केरल हाई कोर्ट ने जनप्रतिनिधियों के शपथ ग्रहण से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि निर्वाचित स्थानीय निकाय सदस्य कानून में निर्धारित शपथ के शब्दों में अपनी ओर से कोई बदलाव, विस्तार या अतिरिक्त नाम नहीं जोड़ सकते। अदालत के अनुसार जनप्रतिनिधि केवल ‘ईश्वर के नाम पर’ शपथ ले सकते हैं अथवा बिना किसी धार्मिक उल्लेख के ‘सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान’ कर सकते हैं।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी विशेष देवी-देवता, ‘भारत माता’, धार्मिक गुरु, राजनीतिक आंदोलन, संगठन के शहीद या किसी नेता का नाम शपथ में जोड़ना निर्धारित कानूनी प्रारूप के अनुरूप नहीं है। इसी आधार पर तिरुवनंतपुरम नगर निगम के 20 पार्षदों और पलक्कड़ जिले की वडक्कनचेरी ग्राम पंचायत के एक सदस्य द्वारा ली गई शपथ को अमान्य घोषित कर दिया गया।
न्यायमूर्ति पीवी कुन्हीकृष्णन ने दोनों मामलों का संयुक्त रूप से निपटारा करते हुए संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि सभी 21 निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए चार सप्ताह के भीतर नए सिरे से शपथ ग्रहण की व्यवस्था की जाए।
जनप्रतिनिधियों का चुनाव नहीं होगा रद्द
हाई कोर्ट ने शपथ में हुई कानूनी त्रुटि के बावजूद इन जनप्रतिनिधियों का निर्वाचन रद्द करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि सभी प्रतिनिधि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से जनता द्वारा चुने गए हैं और केवल शपथ लेने के तरीके में हुई गलती के कारण जनता के जनादेश को समाप्त नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने माना कि संबंधित पार्षदों और पंचायत सदस्य ने इस विश्वास में शपथ ली थी कि उनका तरीका कानून के अनुरूप है। इसलिए उनके खिलाफ जुर्माना या अन्य दंड लगाने का कोई आधार नहीं बनता। हालांकि, अदालत ने साफ किया कि दोबारा सही शपथ लिए बिना संबंधित प्रतिनिधि अपने पद से जुड़े अधिकारों का इस्तेमाल नहीं कर सकते।
तिरुवनंतपुरम के 20 पार्षदों से जुड़ा मामला
पहला मामला तिरुवनंतपुरम नगर निगम के 20 पार्षदों से संबंधित था। इन पार्षदों ने दिसंबर 2025 में पद की शपथ लेते समय अलग-अलग देवी-देवताओं, धार्मिक प्रतीकों, ‘भारत माता’, गुरुदेव और अपने राजनीतिक आंदोलन के शहीदों के नाम का उल्लेख किया था।
शपथ में श्री पद्मनाभ स्वामी, अट्टुकल अम्मा, भगवान अयप्पा, भारतांबा, भारत माता, गुरुदेव और संगठन के शहीदों सहित अलग-अलग नाम जोड़े गए थे।
इस शपथ को चुनौती देते हुए निगम में एलडीएफ के नेता और पार्षद एसपी दीपक ने केरल हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया था कि पार्षदों ने केरल नगरपालिका अधिनियम में निर्धारित शपथ के प्रारूप का पालन नहीं किया और इसलिए उनकी शपथ कानूनी रूप से मान्य नहीं मानी जा सकती।
उम्मन चांडी के नाम पर पंचायत सदस्य ने ली थी शपथ
दूसरा मामला पलक्कड़ जिले की वडक्कनचेरी ग्राम पंचायत के कांग्रेस सदस्य सुनील चुवट्टुपदम से संबंधित था। उन्होंने शपथ लेते समय कथित रूप से कहा था कि वे ‘ईश्वर के आशीर्वाद से उम्मन चांडी के नाम पर’ शपथ लेते हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता उम्मन चांडी का नाम शपथ में जोड़ने के खिलाफ पंचायत के एक अन्य निर्वाचित सदस्य ने अदालत का रुख किया था। हाई कोर्ट ने कहा कि किसी लोकप्रिय नेता के प्रति सम्मान या आस्था रखना व्यक्ति का अधिकार है, लेकिन वैधानिक शपथ के भीतर किसी नेता का नाम जोड़ना स्वीकार्य नहीं है।
