2013 के बहुचर्चित यौन उत्पीड़न मामले में तहलका (Tehelka) पत्रिका के पूर्व प्रधान संपादक तरुण तेजपाल को बॉम्बे उच्च न्यायालय की गोवा बेंच द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद देश की राजनीति में एक बार फिर भूचाल आ गया है। इस फैसले के बाद कांग्रेस पार्टी, भारतीय पत्रकारिता जगत और सार्वजनिक जीवन के प्रभावशाली व्यक्तियों के साथ तरुण तेजपाल के पुराने संबंधों पर एक बार फिर गंभीर चर्चा शुरू हो गई है।
अज्ञात आरोपों और लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अदालत ने तरुण तेजपाल को 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। इस बीच, तहलका के शुरुआती दिनों को लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल की फंडिंग और राजनीतिक संरक्षण से जुड़े कई पुराने खुलासे भी सुर्खियों में आ गए हैं।
बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बरी होने के बाद पलटा गया निचली अदालत का आदेश
यह पूरा मामला नवंबर 2013 का है, जब तहलका पत्रिका में काम करने वाली एक महिला सहकर्मी ने तरुण तेजपाल पर गोवा के एक होटल में ‘थिंक’ कार्यक्रम के दौरान लिफ्ट में यौन उत्पीड़न करने का गंभीर आरोप लगाया था।
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2013: आरोप सामने आने के बाद तेजपाल ने इस्तीफा दिया और उन्हें गिरफ्तार किया गया।
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मई 2021: गोवा की एक सत्र अदालत (Sessions Court) ने तरुण तेजपाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया था, जिसकी देश भर में कड़ी आलोचना हुई थी।
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ताजा अपडेट: बॉम्बे उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए तरुण तेजपाल को दोषी करार दिया और 10 साल की सजा सुनाई। तेजपाल ने इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने की बात कही है।
कपिल सिब्बल का कनेक्शन और तहलका को 5 लाख रुपए का दान
तहलका और तरुण तेजपाल की पृष्ठभूमि की जाँच के दौरान राजनीतिक दलों और मीडिया संस्थानों के बीच सांठगांठ की परतें भी उधड़ने लगी हैं। इस कड़ी में पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल का नाम प्रमुखता से सामने आया है।
नवंबर 2013 में जब यह विवाद जोरों पर था, तब कपिल सिब्बल ने स्वीकार किया था कि उन्होंने साल 2003 में तहलका द्वारा प्रिंट संस्करण शुरू किए जाने के समय तरुण तेजपाल को 5 लाख रुपए का दान दिया था।
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शेयरों की हिस्सेदारी: कंपनी रजिस्ट्रार के दस्तावेजों के अनुसार, तहलका की मूल प्रकाशन कंपनी ‘अनंत मीडिया प्राइवेट लिमिटेड’ में कपिल सिब्बल के पास 80 शेयर (लगभग 0.04% हिस्सेदारी) थे।
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सिब्बल की सफाई: कपिल सिब्बल ने स्पष्ट किया कि उन्होंने यह वित्तीय मदद प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के तहत दी थी, न कि व्यावसायिक लाभ के लिए। उन्होंने तरुण तेजपाल के साथ किसी भी प्रकार के पारिवारिक रिश्ते से भी इनकार किया।
‘ऑपरेशन वेस्ट एंड’ और मेजर जनरल अहलूवालिया मानहानि मामला
तहलका हमेशा से अपने विवादास्पद और सनसनीखेज स्टिंग ऑपरेशनों के कारण चर्चा में रहा है। मार्च 2001 में तहलका द्वारा किए गए ‘ऑपरेशन वेस्ट एंड’ ने देश की राजनीतिक और रक्षा गलियारों में भूचाल ला दिया था।
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फर्जी कंपनियां और स्टिंग: रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार उजागर करने के नाम पर तहलका के पत्रकारों ने फर्जी कंपनियां बनाईं और गुप्त कैमरों का इस्तेमाल किया। हालांकि, बाद में इन टेपों की प्रामाणिकता और नैतिकता पर गंभीर सवाल उठे।
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मेजर जनरल एमएस अहलूवालिया मानहानि केस: इस स्टिंग से जुड़े मामले में सेना अधिकारी मेजर जनरल अहलूवालिया की प्रतिष्ठा को भारी नुकसान पहुँचा था। जुलाई 2023 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने तहलका और तरुण तेजपाल को मानहानि के हर्जाने के रूप में अहलूवालिया को 2 करोड़ रुपए देने का निर्देश दिया था। अदालत ने माना कि तहलका द्वारा लगाए गए आरोप झूठे और निराधार साबित हुए थे।
कांग्रेस सरकार और जस्टिस फुकन आयोग को बंद करने का विवाद
‘ऑपरेशन वेस्ट एंड’ के बाद तत्कालीन एनडीए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में जस्टिस फुकन आयोग का गठन किया था ताकि इन टेपों और स्टिंग की सच्चाई सामने आ सके।
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आयोग का भंग होना: 2004 में केंद्र में यूपीए सरकार के आते ही सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की सरकार ने इस जाँच आयोग को भंग कर दिया।
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दस्तावेजी खुलासे: बाद की किताबों और रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि कांग्रेस नेतृत्व ने तहलका और उसके फाइनेंसरों को बचाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर पूरा संरक्षण दिया था। आलोचकों का मानना है कि यदि फुकन आयोग की रिपोर्ट पूरी तरह से सार्वजनिक हो जाती, तो तहलका के फर्जीवाड़े की असलियत देश के सामने आ जाती।
निष्कर्ष
तरुण तेजपाल को सजा मिलने के बाद यह मामला केवल एक व्यक्तिगत अपराध तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने भारतीय मीडिया, राजनीतिक फंडिंग और वैचारिक संरक्षण के पुराने गठजोड़ पर एक बार फिर गहरी बहस छेड़ दी है।
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