साल 2008 के अहमदाबाद सीरियल बम ब्लास्ट केस में गुजरात हाई कोर्ट ने मंगलवार, 7 जुलाई 2026 को बड़ा फैसला सुनाया। हाई कोर्ट ने विशेष अदालत के 2022 के फैसले को बरकरार रखते हुए 38 दोषियों की फांसी की सजा और 11 दोषियों की आजीवन कारावास की सजा पर मुहर लगा दी है। इसके साथ ही इस भीषण आतंकी हमले के 49 दोषियों को निचली अदालत से मिली सजा फिलहाल यथावत रहेगी।
गुजरात हाई कोर्ट की जस्टिस ए.वाई. कोगजे और जस्टिस एस.जे. दवे की खंडपीठ ने दोषियों की अपीलों के साथ-साथ राज्य सरकार की ओर से दायर डेथ कन्फर्मेशन रेफरेंस पर फैसला सुनाया। कानून के अनुसार किसी निचली अदालत द्वारा सुनाई गई मौत की सजा को लागू करने से पहले संबंधित हाई कोर्ट की पुष्टि जरूरी होती है।
38 की फांसी और 11 की उम्रकैद बरकरार
अहमदाबाद की विशेष अदालत ने फरवरी 2022 में इस मामले में 49 लोगों को दोषी ठहराया था। इनमें से 38 को मौत की सजा और 11 को आजीवन कारावास दिया गया था। सभी दोषियों ने अपनी दोषसिद्धि और सजा को गुजरात हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। दूसरी ओर, राज्य सरकार ने 38 मौत की सजाओं की पुष्टि के लिए हाई कोर्ट का रुख किया था।
करीब चार साल तक चली हाई कोर्ट की सुनवाई के बाद अब विशेष अदालत का फैसला बरकरार रखा गया है। इस निर्णय को देश के सबसे बड़े आतंकवादी मामलों में से एक की लंबी न्यायिक प्रक्रिया का बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।
पीड़ित परिवारों को ₹10 लाख मुआवजे का आदेश
हाई कोर्ट ने सजा पर फैसला सुनाने के साथ पीड़ितों के लिए मुआवजे को लेकर भी महत्वपूर्ण आदेश दिया है।
अदालत के अनुसार:
- ब्लास्ट में मारे गए प्रत्येक व्यक्ति के परिवार को ₹10 लाख
- गंभीर रूप से घायल प्रत्येक पीड़ित को ₹5 लाख
- सामान्य चोटों वाले प्रत्येक पीड़ित को ₹1 लाख
का मुआवजा दिया जाएगा। राज्य सरकार को भुगतान की प्रक्रिया 31 मार्च 2027 तक पूरी करने का निर्देश दिया गया है।
यहां मूल जानकारी में सभी 200 से अधिक घायलों के लिए ₹1 लाख मुआवजे की बात कही गई थी, जबकि हाई कोर्ट ने गंभीर और सामान्य घायलों के लिए अलग-अलग राशि तय की है।
26 जुलाई 2008: 70 मिनट में दहल गया था अहमदाबाद
26 जुलाई 2008 की शाम अहमदाबाद के इतिहास के सबसे भयावह दिनों में दर्ज है। शहर के विभिन्न हिस्सों में लगभग 70 मिनट के भीतर 21 सिलसिलेवार धमाके हुए थे। इन विस्फोटों में 56 लोगों की जान चली गई और 200 से अधिक लोग घायल हुए। ताजा हाई कोर्ट फैसले से जुड़ी रिपोर्ट में घायलों की संख्या 246 बताई गई है।
आतंकियों ने भीड़भाड़ वाले इलाकों, सार्वजनिक स्थानों, बाजारों, अस्पतालों और परिवहन साधनों को निशाना बनाया था। नरोदा, बापूनगर, सरखेज और हटकेश्वर समेत शहर के कई क्षेत्रों में हुए धमाकों ने पूरे गुजरात को हिला दिया था।
साइकिलों और टिफिन बॉक्स में छिपाए गए थे बम
हमले को बेहद सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया था। कई विस्फोटक उपकरण साइकिलों पर रखे टिफिन बॉक्स में छिपाए गए थे। शहर के भीड़भाड़ वाले इलाकों में इन्हें इस तरह रखा गया था कि अधिक से अधिक लोगों को निशाना बनाया जा सके।
अहमदाबाद म्युनिसिपल ट्रांसपोर्ट सर्विस की बसों और आसपास के सार्वजनिक क्षेत्रों को भी निशाना बनाया गया। धमाकों के बाद कई वाहन बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए और शहर में अफरा-तफरी फैल गई।
घायलों को बचाने वालों को भी बनाया गया निशाना
अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट की सबसे भयावह बात अस्पतालों को निशाना बनाना था। शुरुआती धमाकों के बाद जब घायलों को अस्पताल पहुंचाया जा रहा था, तब करीब 40 मिनट बाद अस्पताल परिसरों के भीतर भी विस्फोट हुए।
सिविल अस्पताल और एलजी अस्पताल से जुड़े हमलों ने इस आतंकी साजिश की क्रूरता को और गंभीर बना दिया। घायलों, उनके परिजनों और बचाव कार्य में जुटे लोगों तक को निशाना बनाने की कोशिश की गई थी। मौजूदा फैसले से जुड़ी रिपोर्ट के अनुसार, यह अस्पतालों पर किया गया अपनी तरह का पहला बड़ा आतंकवादी हमला था।
35 मामलों को जोड़कर चला था विशाल ट्रायल
अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट की जांच और मुकदमे का आकार बेहद बड़ा था। ट्रायल के लिए कुल 35 अलग-अलग मामलों को एक साथ जोड़ा गया था। इनमें अहमदाबाद धमाकों से जुड़ी 20 FIR और दो दिन बाद सूरत में मिले लेकिन नहीं फटे बमों से जुड़ी 15 FIR शामिल थीं।
जांच एजेंसियों ने 100 से अधिक लोगों को आरोपी बनाया था और कुल 78 लोगों के खिलाफ ट्रायल चला। फरवरी 2022 में विशेष अदालत ने 49 लोगों को दोषी ठहराया, जबकि 28 आरोपियों को बरी कर दिया गया था। एक आरोपी सरकारी गवाह यानी approver बना था।
7,015 पन्नों के फैसले के बाद सुनाई गई थी सजा
विशेष अदालत ने 8 फरवरी 2022 को इस केस में दोषसिद्धि का फैसला सुनाया था। यह फैसला करीब 7,015 पन्नों का था। इसके बाद 18 फरवरी 2022 को सजा का ऐलान किया गया।
विशेष अदालत ने 38 दोषियों को फांसी और 11 को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। एक ही मामले में 38 दोषियों को मौत की सजा सुनाए जाने के कारण यह निर्णय देश की न्यायिक व्यवस्था के सबसे बड़े सामूहिक मृत्यु-दंड फैसलों में शामिल हुआ।
एक हजार से ज्यादा गवाहों की हुई थी जांच
इस बेहद जटिल आतंकी मामले की सुनवाई कई वर्षों तक चली। अभियोजन पक्ष ने मुकदमे के दौरान 1,163 गवाहों की जांच की। लंबी सुनवाई नौ अलग-अलग न्यायाधीशों के सामने चली।
सुरक्षा कारणों से 26 महत्वपूर्ण गवाहों की पहचान सार्वजनिक नहीं की गई थी। जांच और ट्रायल में बड़ी मात्रा में दस्तावेजी, फॉरेंसिक, डिजिटल और अन्य साक्ष्यों पर विचार किया गया।
किन कानूनों के तहत दोषी ठहराए गए?
49 दोषियों को भारतीय दंड संहिता, गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम यानी UAPA, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान से जुड़े कानूनों के तहत दोषी ठहराया गया था।
दोषियों पर हत्या, हत्या की कोशिश, आपराधिक साजिश, देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने की कोशिश, गैरकानूनी गतिविधियों में भागीदारी और आतंकवादी गतिविधियों समेत कई गंभीर अपराध सिद्ध हुए थे।
SIMI और इंडियन मुजाहिदीन कनेक्शन
दोषियों में प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया यानी SIMI के पूर्व नेता सफदर नागौरी और उसके कई सहयोगी भी शामिल हैं। दोषियों का संबंध गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और केरल समेत 11 राज्यों से बताया गया।
पुलिस का मामला था कि साजिशकर्ताओं ने इंडियन मुजाहिदीन (IM) नाम से एक नया आतंकी नेटवर्क तैयार किया था। जांच में धमाकों की जिम्मेदारी लेने वाले ई-मेल और दूसरे डिजिटल सबूत भी महत्वपूर्ण रहे।
2002 की हिंसा का ‘बदला’ लेने का किया गया था दावा
जांच के दौरान सामने आए ई-मेल में हमलावरों ने 2008 के धमाकों को 2002 की गुजरात हिंसा का कथित ‘बदला’ बताया था। यह आतंकियों का दावा था, जिसे उन्होंने हमले को सही ठहराने के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की थी।
जांच एजेंसियों ने व्यापक आतंकी साजिश, बम तैयार करने, उन्हें विभिन्न स्थानों पर रखने और हमले के बाद जिम्मेदारी लेने से जुड़े साक्ष्य अदालत के सामने रखे थे।
हाई कोर्ट तक कैसे पहुंचा मामला?
विशेष अदालत के 2022 के फैसले के बाद सभी 49 दोषियों ने अपनी दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की।
इसके समानांतर, गुजरात सरकार ने 38 दोषियों को सुनाई गई मौत की सजा की पुष्टि के लिए डेथ रेफरेंस दाखिल किया। हाई कोर्ट ने दोषियों की अपीलों और राज्य सरकार के आवेदन पर दो साल से अधिक समय तक विस्तृत सुनवाई की।
अब हाई कोर्ट ने विशेष अदालत का फैसला बरकरार रखते हुए 38 मौत की सजाओं और 11 आजीवन कारावास की सजाओं की पुष्टि कर दी है।
18 साल बाद केस में बड़ा न्यायिक पड़ाव
26 जुलाई 2008 के हमले से लेकर 7 जुलाई 2026 के हाई कोर्ट के फैसले तक लगभग 18 वर्ष गुजर चुके हैं। इस दौरान विस्तृत पुलिस जांच, वर्षों लंबा ट्रायल और हाई कोर्ट में लंबी अपील प्रक्रिया चली।
ताजा फैसले के साथ गुजरात हाई कोर्ट ने 49 दोषियों की दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा है। हालांकि कानून के तहत दोषियों के पास इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प रहेगा।
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