Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill 2026 (FCRA Amendment Bill) को लेकर देश में राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज होती जा रही है। संसद के मानसून सत्र में इस विधेयक के पेश होने की संभावना के बीच सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व राज्यसभा सांसद महेश जेठमलानी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर बिल के विरोध को लेकर कई गंभीर दावे किए हैं।
जेठमलानी का कहना है कि FCRA संशोधन का विरोध लोकतंत्र बचाने के नाम पर किया जा रहा है, जबकि वास्तविक मुद्दा विदेशी फंडिंग की जवाबदेही और पारदर्शिता से जुड़ा है। उन्होंने दावा किया कि बिल का विरोध इस वजह से हो रहा है क्योंकि इससे विदेशी धन के स्रोत और उसके उपयोग पर अधिक निगरानी होगी।
‘भारत को जानने का पूरा अधिकार है विदेशी पैसा कहां से आ रहा है’
महेश जेठमलानी ने कहा कि यदि किसी विदेशी स्रोत से भारत में धन आता है तो यह देश का संप्रभु अधिकार है कि वह यह जाने—
- पैसा किसने भेजा?
- वास्तविक नियंत्रण किसका है?
- धन किस उद्देश्य से भेजा गया?
- उसका उपयोग कहां और किस कार्य में किया जा रहा है?
उनके अनुसार यह किसी भी संप्रभु राष्ट्र की सामान्य प्रशासनिक और सुरक्षा संबंधी जिम्मेदारी है और इसे लोकतंत्र पर हमला बताना उचित नहीं है।
The hysteria over FCRA tells you precisely why India needs FCRA.
Follow the argument and then follow the money.
India is saying something extraordinarily simple: if money enters this country from a foreign source, India has the sovereign right to know who sent it, who…
— Mahesh Jethmalani (@JethmalaniM) August 7, 2026
‘जवाबदेही बढ़ रही है, इसलिए विरोध हो रहा है’
महेश जेठमलानी ने अपने बयान में कहा कि FCRA को लेकर जिस प्रकार का विरोध और “हाय-तौबा” मचाई जा रही है, वह इस बात का संकेत है कि जवाबदेही को और सख्त किए जाने से कुछ वर्ग असहज हैं।
उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2024-25 के दौरान लगभग 16,200 पंजीकृत संस्थाओं को करीब 23,000 करोड़ रुपये का विदेशी चंदा प्राप्त हुआ। ऐसे में सरकार यदि इस धन के स्रोत, उपयोग और नियंत्रण को लेकर अधिक पारदर्शिता चाहती है तो इसमें आपत्ति की कोई वजह नहीं होनी चाहिए।
जेठमलानी ने यह भी कहा कि यह कहना गलत है कि FCRA संशोधन से सिविल सोसायटी खत्म हो जाएगी। उनके अनुसार यह विधेयक केवल जवाबदेही और निगरानी को मजबूत करने की दिशा में एक कदम है।
लोकतंत्र पर हमला या पारदर्शिता की पहल?
महेश जेठमलानी ने अपने बयान में सवाल उठाते हुए कहा कि आखिर लोकतंत्र का अर्थ यह कब से हो गया कि विदेशी फंड प्राप्त करने वाले गैर-निर्वाचित संगठनों को बिना किसी कड़ी जांच-पड़ताल के कार्य करने का संवैधानिक अधिकार मिल जाए?
उनका मानना है कि विदेशी वित्तपोषित संस्थाओं के लिए जवाबदेही तय करना लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर नहीं बल्कि अधिक मजबूत बनाता है।
12 अगस्त को संसद में पेश हो सकता है FCRA Amendment Bill 2026
सरकारी सूत्रों के अनुसार मोदी सरकार 12 अगस्त 2026 को संसद में Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 पेश कर सकती है।
बताया जा रहा है कि गृह मंत्री अमित शाह विभिन्न राजनीतिक दलों और ईसाई संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ लगातार संवाद कर रहे हैं। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि प्रस्तावित संशोधन पुराने मामलों पर लागू नहीं होगा, जिससे पहले से पंजीकृत संस्थाओं की चिंताओं को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है।
यदि यह विधेयक संसद से पारित होता है तो विदेशी चंदा प्राप्त करने वाले गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), ट्रस्ट और अन्य संस्थाओं की वित्तीय निगरानी, रिपोर्टिंग और जवाबदेही से जुड़े नियम और अधिक सख्त हो सकते हैं।
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