निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन ने बांग्लादेश की मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों को लेकर कई तीखी टिप्पणियां की हैं। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की बांग्लादेश वापसी का समर्थन करते हुए कहा कि उन्हें अपनी पार्टी अवामी लीग का नेतृत्व करने और लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव लड़ने का अवसर मिलना चाहिए।
तसलीमा नसरीन ने बांग्लादेश को पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने, यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने और मदरसों को सेक्युलर स्कूलों में बदलने की भी मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि देश में धार्मिक कट्टरवाद लगातार बढ़ रहा है और हिंदुओं सहित धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ होने वाली हिंसा तथा उत्पीड़न की घटनाओं पर प्रभावी कार्रवाई नहीं की जा रही।
शेख हसीना की वापसी और अवामी लीग से प्रतिबंध हटाने की मांग
तसलीमा नसरीन ने कहा कि शेख हसीना को जिस तरीके से सत्ता से हटाया गया, वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं था। उनके अनुसार अवामी लीग पर प्रतिबंध लगाना भी अलोकतांत्रिक कदम है और पार्टी को चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार मिलना चाहिए।
उन्होंने कहा कि वह चाहती हैं कि शेख हसीना बांग्लादेश वापस लौटें, अपनी पार्टी का नेतृत्व करें और लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव लड़ें। नसरीन का मानना है कि किसी भी राजनीतिक दल को प्रशासनिक या राजनीतिक फैसलों के माध्यम से चुनावी मैदान से बाहर करना लोकतंत्र के लिए उचित नहीं है।
उन्होंने भारत और बांग्लादेश के संबंधों में सुधार की जरूरत पर भी जोर दिया। तसलीमा नसरीन ने कहा कि बांग्लादेश की स्वतंत्रता में भारत का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, इसलिए दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक संबंधों को ध्यान में रखते हुए आपसी सहयोग और संवाद को मजबूत किया जाना चाहिए।
अपनी बांग्लादेश वापसी को लेकर क्या बोलीं तसलीमा नसरीन?
अपने देश लौटने की संभावनाओं पर तसलीमा नसरीन ने कहा कि उन्हें अब तक बांग्लादेश वापस आने के लिए किसी तरह का निमंत्रण नहीं मिला है। ऐसे में निकट भविष्य में उनकी स्वदेश वापसी संभव दिखाई नहीं देती।
उन्होंने दावा किया कि बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बावजूद राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों में अपेक्षित सुधार नहीं आया है। उनके अनुसार मौजूदा शासन और पहले की व्यवस्था के बीच कोई बड़ा अंतर दिखाई नहीं देता।
जमात-ए-इस्लामी और बढ़ते कट्टरवाद पर जताई चिंता
तसलीमा नसरीन ने दावा किया कि बांग्लादेश में कट्टरपंथी संगठनों का प्रभाव कम होने के बजाय बढ़ता जा रहा है। उन्होंने जमात-ए-इस्लामी की राजनीतिक मौजूदगी को लेकर भी चिंता जताई।
उनका कहना है कि अवामी लीग का एक प्रमुख विपक्षी दल के रूप में बने रहना बांग्लादेश के लोकतंत्र के लिए बेहतर होता। उन्होंने आशंका जताई कि धर्म आधारित राजनीतिक संगठनों का प्रभाव बढ़ने से देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र और अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर अत्याचार का लगाया आरोप
तसलीमा नसरीन ने आरोप लगाया कि बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ी हैं। उन्होंने कहा कि हिंदू, बौद्ध और ईसाई समुदायों के लोगों को धार्मिक पहचान के कारण असुरक्षा और भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है।
उनके अनुसार अल्पसंख्यकों के घरों, धार्मिक स्थलों और संपत्तियों पर हमलों की घटनाओं को रोकने के लिए सरकार को कठोर और निष्पक्ष कार्रवाई करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रत्येक नागरिक को धर्म की परवाह किए बिना सम्मान, सुरक्षा और समान अधिकारों के साथ जीवन जीने का अवसर मिलना चाहिए।
‘मदरसों को सेक्युलर स्कूलों में बदला जाए’