कानून में शपथ के केवल दो विकल्प
फैसले में केरल नगरपालिका अधिनियम की धारा 143 और केरल पंचायत राज अधिनियम की धारा 152 का उल्लेख किया गया। इन कानूनों के साथ दिए गए शपथ प्रारूप में निर्वाचित प्रतिनिधि को दो विकल्प दिए गए हैं।
पहला विकल्प है कि प्रतिनिधि ‘ईश्वर के नाम पर शपथ’ ले। दूसरा विकल्प है कि वह किसी ईश्वर या धार्मिक नाम का उल्लेख किए बिना ‘सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान’ करे।
इसके बाद प्रतिनिधि को संविधान और भारत की संप्रभुता एवं अखंडता के प्रति निष्ठा रखने तथा बिना भय, पक्षपात, अनुराग या दुर्भावना के अपने पद के कर्तव्यों का पालन करने का संकल्प लेना होता है।
कोर्ट ने कहा कि जब कानून किसी काम को एक विशेष तरीके से करने का आदेश देता है, तो वह काम उसी तरीके से किया जाना चाहिए। शपथ का प्रारूप व्यक्तिगत पसंद के अनुसार बदला नहीं जा सकता।
नाम और निर्वाचन क्षेत्र के अलावा कुछ नहीं जोड़ सकते
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि निर्वाचित प्रतिनिधि शपथ के निर्धारित प्रारूप में केवल अपना नाम, पद और निर्वाचन क्षेत्र जैसी आवश्यक जानकारी भर सकते हैं। इसके अलावा किसी व्यक्ति, संगठन, देवी-देवता, आंदोलन या राजनीतिक शहीद का नाम जोड़ने की अनुमति नहीं है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि फैसले का अर्थ यह नहीं है कि कोई व्यक्ति अपनी आस्था के अनुसार किसी देवी-देवता, धार्मिक गुरु या नेता का सम्मान नहीं कर सकता।
हर नागरिक को अपनी धार्मिक और व्यक्तिगत आस्था रखने की संवैधानिक स्वतंत्रता प्राप्त है। लेकिन जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक पद ग्रहण करने के लिए कानून द्वारा निर्धारित शपथ लेता है, तब उसे वैधानिक प्रारूप का ही पालन करना होगा।
‘ईश्वर’ शब्द का विस्तार नहीं किया जा सकता
हाई कोर्ट ने कहा कि विभिन्न धर्मों के लोग ईश्वर को अलग-अलग नामों से पुकार सकते हैं, लेकिन संबंधित कानूनों में शपथ के लिए सामान्य रूप से ‘ईश्वर’ शब्द का प्रयोग किया गया है।
अदालत के अनुसार वैधानिक शपथ के दौरान ‘ईश्वर’ शब्द के स्थान पर किसी विशेष नाम को जोड़ने की अनुमति देने से शपथ के निर्धारित प्रारूप में अनिश्चितता पैदा होगी। कोई व्यक्ति अपने गुरु, माता-पिता, शिक्षक, नेता, संगठन या किसी अन्य व्यक्ति को अपने लिए ईश्वर जैसा मान सकता है, लेकिन इस निजी मान्यता को कानूनी शपथ के भीतर शामिल नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि निर्धारित प्रारूप में बदलाव की अनुमति दी गई तो यह तय करना कठिन हो जाएगा कि किस नाम को वैध और किसे अवैध माना जाए।
पार्षदों के पुराने फैसले रहेंगे सुरक्षित
तिरुवनंतपुरम नगर निगम के 20 पार्षदों की शपथ अमान्य घोषित होने के बावजूद अदालत ने उनके द्वारा फैसले की तारीख तक किए गए कार्यों को सुरक्षित रखा है।
केरल नगरपालिका अधिनियम की धारा 531 के अंतर्गत परिषद, स्थायी समिति या अन्य समिति के कार्य केवल किसी सदस्य के निर्वाचन, पात्रता या परिषद की संरचना में हुई अनियमितता के कारण स्वतः अमान्य नहीं होते।
