तीन तलाक यानी ‘तलाक-ए-बिद्दत’ पर ऐतिहासिक फैसले के बाद मुस्लिम समाज में प्रचलित बहुविवाह (Polygamy) और निकाह हलाला से जुड़े संवैधानिक सवाल एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के केंद्र में हैं। मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत पुरुषों को एक से अधिक विवाह की अनुमति और निकाह हलाला जैसी प्रथाओं को चुनौती देने वाली याचिकाओं ने लैंगिक समानता, धार्मिक स्वतंत्रता, महिलाओं की गरिमा और समान नागरिक कानून को लेकर बड़ी कानूनी बहस खड़ी कर दी है।
मामले में प्रमुख सवाल यह है कि क्या धार्मिक पर्सनल लॉ के तहत मिलने वाली वैवाहिक छूट संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 में दिए गए समानता, भेदभाव से संरक्षण और गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार की कसौटी पर कायम रह सकती है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि विवाह और बहुविवाह के मामले में अलग-अलग समुदायों के लिए अलग कानूनी व्यवस्थाएं संवैधानिक समानता के प्रश्न को जन्म देती हैं।
बहुविवाह पर क्यों खड़ा हुआ संवैधानिक सवाल?
भारत में सामान्य आपराधिक कानून पहली शादी के अस्तित्व में रहते हुए कुछ परिस्थितियों में दूसरी शादी को दंडनीय बनाता है। भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 82 ऐसे विवाह से संबंधित दंड का प्रावधान करती है।
दूसरी तरफ, मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत विवाह संबंधी मामलों में शरीयत के नियम लागू होने का प्रावधान है। इसी कानूनी अंतर को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाया है कि जब संविधान सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है, तो बहुविवाह के मामले में अलग-अलग कानूनी मानक किस सीमा तक स्वीकार किए जा सकते हैं?
इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 भी है। इसकी धारा 2 विवाह, विवाह-विच्छेद, उत्तराधिकार और अन्य व्यक्तिगत मामलों में मुस्लिम पर्सनल लॉ लागू होने से संबंधित है।
याचिकाकर्ताओं की प्रमुख मांगें
बहुविवाह और निकाह हलाला को चुनौती देने वाली याचिकाओं में महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों को प्रमुख आधार बनाया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पर्सनल लॉ भी संविधान द्वारा दिए गए मूल अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकता।
याचिकाओं में मुख्य रूप से मांग की गई है कि बहुविवाह और निकाह हलाला से संबंधित कानूनी प्रावधानों एवं प्रथाओं की अनुच्छेद 14, 15 और 21 की कसौटी पर समीक्षा की जाए।
इसके साथ ही मुस्लिम विवाह और तलाक के अनिवार्य पंजीकरण, महिलाओं तथा बच्चों के आर्थिक अधिकारों की सुरक्षा और मुस्लिम पर्सनल लॉ के स्पष्ट संहिताकरण जैसे मुद्दे भी उठाए गए हैं।
पहली पत्नी और बच्चों के अधिकारों का मुद्दा
याचिकाओं में बहुविवाह से प्रभावित महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा को भी महत्वपूर्ण मुद्दा बनाया गया है। मांग है कि पहली पत्नी और उसके बच्चों के वैवाहिक आवास, भरण-पोषण और पारिवारिक संपत्ति से जुड़े अधिकारों को प्रभावी कानूनी संरक्षण दिया जाए।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि विवाह का अनिवार्य सरकारी पंजीकरण होने से मौजूदा विवाह छिपाकर दूसरी शादी करने जैसी परिस्थितियों पर नियंत्रण लगाने में मदद मिल सकती है।
सरला मुद्गल केस में क्या कहा था सुप्रीम कोर्ट?
बहुविवाह से जुड़े विवादों पर सुप्रीम कोर्ट पहले भी महत्वपूर्ण फैसले दे चुका है।
1995 के सरला मुद्गल बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हिंदू विवाह के अस्तित्व में रहते हुए केवल दूसरी शादी करने के उद्देश्य से इस्लाम स्वीकार करने पर पहली शादी स्वतः समाप्त नहीं हो जाती। ऐसी परिस्थितियों में दूसरी शादी कानूनी कार्रवाई के दायरे में आ सकती है।
इसके बाद लिली थॉमस बनाम भारत संघ मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने इस सिद्धांत को बरकरार रखा।
इन फैसलों ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि केवल आपराधिक या वैवाहिक कानून से बचने के उद्देश्य से धर्म परिवर्तन का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
तीन तलाक पर 2017 में आया था ऐतिहासिक फैसला
वर्ष 2017 में शायरा बानो बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 3:2 के बहुमत से तत्काल तीन तलाक की प्रथा को अमान्य कर दिया था।
इसके बाद संसद ने मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 बनाया, जिसके तहत तत्काल तीन तलाक को कानूनी रूप से निषिद्ध किया गया।
हालांकि, तीन तलाक के साथ उठाए गए बहुविवाह और निकाह हलाला के व्यापक प्रश्नों का उस फैसले में अंतिम निपटारा नहीं हुआ था। इसी कारण इन मुद्दों पर अलग संवैधानिक चुनौती जारी रही।
क्या है निकाह हलाला?
