प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जन्म-जयंती पर राष्ट्रनिर्माण, राष्ट्रीय एकता, शिक्षा, उद्योग और जनसेवा में उनके योगदान को याद करते हुए एक विशेष आलेख लिखा है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि 6 जुलाई का दिन राष्ट्रवाद और निस्वार्थ सेवा के आदर्शों में विश्वास रखने वाले करोड़ों भारतीयों के लिए अत्यंत विशेष है।
प्रधानमंत्री ने अपने आलेख में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को साहस, त्याग और मां भारती के प्रति अटूट समर्पण का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी के व्यक्तित्व में विद्वता, जनसेवा और उच्च नैतिक मूल्यों का अद्भुत संगम था। आधुनिक भारत के बहुत कम नेताओं में इतने विविध गुण एक साथ दिखाई देते हैं।
सुख-सुविधाओं के बजाय चुना राष्ट्रसेवा का मार्ग
प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म एक ऐसे प्रतिष्ठित और शिक्षित परिवार में हुआ था, जहां वे आसानी से सुख-सुविधाओं से भरपूर जीवन जी सकते थे। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी की गिनती अपने समय के महान शिक्षाविदों में होती थी।
इसके बावजूद डॉ. मुखर्जी ने व्यक्तिगत आराम और सुविधाओं को छोड़कर राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना। उनका मानना था कि चाहे अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष हो, सांप्रदायिकता का मुकाबला हो या कोई मानवीय संकट, वे अपने समय की चुनौतियों के सामने मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकते।
प्रधानमंत्री ने उनके जीवन के व्यक्तिगत दुखों का भी उल्लेख किया। डॉ. मुखर्जी ने पहले अपने छोटे बच्चे को खोया और बाद में उनकी पत्नी का भी निधन हो गया। इन अत्यंत कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपने संकल्प को कमजोर नहीं होने दिया। प्रधानमंत्री के अनुसार, इन दुखों ने राष्ट्रसेवा के प्रति उनके समर्पण को और मजबूत किया।
आज देश अखंड भारत के प्रणेता, प्रखर राष्ट्रवादी एवं महान शिक्षाविद् डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी की 125वीं जन्म-जयंती मना रहा है। सशक्त और आत्मनिर्भर भारत का उनका विजन राष्ट्र निर्माण के हमारे संकल्प को नई ऊर्जा दे रहा है। इस अवसर पर उनके अमूल्य योगदान को समर्पित मेरा यह आलेख……
— Narendra Modi (@narendramodi) July 6, 2026
भारत की एकता और अखंडता था जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने आलेख में कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य भारत की एकता और अखंडता की रक्षा करना था।
देश के विभाजन के समय उन्होंने पश्चिम बंगाल को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद के वर्षों में उन्होंने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर भी संघर्ष किया। जेल और नजरबंदी जैसी कठिन परिस्थितियां भी उन्हें उनके रास्ते से नहीं डिगा सकीं।
प्रधानमंत्री ने कहा कि नजरबंदी के दौरान जब डॉ. मुखर्जी का निधन हुआ, तब वे उन अनगिनत लोगों से बहुत दूर थे, जिनके अधिकारों और भविष्य के लिए उन्होंने जीवनभर संघर्ष किया।
प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा कि इतिहास में कुछ ऐसे क्षण आते हैं, जब किसी व्यक्ति का सर्वोच्च बलिदान राजनीति की सीमाओं से ऊपर उठकर पूरे देश की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन जाता है। उनके अनुसार, डॉ. मुखर्जी का बलिदान भी ऐसा ही था।
आर्टिकल 370 और 35(A) हटाना बताया सच्ची श्रद्धांजलि
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने आलेख में आचार्य विनोबा भावे के शब्दों का उल्लेख करते हुए कहा कि डॉ. मुखर्जी ने उस उद्देश्य के लिए अपना बलिदान दिया, जिस पर उन्हें पूर्ण विश्वास था।
प्रधानमंत्री ने वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 और 35(A) को हटाए जाने को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि बताया। उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी का संपूर्ण जीवन राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए समर्पित था और इसी उद्देश्य के लिए उन्होंने संघर्ष किया।
शिक्षा के क्षेत्र में डॉ. मुखर्जी का बड़ा योगदान
प्रधानमंत्री मोदी ने डॉ. मुखर्जी के शैक्षणिक योगदान को भी विस्तार से याद किया। उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी ने हमेशा राष्ट्रहित और भारतीय मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक बनाने और उसे राष्ट्र की भविष्य की जरूरतों के अनुरूप तैयार करने के लिए अनेक महत्वपूर्ण प्रयास किए।
