अफगानिस्तान इस समय एक नए संकट की ओर बढ़ रहा है, जिसे विशेषज्ञ ‘टाइम बम’ कह रहे हैं। पाकिस्तान और ईरान अपने यहाँ बसे गरीब अफगानों को जबरन वापस भेज रहे हैं। लाखों अफगान प्रवासी, जो या तो कई दशकों से बाहर रह रहे थे या पहली बार अफगानिस्तान लौट रहे हैं, अब तालिबान के शासन में नए सिरे से बसने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इसी बीच, इस्लामिक स्टेट (आईएस) की नजर मजबूरी में लौटे इन लोगों पर है। सुरक्षा एजेंसियों को आशंका है कि आईएस इन्हें आतंकी गतिविधियों में भर्ती कर सकता है।
एएफपी की रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी 2025 से अब तक लगभग 26 लाख अफगान पाकिस्तान और ईरान से वापस भेजे जा चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र की समिति में आतंकवाद की निगरानी कर चुके विशेषज्ञ हंस-जैकब शिंडलर ने कहा कि इस्लामिक स्टेट खुरासान (आईएसके) इन नए आए अफगानों को संभावित भर्तियों के तौर पर देख रहा है।
हालांकि तालिबान की 2021 में सत्ता में वापसी के बाद अफगानिस्तान की सुरक्षा स्थिति पहले से बेहतर हुई है, लेकिन आईएसके तालिबान का कट्टर विरोधी जिहादी गुट है। इसने पूर्वी अफगानिस्तान में गहरी पैठ बना ली है और समय-समय पर हमले करके तालिबान शासन के साथ-साथ पूरे क्षेत्र के लिए गंभीर खतरा बना हुआ है।
शिंडलर के अनुसार, अगस्त 2021 के बाद से आईएसके लगातार बागी तालिबान लड़ाकों और उन अफगानों को अपने संगठन में शामिल कर रहा है जो तालिबानी शासन से असंतुष्ट हैं। इस खतरे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गंभीर माना जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र ने जुलाई 2025 में चेतावनी दी थी कि अफगानिस्तान में विभिन्न आतंकी समूहों के लिए “अनुकूल वातावरण” बन रहा है, जो मध्य एशिया और पड़ोसी देशों की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है।
खास चिंता यह है कि इस्लामिक स्टेट के करीब 2,000 लड़ाके पहले से सक्रिय हैं। पिछले वर्षों में उन्होंने रूस, ईरान और पाकिस्तान जैसे देशों में घातक हमले किए हैं। अब अगर ये मजबूरी में लौटे अफगान आईएसके के जाल में फँस गए, तो स्थिति और भी खतरनाक हो सकती है।
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