कारगिल विजय दिवस पर उत्तराखंड की वीरभूमि की भूमिका को भुलाया नहीं जा सकता। वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान उत्तराखंड के 75 जांबाजों ने देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। इस छोटे से राज्य के वीर सैनिकों को कई वीरता पदक मिले, जिससे साफ होता है कि इस युद्ध की विजयगाथा उत्तराखंड के बिना अधूरी है। देवभूमि के सपूतों ने कारगिल, द्रास, मशकोह और बटालिक जैसी अति दुर्गम घाटियों में दुश्मन से डटकर लोहा लिया। गढ़वाल राइफल्स के 47 में से 41 और कुमाऊं रेजीमेंट के 16 सैनिकों ने इस युद्ध में बलिदान दिया।
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— One India News (@oneindianewscom) July 26, 2025
राज्य के वीर सैनिकों को अब तक 1528 वीरता पदक और 344 विशिष्ट सेवा पदक मिल चुके हैं, जो इस भूमि के सैन्य पराक्रम का प्रमाण हैं। खास बात यह है कि आईएमए से पासआउट हर 12वां अधिकारी और भारतीय सेना का हर 5वां जवान उत्तराखंड से होता है। आजादी के बाद से अब तक राज्य के 1832 सैनिकों ने देश के लिए बलिदान दिया है। कारगिल युद्ध में उत्तराखंड के वीरों को महावीर चक्र (2), वीर चक्र (10), शौर्य चक्र (1), सेना मेडल (16), युद्ध सेवा मेडल (1) और मेंशन-इन-डिस्पैच (9) जैसे पदकों से नवाजा गया।
जब लैंसडौन के परेड मैदान में हेलीकॉप्टर से बलिदानियों के नौ शव एक साथ उतारे गए, तब पूरा पहाड़ शोक और गर्व में डूब गया था। यह बलिदान आज भी उत्तराखंड की जनता के दिलों में जिंदा है और हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस के रूप में श्रद्धांजलि दी जाती है। उत्तराखंड सचमुच वीरों की भूमि है, जिसकी गौरवगाथा भारत की रक्षा इतिहास का अहम अध्याय है।