जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में अप्रैल 2025 में हुए आतंकी हमले को लेकर सुरक्षा एजेंसियों ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) और जम्मू-कश्मीर पुलिस की जांच में सामने आया है कि हमले में इस्तेमाल किए गए मोबाइल फोन बेहद सुनियोजित तरीके से इस्तेमाल किए गए थे, ताकि कोई डिजिटल ट्रेल न छोड़ा जाए।
4 साल तक बंद रहा फोन, हमले से पहले हुआ एक्टिव
जांच में पता चला कि आतंकियों के पास मौजूद दो मोबाइल फोन में से एक Redmi 9T फोन था, जिसे 2021 में पाकिस्तान में आयात किया गया था। यह फोन करीब 4 साल तक बिल्कुल बंद रहा और पहलगाम हमले से ठीक पहले पहली बार एक्टिव किया गया।
दूसरा फोन Redmi Note 12 था, जिसे भी लंबे समय तक निष्क्रिय रखा गया और हमले के आसपास ही चालू किया गया।
कराची से जुड़ी सप्लाई चेन
जांच एजेंसियों के मुताबिक, Redmi 9T फोन कराची स्थित टेक सिरात प्राइवेट लिमिटेड द्वारा आयात की गई खेप का हिस्सा था, जो 1 जनवरी 2021 को पाकिस्तान पहुंची थी।
इस खेप की फंडिंग और लॉजिस्टिक्स में कराची स्थित फैसल बैंक का नाम भी सामने आया है। हालांकि, एजेंसियों ने साफ किया है कि फिलहाल बैंक की इस हमले में प्रत्यक्ष भूमिका के कोई ठोस सबूत नहीं हैं।
आतंकी फंडिंग से पहले भी जुड़ चुका है नाम
जांच में यह भी सामने आया कि फैसल बैंक का नाम पहले भी आतंकी फंडिंग से जुड़े मामलों में आ चुका है। 2007 की एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में दावा किया गया था कि लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठनों के खाते इस बैंक में मौजूद थे।
हालांकि, बैंक ने उस समय इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि सभी संदिग्ध खातों को नियमों के तहत फ्रीज कर दिया गया था।
मोबाइल नहीं, रेडियो सिस्टम से करते थे संपर्क
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जांच एजेंसियों को इन मोबाइल फोन से कोई कॉल या इंटरनेट डेटा रिकॉर्ड नहीं मिला।
आतंकी मोबाइल नेटवर्क के बजाय लंबी दूरी के रेडियो कम्युनिकेशन सिस्टम का इस्तेमाल कर रहे थे, जिससे वे बिना डिजिटल ट्रेस छोड़े आपस में संपर्क बनाए रखते थे।
फोन से मिले नक्शे और तस्वीरें
जांच के दौरान दोनों फोन से कुछ अहम तस्वीरें और नक्शे बरामद किए गए हैं। इनमें पहलगाम के बैसरन मैदान और आसपास के इलाकों की तस्वीरें शामिल हैं।
एक तस्वीर में 30 मार्च 2025 को लगाया गया एक टेंट दिखाई देता है, जो यह दर्शाता है कि आतंकियों ने हमले से कई हफ्ते पहले इलाके में डेरा डाल लिया था।
रणनीतिक तरीके से चुनी गई लोकेशन
जांच एजेंसियों का मानना है कि आतंकियों ने जिस स्थान को चुना था, वह रणनीतिक रूप से बेहद अहम था। यहां से वे सुरक्षा बलों की गतिविधियों पर नजर रख सकते थे और हमले की योजना को अंजाम दे सकते थे।
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