राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच AIMIM नेता और राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि वह वंदे मातरम् नहीं गाएंगे। पठान का कहना है कि वह राष्ट्रीय गीत का सम्मान करते हैं, लेकिन किसी नागरिक को इसे गाने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। इससे पहले भी पठान सवाल उठा चुके हैं कि अगर किसी को वंदे मातरम् नहीं आता या वह इसे नहीं गाता तो क्या उसे ‘फांसी दे देंगे?’
वंदे मातरम् को लेकर पिछले कुछ सप्ताह से राजनीतिक बयानबाजी तेज है। स्वतंत्रता दिवस पर मुंबई के भायखला इलाके में आयोजित कार्यक्रम में वारिस पठान ने तिरंगा फहराया और राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ में हिस्सा लिया था, लेकिन उन्होंने वंदे मातरम् गाने से इनकार किया। उन्होंने धार्मिक मान्यताओं का हवाला देते हुए कहा था कि वे वंदे मातरम् का सम्मान करते हैं, लेकिन इसकी कुछ पंक्तियां उनकी धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप नहीं हैं।
‘वंदे मातरम् का सम्मान करते हैं, लेकिन जबरन नहीं थोपा जा सकता’
वारिस पठान ने वंदे मातरम् को लेकर अपना रुख दोहराते हुए कहा कि राष्ट्रीय गीत के प्रति सम्मान होना चाहिए, लेकिन इसे किसी पर जबरन नहीं थोपा जा सकता। उनका तर्क है कि संविधान नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता देता है और इसी आधार पर किसी व्यक्ति को उसकी मान्यताओं के विरुद्ध कुछ करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। 18 अगस्त को एक टीवी डिबेट में भी पठान ने वंदे मातरम् नहीं गाने के अपने पक्ष को विस्तार से रखा था।
हालांकि, उनके बयान के बाद राजनीतिक विवाद और गहरा गया है। सत्तारूढ़ NDA से जुड़े नेताओं ने पठान के रुख की आलोचना की है, जबकि कुछ विपक्षी नेताओं ने इस पूरे मामले में संवैधानिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान के बीच संतुलन बनाए रखने की बात कही है।
GenZ और छात्रों के नाम पर राजनीति न करने की सलाह
वारिस पठान ने युवाओं और छात्रों से जुड़े आंदोलनों पर भी अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने बिना किसी नेता का नाम लिए कहा कि GenZ और छात्रों के आंदोलन को राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
पठान इससे पहले भी छात्र आंदोलन का समर्थन करते हुए कह चुके हैं कि छात्रों के बीच लंबे समय से असंतोष है और उनकी समस्याओं तथा मांगों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि किसी राजनीतिक दल को छात्रों के आंदोलन का श्रेय लेने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।
उनका कहना है कि यदि छात्रों के आंदोलन के बाद सरकार को अपने फैसलों पर पुनर्विचार करना पड़ा है तो यह छात्रों की आवाज की ताकत है। AIMIM छात्रों की जायज मांगों के साथ है, लेकिन उनके आंदोलन को किसी राजनीतिक दल या नेता के अभियान के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए।
‘डराकर या धमकाकर मराठी सिखाना ठीक नहीं’
महाराष्ट्र में मराठी भाषा को लेकर चल रही बहस पर भी वारिस पठान ने राज्य सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में रहने वाले लोगों को मराठी सीखनी चाहिए और भाषा का सम्मान भी करना चाहिए, लेकिन किसी व्यक्ति को डराकर, धमकाकर या नोटिस जारी करके मराठी सीखने के लिए मजबूर करना उचित नहीं है।
पठान ने सरकार से सवाल किया कि यदि मराठी भाषा को लेकर नियम सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू किया जा रहा है तो बड़े फिल्मी सितारों और उद्योगपतियों पर भी यही नियम लागू होने चाहिए। महाराष्ट्र में हाल में कुछ क्षेत्रों में मराठी भाषा की अनिवार्यता को लेकर राजनीतिक विवाद देखने को मिला है।
ईद-ए-मिलाद पर एक दिन शराबबंदी की मांग
वारिस पठान ने ईद-ए-मिलाद के अवसर पर महाराष्ट्र में एक दिन शराब की बिक्री बंद रखने की भी मांग की है। उनका कहना है कि यदि अलग-अलग धार्मिक त्योहारों के अवसर पर शराब या कुछ खाद्य पदार्थों की बिक्री को लेकर विशेष प्रतिबंध लगाए जाते हैं तो इसी तरह ईद-ए-मिलाद पर भी शराब की दुकानें बंद रखी जानी चाहिए।
पठान ने इसे समानता से जोड़ते हुए कहा कि संविधान सभी नागरिकों के लिए बराबर है और धार्मिक त्योहारों को लेकर सरकार की नीति भी समान होनी चाहिए।
वंदे मातरम् को मिला कानूनी संरक्षण, लेकिन गाना अनिवार्य करने का प्रावधान नहीं
वंदे मातरम् विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू हाल में पारित Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill, 2026 है। यह विधेयक 24 जुलाई को राज्यसभा में पेश किया गया, 29 जुलाई को राज्यसभा से और 30 जुलाई को लोकसभा से पारित हुआ। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय सम्मान संबंधी कानून के तहत संरक्षण देना है।
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है। संशोधन का प्रावधान किसी व्यक्ति को वंदे मातरम् गाने के लिए अनिवार्य रूप से बाध्य करने की बात नहीं करता। इसका मुख्य उद्देश्य जानबूझकर राष्ट्रीय गीत के गायन को रोकने या ऐसे आयोजन में व्यवधान पैदा करने को दंडनीय प्रावधानों के दायरे में लाना है।
इसी कानूनी बदलाव के बाद वंदे मातरम् को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई।
कांग्रेस भी वंदे मातरम् विवाद के केंद्र में
स्वतंत्रता दिवस के आसपास कांग्रेस के कार्यक्रम में वंदे मातरम् के केवल शुरुआती हिस्से के गायन को लेकर भाजपा नेताओं ने कांग्रेस पर निशाना साधा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के रुख की आलोचना करते हुए इसे राष्ट्रीय गीत के सम्मान से जोड़ा, जबकि कांग्रेस ने भाजपा के आरोपों को खारिज किया।
इसके बाद वंदे मातरम् राष्ट्रीय राजनीति के प्रमुख मुद्दों में शामिल हो गया और अलग-अलग दलों के नेताओं की प्रतिक्रियाएं लगातार सामने आने लगीं।
जीतन राम मांझी के बयान से भी गरमाई सियासत
वंदे मातरम् विवाद में केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी का बयान भी चर्चा में रहा। उन्होंने राष्ट्रीय गीत के हिस्सों को लेकर चल रही बहस पर तीखी प्रतिक्रिया दी थी। इसके बाद पक्ष-विपक्ष के बीच जुबानी जंग और तेज हो गई।
अब वारिस पठान द्वारा वंदे मातरम् नहीं गाने के रुख को दोहराने से विवाद एक बार फिर राजनीतिक केंद्र में आ गया है। एक तरफ विरोधी दल राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान का मुद्दा उठा रहे हैं, वहीं पठान इसे धार्मिक स्वतंत्रता और किसी नागरिक पर राष्ट्रीय गीत के गायन को जबरन लागू नहीं करने की बात दोहरा रहे है।
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