तसलीमा नसरीन ने मदरसा शिक्षा व्यवस्था को लेकर बेहद कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने दावा किया कि कुछ मदरसों से कट्टरपंथी और जिहादी विचारधारा को बढ़ावा मिल रहा है। उनके अनुसार कई मामलों में मदरसों से जुड़े इमामों और शिक्षकों को चरमपंथी गतिविधियों के आरोप में गिरफ्तार भी किया गया है।
उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में मदरसों की जगह आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष स्कूल खोले जाने चाहिए। इन स्कूलों में बच्चों को विज्ञान, तकनीक, गणित, आधुनिक इतिहास और मानवीय मूल्यों पर आधारित शिक्षा दी जानी चाहिए।
नसरीन ने आरोप लगाया कि कुछ धार्मिक शिक्षण संस्थानों में गैर-मुस्लिम समुदायों के प्रति नफरत की भावना विकसित की जाती है। उन्होंने कहा कि ऐसी शिक्षा सामाजिक विभाजन को बढ़ाती है और इसका सबसे अधिक प्रभाव हिंदू, बौद्ध और ईसाई अल्पसंख्यकों पर पड़ता है।
मस्जिदों में कट्टरपंथी गतिविधियों की निगरानी की मांग
तसलीमा नसरीन ने कहा कि किसी देश को वास्तविक रूप से धर्मनिरपेक्ष बनाने के लिए धर्म और शासन को पूरी तरह अलग रखना आवश्यक है। उन्होंने दावा किया कि कुछ मस्जिदों का इस्तेमाल कट्टरपंथी विचारों और गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है।
उन्होंने सरकार से ऐसे धार्मिक स्थलों की निगरानी करने और कानून का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की। हालांकि उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कार्रवाई धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि हिंसा, नफरत और कट्टरपंथ को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों के आधार पर होनी चाहिए।
चिन्मय कृष्ण दास और इस्कॉन विवाद का किया उल्लेख
तसलीमा नसरीन ने इस्कॉन से जुड़े चिन्मय कृष्ण दास के मामले का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वह इस मुद्दे पर कई बार विरोध दर्ज करा चुकी हैं।
नसरीन का दावा है कि चिन्मय कृष्ण दास ने मुश्किल परिस्थितियों का सामना कर रहे हिंदुओं की सहायता की और उन्हें इसके कारण परेशानी उठानी पड़ी। उन्होंने बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों से जुड़े मामलों में निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया और मानवाधिकारों की सुरक्षा की मांग की।
यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की वकालत
तसलीमा नसरीन ने कहा कि वह पिछले लगभग 40 वर्षों से यूनिफॉर्म सिविल कोड की मांग करती आ रही हैं। उनके अनुसार केवल बांग्लादेश ही नहीं, बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में समान नागरिक संहिता लागू होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि धर्म आधारित व्यक्तिगत कानूनों के कारण महिलाओं को विवाह, तलाक, विरासत और संपत्ति जैसे मामलों में समान अधिकार नहीं मिल पाते। समान नागरिक कानून लागू होने से सभी नागरिकों को धर्म की परवाह किए बिना एक जैसे कानूनी अधिकार और संरक्षण प्राप्त हो सकते हैं।
बेटियों के संपत्ति अधिकारों का उठाया मुद्दा
तसलीमा नसरीन ने दावा किया कि बांग्लादेश में बेटियों को पिता की संपत्ति में बेटों के बराबर अधिकार नहीं मिलता। उन्होंने विवाह और तलाक से संबंधित कानूनों में भी महिलाओं के साथ भेदभाव होने का आरोप लगाया।
उनके अनुसार ऐसे सभी धार्मिक और सामाजिक नियमों की समीक्षा होनी चाहिए, जो महिलाओं को समान अधिकार, स्वतंत्रता और सम्मान नहीं देते। उन्होंने कहा कि किसी भी आधुनिक समाज की प्रगति के लिए लैंगिक समानता जरूरी है।
शिक्षा और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था को बताया प्रगति का आधार
तसलीमा नसरीन ने कहा कि मंदिर, मस्जिद या मदरसे बनाने से अधिक जरूरी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना है। बच्चों को आधुनिक, वैज्ञानिक और तार्किक शिक्षा देकर ही कट्टरवाद तथा धार्मिक नफरत को कम किया जा सकता है।
उन्होंने शिक्षा, महिला अधिकार, लैंगिक समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्ष शासन व्यवस्था को समाज की प्रगति का सबसे महत्वपूर्ण आधार बताया।
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