गुजरात हाईकोर्ट ने सोमनाथ मंदिर के नीचे बौद्ध अवशेष होने के दावों और उससे जुड़े कथित सर्वे की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने इस याचिका को झूठे, भ्रामक और तोड़-मरोड़कर पेश किए गए तथ्यों पर आधारित बताया। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता पर ₹2 लाख का जुर्माना भी लगाया है।
मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और जस्टिस डी. एन. राय की बेंच ने 25 जून 2026 को दिए अपने फैसले में कहा कि इस तरह की याचिकाएं वास्तविक जनहित याचिकाओं की विश्वसनीयता और पवित्रता को नुकसान पहुंचाती हैं। कोर्ट ने साफ कहा कि याचिकाकर्ता अपने दावों के समर्थन में कोई प्रमाणिक दस्तावेज, भरोसेमंद शोध या ठोस सबूत पेश नहीं कर सका।
क्या थी जनहित याचिका?
यह याचिका महाराष्ट्र निवासी विलास तुकाराम खरात ने दाखिल की थी। उन्होंने खुद को मराठी भाषा का विद्वान, बौद्ध और ‘सनातन धम्म’ नामक संगठन का संस्थापक सदस्य बताया था। याचिका में दावा किया गया था कि सोमनाथ मंदिर के नीचे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI और IIT गांधीनगर द्वारा एक वैज्ञानिक सर्वे किया गया था।
याचिकाकर्ता का दावा था कि इस कथित सर्वे से जुड़ी जानकारी प्रिंट मीडिया और सोशल मीडिया में प्रकाशित हुई थी। इसी आधार पर उन्होंने हाईकोर्ट से कथित सर्वे की पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की थी। याचिका में श्री सोमनाथ ट्रस्ट और ASI को भी पक्षकार बनाया गया था।
हाईकोर्ट ने दावों को बताया आधारहीन
सुनवाई के दौरान गुजरात हाईकोर्ट ने कहा कि याचिका में किए गए किसी भी दावे को याचिकाकर्ता की व्यक्तिगत जानकारी, सरकारी रिकॉर्ड, आधिकारिक दस्तावेज या भरोसेमंद शोध के आधार पर साबित नहीं किया गया। कोर्ट ने यह भी पूछा कि जानकारी हासिल करने के लिए संबंधित प्राधिकरण से संपर्क किए बिना सीधे जनहित याचिका क्यों दाखिल की गई।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि याचिका झूठे, अधूरे, भ्रामक और तोड़-मरोड़कर पेश किए गए तथ्यों से भरी हुई है। कोर्ट ने माना कि इस तरह की याचिकाएं जनहित याचिका जैसी गंभीर कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग हैं।
याचिकाकर्ता को बताया ‘बेईमान लिटिगेंट’
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में याचिकाकर्ता को ‘बेईमान लिटिगेंट’ बताते हुए कहा कि जब कोई व्यक्ति बिना ठोस सबूत और बिना प्रमाणिक दस्तावेजों के संवेदनशील धार्मिक स्थल से जुड़े दावे लेकर अदालत आता है, तो इससे न्यायिक प्रक्रिया और वास्तविक जनहित याचिकाओं की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचता है।
कोर्ट ने कहा कि अखबारों की रिपोर्ट और सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर किसी धार्मिक स्थल, ट्रस्ट या संस्था को विवाद में घसीटना उचित नहीं है। इसी आधार पर अदालत ने याचिका को भारी जुर्माने के साथ खारिज करना उचित माना।
राज्य सरकार ने याचिका को बताया पब्लिसिटी लिटिगेशन
गुजरात सरकार की ओर से पेश लोक अभियोजक जी. एच. विर्क ने अदालत में दलील दी कि इस याचिका का उद्देश्य बिना किसी तथ्यात्मक आधार के श्री सोमनाथ ट्रस्ट को अनावश्यक विवाद में घसीटना था। राज्य सरकार ने इसे जनहित याचिका के बजाय पब्लिसिटी लिटिगेशन बताया।
सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि याचिका में श्री सोमनाथ ट्रस्ट एक्ट, 1955 का उल्लेख किया गया है, जबकि ऐसा कोई कानून अस्तित्व में ही नहीं है। राज्य सरकार ने इसे याचिका में शामिल भ्रामक तथ्यों का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बताया।
अखबारों और सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर लगाए गए थे आरोप
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने स्वीकार किया कि याचिका में लगाए गए आरोप अखबारों की रिपोर्ट और सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर लगाए गए थे। हाईकोर्ट ने इस बात को गंभीरता से लिया और कहा कि ऐसे स्रोतों के आधार पर संवेदनशील धार्मिक और ऐतिहासिक दावे अदालत में नहीं लाए जा सकते।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति को किसी रिपोर्ट या सर्वे से संबंधित जानकारी चाहिए, तो उसे पहले संबंधित विभाग या प्राधिकरण के पास जाना चाहिए। सीधे जनहित याचिका दाखिल करना उचित प्रक्रिया नहीं है, खासकर तब जब याचिका में कोई प्रमाणिक आधार मौजूद न हो।
सोमनाथ मंदिर मामले में कोर्ट का कड़ा संदेश
गुजरात हाईकोर्ट का यह फैसला आधारहीन और भ्रामक दावों पर आधारित जनहित याचिकाओं के खिलाफ एक सख्त संदेश माना जा रहा है। सोमनाथ मंदिर देश के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल है। ऐसे में अदालत ने स्पष्ट किया कि संवेदनशील धार्मिक स्थलों को लेकर कोई भी दावा प्रमाणिक दस्तावेजों और ठोस तथ्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
अंत में हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर ₹2 लाख का जुर्माना लगाया। कोर्ट के इस फैसले के बाद सोमनाथ मंदिर के नीचे बौद्ध अवशेष होने के दावे और कथित सर्वे रिपोर्ट को लेकर चल रही चर्चाओं पर कानूनी रूप से बड़ा विराम लग गया है।
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