्दा विपक्षी एकता की बड़ी परीक्षा बन सकता है। डीएमके और एनसीपी (शरद पवार) का अंतिम रुख यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा कि सरकार भविष्य में प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत जुटा पाएगी या नहीं।
फिलहाल विधेयक का कोई नया आधिकारिक संस्करण संसद में पेश नहीं हुआ है। ऐसे में बीजेपी द्वारा विपक्षी दलों से समर्थन मांगने और प्रस्तावित बदलावों को लेकर किए जा रहे दावे राजनीतिक बयानों तथा मीडिया रिपोर्टों पर आधारित हैं।
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