इस वैधानिक संरक्षण के कारण इन पार्षदों द्वारा पहले परिषद की बैठकों, स्थायी समितियों और अन्य नगर निगम गतिविधियों में लिए गए निर्णय प्रभावित नहीं होंगे। हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि ताजा शपथ लेने तक ये पार्षद परिषद सदस्य के रूप में कोई नया काम नहीं कर सकते और न ही अपने पद से जुड़े अधिकारों का इस्तेमाल कर सकते हैं।
पंचायत सदस्य के पुराने काम अमान्य
वडक्कनचेरी ग्राम पंचायत के सदस्य के मामले में स्थिति अलग रही। अदालत ने कहा कि केरल पंचायत राज अधिनियम में नगरपालिका अधिनियम की धारा 531 जैसा कोई समान संरक्षण प्रावधान उपलब्ध नहीं है।
इसी कारण उम्मन चांडी का नाम जोड़कर शपथ लेने वाले पंचायत सदस्य द्वारा फैसले की तारीख तक सदस्य के रूप में किए गए कार्यों को वैधानिक संरक्षण नहीं मिल सका।
कोर्ट ने उनके पिछले कार्यों को अवैध माना है। हालांकि उनका चुनाव रद्द नहीं किया गया और उन्हें भी चार सप्ताह के भीतर निर्धारित प्रारूप में दोबारा शपथ लेने का अवसर दिया गया है।
जानबूझकर कानून तोड़ने का मामला नहीं, इसलिए जुर्माना नहीं
राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से अदालत का ध्यान नगरपालिका और पंचायत कानूनों में मौजूद दंडात्मक प्रावधानों की ओर दिलाया गया था। इन प्रावधानों के अनुसार पद के लिए अयोग्य होने की जानकारी के बावजूद काम करने वाले व्यक्ति पर जुर्माना लगाया जा सकता है।
हाई कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामलों में निर्वाचित प्रतिनिधियों ने जानबूझकर अवैध तरीके से पद पर काम नहीं किया था। उन्होंने सद्भावना के साथ यह मानते हुए शपथ ली थी कि उनका तरीका वैध है।
शपथ को कानूनी रूप से अमान्य घोषित करने की स्थिति हाई कोर्ट के वर्तमान फैसले के बाद स्पष्ट हुई है। इसलिए संबंधित प्रतिनिधियों पर कोई आर्थिक दंड नहीं लगाया गया।
शपथ केवल औपचारिकता नहीं: हाई कोर्ट
फैसले में अदालत ने शपथ को महज औपचारिक प्रक्रिया मानने से इनकार किया। कोर्ट के अनुसार शपथ सार्वजनिक पद ग्रहण करने वाले व्यक्ति का संविधान, देश और जनता के प्रति गंभीर वचन है।
शपथ के माध्यम से जनप्रतिनिधि यह स्वीकार करता है कि वह भारत की संप्रभुता और अखंडता बनाए रखेगा तथा अपने पद के कर्तव्यों को निष्पक्षता और ईमानदारी से निभाएगा।
इसी कारण शपथ के शब्दों और प्रक्रिया का सख्ती से पालन आवश्यक है। निजी आस्था, राजनीतिक विचारधारा या व्यक्तिगत पसंद के आधार पर इसके स्वरूप में बदलाव नहीं किया जा सकता।
चार सप्ताह में दोबारा होगा शपथ ग्रहण
हाई कोर्ट ने सक्षम अधिकारियों और केरल राज्य निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया है कि संबंधित पार्षदों और पंचायत सदस्य के नए शपथ ग्रहण की व्यवस्था की जाए।
यह प्रक्रिया फैसले की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तारीख से चार सप्ताह के भीतर पूरी करनी होगी। नए शपथ ग्रहण में कानून के निर्धारित प्रारूप का अक्षरशः पालन करना होगा।
इस फैसले के बाद केरल के सभी स्थानीय निकायों के लिए यह स्पष्ट हो गया है कि निर्वाचित प्रतिनिधि शपथ लेते समय तय कानूनी शब्दों से बाहर नहीं जा सकते।
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