डॉ. मुखर्जी का मानना था कि शिक्षण संस्थानों का उद्देश्य केवल सरकारी कर्मचारी या कम वेतन वाले कर्मचारी तैयार करना नहीं होना चाहिए। वे चाहते थे कि विद्यार्थियों को नेतृत्व, प्रशासन, वित्त, व्यापार, उद्योग और सार्वजनिक जीवन की जिम्मेदारियों के लिए तैयार किया जाए।
कलकत्ता विश्वविद्यालय में किए कई ऐतिहासिक सुधार
प्रधानमंत्री के अनुसार, डॉ. मुखर्जी के नेतृत्व में कलकत्ता विश्वविद्यालय में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए।
उन्होंने लाइब्रेरी सुविधाओं में सुधार किया, विज्ञान के क्षेत्र में रिसर्च को प्रोत्साहित किया और ऐतिहासिक वस्तुओं के अध्ययन को बढ़ावा दिया। इसके साथ ही कृषि से जुड़े पाठ्यक्रम शुरू करने की दिशा में भी कार्य किया गया।
उन्होंने खेलकूद, टीचर्स ट्रेनिंग और स्टूडेंट वेलफेयर पर विशेष जोर दिया। विद्यार्थियों में विश्वविद्यालय के प्रति गर्व और जुड़ाव की भावना विकसित करने के लिए उन्होंने 24 जनवरी को विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस मनाने की परंपरा शुरू की। प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी उल्लेख किया कि डॉ. मुखर्जी ने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर से विश्वविद्यालय के लिए एक गीत लिखने का अनुरोध किया था।
भारतीय जनसंघ की स्थापना के पीछे था वैकल्पिक राजनीति का विजन
प्रधानमंत्री मोदी ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा भारतीय जनसंघ की स्थापना को भारतीय राजनीति की महत्वपूर्ण घटना बताया।
उन्होंने लिखा कि उस समय देश की राजनीति में कांग्रेस का व्यापक प्रभाव था। ऐसे दौर में डॉ. मुखर्जी ने महसूस किया कि भारत को एक ऐसे नए राजनीतिक विकल्प की आवश्यकता है, जो देश की प्रगति की बात करे और साथ ही भारतीय संस्कृति तथा सभ्यतागत जड़ों से भी जुड़ा रहे।
प्रधानमंत्री ने जनसंघ के चुनाव चिह्न ‘दीपक’ का भी उल्लेख किया। उन्होंने लिखा कि एक अकेला दीपक देखने में छोटा हो सकता है, लेकिन उसमें अपने आसपास के गहरे अंधकार को मिटाने की अद्भुत शक्ति होती है।
उनके अनुसार, भारतीय जनसंघ ने अपने सक्रिय काल में और उसके बाद भी भारतीय राजनीति में ऐसी ही भूमिका निभाई।
भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि स्वतंत्र भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का कार्यकाल अत्यंत महत्वपूर्ण था।
उन्होंने उद्योग को केवल आर्थिक विकास का माध्यम नहीं, बल्कि नए स्वतंत्र भारत के नागरिकों में सम्मान, अवसर और आत्मविश्वास पैदा करने का साधन माना।
प्रधानमंत्री के अनुसार, डॉ. मुखर्जी वेल्थ और वैल्यू क्रिएशन के महत्व को अच्छी तरह समझते थे। उनके प्रयासों से दामोदर वैली कॉरपोरेशन, सिंदरी उर्वरक संयंत्र और मजबूत औद्योगिक नीति जैसी ऐतिहासिक पहलों को आगे बढ़ाया गया। इन प्रयासों ने आधुनिक औद्योगिक भारत की नींव मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हथकरघा, कुटीर उद्योग और कारीगरों के भी प्रबल समर्थक
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि डॉ. मुखर्जी ने आधुनिक उद्योगों के विकास के साथ-साथ भारत की पारंपरिक आर्थिक ताकतों को भी कभी नजरअंदाज नहीं किया। वे हथकरघा, कुटीर उद्योग, कारीगरों और कपड़ा उद्योग से जुड़े श्रमिकों के हितों के प्रबल समर्थक थे।
प्रधानमंत्री ने लिखा कि डॉ. मुखर्जी का विजन ऐसा था, जिसमें बड़े उद्योगों के साथ-साथ स्थानीय कौशल, पारंपरिक रोजगार और छोटे उद्यमों को भी विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया।
सिंदरी संयंत्र के पुनरुद्धार का PM मोदी ने साझा किया निजी अनुभव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आलेख में सिंदरी संयंत्र से जुड़ा एक निजी अनुभव भी साझा किया।
उन्होंने लिखा कि आत्मनिर्भर भारत के स्पष्ट विजन के साथ जिस सिंदरी संयंत्र की स्थापना के लिए डॉ. मुखर्जी ने अथक प्रयास किए थे, उसे कई दशकों तक सत्ता में रहने वालों ने उपेक्षित किया।
प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार को इस संयंत्र के पुनरुद्धार का अवसर मिला और उस कार्यक्रम में उपस्थित होना उनके सार्वजनिक जीवन के सबसे विशेष और अविस्मरणीय क्षणों में से एक रहा।
नेहरू मंत्रिमंडल में शामिल होकर निभाया राष्ट्रनिर्माण का दायित्व