निकाह हलाला का मुद्दा भी याचिकाओं के केंद्र में है। सामान्यतः यह प्रश्न उस स्थिति से जुड़ा है जिसमें एक मुस्लिम दंपति के बीच ऐसा तलाक हो चुका हो जिसके बाद वे सीधे दोबारा निकाह नहीं कर सकते।
याचिकाकर्ताओं ने विशेष रूप से उन कथित व्यवस्थाओं को चुनौती दी है जिनमें महिला पर पूर्व पति से दोबारा विवाह करने के लिए किसी दूसरे पुरुष से विवाह और वैवाहिक संबंध स्थापित करने का दबाव डाला जाता है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि किसी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध ऐसी परिस्थिति में डालना उसकी गरिमा, शारीरिक स्वायत्तता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ हो सकता है।
क्या बहुविवाह ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ है?
सुप्रीम कोर्ट के सामने महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों में से एक यह भी है कि बहुविवाह को अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का कितना संरक्षण मिल सकता है।
इस बहस में कुरान की सूरह अन-निसा (4:3) का भी उल्लेख किया जाता है, जिसमें एक से अधिक विवाह की अनुमति को न्याय करने की शर्त से जोड़ा गया है और न्याय न कर पाने की आशंका होने पर एक विवाह तक सीमित रहने की बात कही गई है।
इसलिए अदालत के सामने यह सवाल महत्वपूर्ण हो सकता है कि बहुविवाह धार्मिक आस्था का संरक्षित पहलू है या ऐसी सामाजिक-वैवाहिक प्रथा जिसकी मूल अधिकारों की कसौटी पर न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
तुर्किये से पाकिस्तान तक क्या हैं नियम?
दुनिया के मुस्लिम-बहुल देशों में भी बहुविवाह को लेकर एक जैसी व्यवस्था नहीं है।
तुर्किये में नागरिक कानून के तहत एकल विवाह को कानूनी मान्यता प्राप्त है और बहुविवाह प्रतिबंधित है। ट्यूनीशिया ने भी अपने पर्सनल स्टेटस कानून के तहत बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाया है।
पाकिस्तान में Muslim Family Laws Ordinance, 1961 के तहत दूसरी शादी के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और Arbitration Council की पूर्व अनुमति की व्यवस्था है।
वहीं मिस्र में बहुविवाह पूर्ण रूप से प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन विवाह संबंधी सूचना और पत्नी के वैवाहिक अधिकारों से जुड़े कानूनी प्रावधान मौजूद हैं।
इस अंतरराष्ट्रीय स्थिति का इस्तेमाल यह तर्क देने के लिए किया जाता रहा है कि मुस्लिम बहुल देशों में भी विवाह संबंधी पर्सनल लॉ समय के साथ अलग-अलग तरीके से सुधारों से गुजरे हैं।
अनुच्छेद 14 बनाम अनुच्छेद 25 की बड़ी बहस
इस मामले में एक तरफ संविधान का अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार, अनुच्छेद 15 भेदभाव से सुरक्षा और अनुच्छेद 21 जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। दूसरी तरफ अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
यही वजह है कि मामला केवल बहुविवाह या निकाह हलाला तक सीमित नहीं है। इसका फैसला भारत में पर्सनल लॉ और संवैधानिक मूल अधिकारों के आपसी संबंध पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।
साथ ही संविधान का अनुच्छेद 44, जो राज्य को समान नागरिक संहिता की दिशा में प्रयास करने की बात कहता है, इस बहस को और व्यापक बनाता है।
आगे क्या हो सकता है?
मामले की विस्तृत सुनवाई में अदालत को यह तय करना होगा कि चुनौती दी गई प्रथाएं संविधान में मिले धार्मिक स्वतंत्रता के संरक्षण के दायरे में आती हैं या महिलाओं के समानता और गरिमा के मूल अधिकारों के सामने इन्हें सीमित किया जा सकता है।
अदालत संबंधित कानूनी प्रावधानों की संवैधानिक व्याख्या कर सकती है। वहीं व्यापक वैवाहिक सुधार और नया दंडात्मक कानून बनाने का प्रश्न संसद के विधायी अधिकार क्षेत्र से भी जुड़ा हुआ है।
इस मामले का अंतिम फैसला मुस्लिम महिलाओं के वैवाहिक अधिकारों के साथ-साथ भारत में Personal Law vs Fundamental Rights, Gender Equality और Uniform Civil Code की भविष्य की बहस के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
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