गुजरात के भावनगर जिले के गरियाधर तालुका के रूपावती गांव में दफनाने को लेकर शुरू हुआ विवाद आखिरकार गुजरात हाईकोर्ट के आदेश के बाद प्रशासनिक कार्रवाई तक पहुंच गया। 27 जुलाई 2026 को स्थानीय प्रशासन और पुलिस ने कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच एक मुस्लिम व्यक्ति के शव को विवादित भूमि से निकालकर गांव के आधिकारिक कब्रिस्तान में स्थानांतरित कर दिया।
यह मामला उस समय शुरू हुआ था जब 11 जून 2026 को एक मुस्लिम व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके परिजनों ने शव को गांव के अधिकृत कब्रिस्तान में दफनाने के बजाय हिंदू श्मशान घाट से सटी विवादित भूमि पर दफना दिया। स्थानीय ग्रामीणों ने इस पर आपत्ति जताते हुए आरोप लगाया कि गांव में पर्याप्त कब्रिस्तान उपलब्ध होने के बावजूद जानबूझकर विवादित स्थान का चयन किया गया, जिससे सामाजिक तनाव पैदा हुआ।
कैसे शुरू हुआ विवाद?
रूपावती गांव में मुस्लिम समुदाय के लिए आधिकारिक कब्रिस्तान मौजूद है। ग्रामीणों और पंचायत के अनुसार, वहां पर्याप्त जगह उपलब्ध होने के बावजूद मृतक के परिजनों ने शव को श्मशान घाट के निकट स्थित विवादित भूमि पर दफनाया। इस कदम का स्थानीय लोगों ने विरोध किया और मामला गरियाधर पुलिस स्टेशन तक पहुंच गया।
सरपंच की शिकायत पर पुलिस ने मकबूल, मुबारक, रजाक, अल्ताफ समेत अन्य लोगों के खिलाफ विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया। ग्राम पंचायत ने भी संबंधित परिवार को नोटिस जारी कर पूछा कि अधिकृत कब्रिस्तान उपलब्ध होने के बावजूद विवादित भूमि का उपयोग क्यों किया गया।
मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट में क्या दलील दी?
मुस्लिम पक्ष ने दावा किया कि गांव का कब्रिस्तान लगभग भर चुका है और इसलिए विवादित भूमि पर दफन करना आवश्यक था। इसके अलावा उन्होंने पुराने गायकवाड़ी राजस्व अभिलेखों का हवाला देते हुए कहा कि अतीत में इस भूमि के कुछ हिस्से का उपयोग दफनाने के लिए किया जाता था।
इसी आधार पर उन्होंने पालीताना के डिप्टी कलेक्टर के समक्ष विवादित भूमि को मुस्लिम कब्रिस्तान के रूप में मान्यता देने की मांग की। हालांकि डिप्टी कलेक्टर ने यह याचिका खारिज कर दी। इसके बाद मामला गुजरात हाईकोर्ट पहुंचा।
जांच रिपोर्ट में क्या सामने आया?
हाईकोर्ट के निर्देश पर राजस्व और पंचायत विभाग ने मौके की जांच की। जांच रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि गांव का अधिकृत मुस्लिम कब्रिस्तान लगभग 700 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला हुआ है और उसका लगभग आधा हिस्सा खाली पड़ा है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कब्रिस्तान चारदीवारी से घिरा हुआ है तथा वहां दफनाने के लिए पर्याप्त जगह उपलब्ध है। इस रिपोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के उस दावे को गलत साबित कर दिया जिसमें कब्रिस्तान के भरे होने की बात कही गई थी।
पहले भी हो चुका है ऐसा विवाद
जांच के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि वर्ष 2021-22 में इसी परिवार द्वारा एक अन्य मृतक को इसी विवादित भूमि पर दफनाया गया था। उस समय भी स्थानीय लोगों ने विरोध किया था।
बाद में पुलिस और प्रशासन की मौजूदगी में दोनों समुदायों के बीच समझौता हुआ था, जिसके तहत शव को निकालकर अधिकृत कब्रिस्तान में दफनाया गया था। उस समय यह लिखित आश्वासन भी दिया गया था कि भविष्य में श्मशान घाट के आसपास किसी भी विवादित स्थान पर दफन नहीं किया जाएगा।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
गुजरात हाईकोर्ट ने 13 जुलाई 2026 को सुनवाई के दौरान कहा कि जब मुस्लिम समुदाय के लिए आधिकारिक कब्रिस्तान उपलब्ध है और वहां पर्याप्त जगह मौजूद है, तब सार्वजनिक या विवादित भूमि पर मनमाने तरीके से दफन की अनुमति नहीं दी जा सकती।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि अधिकृत कब्रिस्तान बहुत दूर होता या वहां पहुंचने में व्यावहारिक कठिनाई होती, तो मामले पर अलग दृष्टिकोण अपनाया जा सकता था। लेकिन प्रशासनिक रिपोर्ट से ऐसी कोई स्थिति सामने नहीं आई।
हाईकोर्ट ने परिवार को 10 दिनों के भीतर शव को कब्रिस्तान में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया था। साथ ही कहा था कि यदि परिवार आदेश का पालन नहीं करता है तो राज्य सरकार और पंचायत प्रशासन अदालत के आदेश को लागू कर सकते हैं।
प्रशासन ने कैसे की कार्रवाई?
कोर्ट द्वारा निर्धारित समय सीमा बीत जाने के बाद भी परिवार ने शव को नहीं हटाया। इसके बाद 27 जुलाई 2026 को प्रशासन और पुलिस की टीम मौके पर पहुंची और पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग कराई गई।
हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुसार मृतक की गरिमा और धार्मिक परंपराओं का सम्मान करते हुए शव को विवादित स्थल से निकालकर रूपावती गांव के आधिकारिक कब्रिस्तान में दोबारा दफनाया गया। प्रशासन ने बताया कि पूरी कार्रवाई शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुई।
यह मामला अब गांव में दफनाने के अधिकार, सार्वजनिक भूमि के उपयोग और न्यायालय के आदेशों के पालन को लेकर चर्चा का विषय बना हुआ है।
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