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत की प्राचीन परंपरा सदियों से संवाद और विचार-विमर्श का सम्मान करती रही है और डॉ. मुखर्जी इस लोकतांत्रिक भावना के सशक्त प्रतीक थे।
उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में शामिल होना स्वीकार किया, क्योंकि उनका मानना था कि आजादी के शुरुआती वर्षों में राष्ट्रनिर्माण का दायित्व राजनीतिक मतभेदों से ऊपर है। उन्होंने पूरी निष्ठा और रचनात्मक दृष्टिकोण के साथ अपनी जिम्मेदारियों को निभाया।
हालांकि, जब उन्हें लगा कि राष्ट्रीय महत्व के कुछ विषयों पर देशहित में अलग रास्ता अपनाना आवश्यक है, तो उन्होंने पूरी गरिमा के साथ अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने अपना जीवन उस राजनीतिक लक्ष्य के लिए समर्पित कर दिया, जिसे वे भारत के भविष्य के लिए आवश्यक मानते थे।
पहले संविधान संशोधन के मुखर आलोचक थे डॉ. मुखर्जी
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने आलेख में संविधान संशोधनों और लोकतंत्र से जुड़े मुद्दों का भी उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि 75 वर्ष पहले पंडित जवाहरलाल नेहरू की सरकार पहला संविधान संशोधन लेकर आई थी, जिसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार माना गया। उस समय डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी इसके प्रमुख और मुखर आलोचकों में शामिल थे।
प्रधानमंत्री ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि बाद में वर्ष 1975 में देश पर आपातकाल लगाया गया और इसके बाद 42वां संविधान संशोधन लाकर लोकतांत्रिक मूल्यों की बुनियाद को फिर नुकसान पहुंचाया गया।
बंगाल अकाल में पीड़ितों की सेवा में जुटे रहे
प्रधानमंत्री मोदी ने डॉ. मुखर्जी की मानवीय संवेदनाओं और सेवाभाव को भी विशेष रूप से याद किया।
वर्ष 1943 में जब बंगाल भीषण अकाल की त्रासदी से जूझ रहा था, तब डॉ. मुखर्जी ने पीड़ितों की सेवा में स्वयं को समर्पित कर दिया। उन्होंने लोगों को भोजन उपलब्ध कराने के लिए कई कैंटीन और राहत केंद्र शुरू करवाए। प्रधानमंत्री ने कहा कि एक ओर वे लोगों की पीड़ा से अत्यंत व्यथित थे, वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश शासन की असंवेदनशीलता से आक्रोशित भी थे।
उन्होंने इस त्रासदी पर अपनी पीड़ा व्यक्त करने के लिए ‘पंचाशेर मन्वंतर’ नामक पुस्तक भी लिखी।
1942 के मेदिनीपुर चक्रवात में भी किया राहत कार्यों का नेतृत्व
प्रधानमंत्री ने वर्ष 1942 में मेदिनीपुर में आए भीषण चक्रवात के दौरान डॉ. मुखर्जी के योगदान का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी ने प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्यों का नेतृत्व किया और संकट के समय लोगों की सहायता के लिए सक्रिय भूमिका निभाई।
प्रधानमंत्री के अनुसार, जनसेवा उनके लिए केवल राजनीतिक विचार नहीं, बल्कि जीवन का मूल उद्देश्य था।
युवाओं के लिए डॉ. मुखर्जी का संदेश आज भी प्रासंगिक
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने आलेख में युवाओं को दिए गए डॉ. मुखर्जी के एक संदेश को भी याद किया।
डॉ. मुखर्जी ने युवाओं से कहा था कि वे जो भी कार्य करें, उसे पूरी गंभीरता, लगन और ईमानदारी के साथ करें। किसी भी काम को अधूरा न छोड़ें और तब तक संतुष्ट न हों, जब तक उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान न दे दें।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आज भारत विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में डॉ. मुखर्जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि प्रत्येक भारतीय उस भारत के निर्माण के लिए निरंतर प्रयास करे, जिसकी उन्होंने परिकल्पना की थी।
सशक्त, एकजुट और आत्मविश्वासी भारत था डॉ. मुखर्जी का सपना
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक ऐसे भारत का सपना देखते थे, जो सशक्त हो, एकजुट हो, आत्मविश्वास से भरा हो और साथ ही मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण हो।
प्रधानमंत्री ने देश के युवाओं पर विश्वास व्यक्त करते हुए कहा कि युवा विकसित भारत के लक्ष्य को पूरा करने के लिए बढ़-चढ़कर भागीदारी करेंगे और पूरे उत्साह तथा ऊर्जा के साथ राष्ट्रनिर्माण में अपना योगदान देंगे।
उन्होंने कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन आज भी करोड़ों भारतीयों को देशहित को सर्वोच्च रखने, अपने कर्तव्यों को पूरी निष्ठा से निभाने और राष्ट्र की एकता तथा अखंडता की रक्षा के लिए प्रेरित करता है।
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